सोमवार, 17 फ़रवरी 2025

प्रश्नचिह्न पत्रिका ।। फरवरी 2025

प्रश्नचिह्न पत्रिका के ब्लॉग संस्करण में आपका स्वागत है।

अनुक्रम ।। फरवरी 2025
संपादकीय 

कविताएँ 
शंकरानंद, डॉ निर्मल, वीरेन्द्र नारायण झा
टि्वंकल तोमर सिंह, वेद प्रकाश तिवारी

कहानियाँ 
हरिंदर राणावत
राजा सिंह

आलेख 
डॉ. अमल सिंह ' भिक्षुक '
सीताराम गुप्ता 

विविध 
रेखा शाह आरबी
अलका शर्मा 
▪︎▪︎▪︎▪︎▪︎▪︎▪︎▪︎▪︎▪︎▪︎▪︎▪︎▪︎▪︎▪︎▪︎▪︎▪︎▪︎▪︎▪︎▪︎▪︎▪︎▪︎▪︎▪︎▪︎▪︎▪︎▪︎▪︎▪︎▪︎▪︎▪︎▪︎▪︎▪︎▪︎▪︎▪︎▪︎▪︎▪︎▪︎▪︎▪︎▪︎▪︎▪︎▪︎▪︎▪︎▪︎▪︎▪︎▪︎▪︎▪︎▪︎▪︎▪︎▪︎▪︎▪︎▪︎▪︎▪︎▪︎▪︎▪︎▪︎▪︎▪︎▪︎▪︎▪︎▪︎▪︎▪︎▪︎▪︎▪︎▪︎▪︎▪︎▪︎▪︎▪︎▪︎▪︎▪︎▪︎▪︎▪︎▪︎▪︎▪︎▪︎▪︎▪︎▪︎▪︎▪︎▪︎▪︎▪︎▪︎▪︎▪︎▪︎▪︎▪︎▪︎
संपादकीय 
भूखे रहिए और मूर्ख रहिए
एप्पल के संस्थापक स्टीव जॉब्स स्टैनफोर्ड यूनिवर्सिटी के अपने भाषण के अंत में कहते हैं कि भूखे रहिए और मूर्ख रहिए। आज दुनिया में हर कोई अपने पेट पूजा के लिए संस्था, समाज और सरकार को पूजता है। ऐसे में कोई भूखे नहीं मरना चाहता है। सच बात तो यह है कि कोई मरना नहीं चाहता है। वे लोग भी मरना नहीं चाहते जो स्वर्ग जाना चाहते हैं। सब जीना चाहते हैं हम बेवजह मुस्कुराना चाहते हैं सबकी अपनी अपनी चाहते हैं और हम उन्हीं चाहतों के गुलाम हुए जाते हैं। स्टीव अपनी बात को गति देकर कहते हैं भूखे यानी की आपके अंदर कुछ करने की भूख होनी चाहिए और मूर्ख रहो ताकि आप मूर्ख रह कर ही हम सीख सकते हैं। 

मैं जानना चाहता हूं कि आज के समय में कौन मूर्ख बने रहना चाहता है। इस प्रश्न का उत्तर काफी नकारात्मक हो सकता है। सब चालाक और तेज होना चाहते हैं। आज की दुनिया में हर चीज़ कॉपी हो रहा है फर्स्ट और सेकेंड कॉपी तक बात चली गई है लोग बनावटी के इंसान बनने के दौड़ में हैं और उनके बाल बच्चों की एक लंबी कतार रील जैसी दर्दनाक बीमारी से जूझ रही हैं। आज के रेडीमेड संसार में हम सिला हुआ पैंट, शर्ट पहनकर अपने आप को असहज महसूस कर लेते हैं। हम कभी-कभी भाषा, सभ्यता और संस्कृति को लेकर शिकार हो जाते हैं। इस समाज में हमे कितना मूर्ख होना है यह हमे तय करना होगा। आज हर एक कॉल से पहले हमे सचेत किया जा रहा है कि हमारे साथ गलत हो सकता है। इसका मतलब साफ है कि और लोगों के साथ गलत हो रहा है। आज समय यह है की हम गलत को गलत नहीं कह पाते हैं अगर कहेंगे तो जान को खतरा है और घुमा फिरा के फिर वही बात कोई मरना नहीं चाहता...स्वर्ग के लिए भी नहीं। 

आपका 
आलोक रंजन 
alokranjanoffice@gmail.com 


कविताएँ 
शंकरानंद

सम्पर्क: क्रांति भवन,कृष्णा नगर,खगरिया- 851204
ईमेल: shankaranand530@gmail.com

योजना
काग़ज पर जो बनाई जाती है
वह जमीन पर उतरते हुए
कुछ और हो जाती है
जैसे मनुष्य के हित में
शुरू हुआ कार्यक्रम
कब मनुष्य विरोधी हो जाता है
इसका एहसास तक नहीं होता

जलता हुआ जंगल
एक दिन वसंत को राख कर देता है
सूखती हुई नदी
विलुप्त हो जाती है
ढहते हुए पहाड़
गेंद की तरह लुढ़कने लगते हैं

इस तरह एक नयी श्रृंखला
तैयार होती है और
अच्छा भला शहर
एक दिन हरसूद होकर डूब जाता है!



जोशीमठ
इन दिनों बहुत चर्चा में है जोशीमठ
उसके दरकते हुए
पहाड़ का रक्त कौन देखता है
कोई नहीं
कोई नहीं चाहता कि
ऊँगली उसकी तरफ उठे

ये हादसा एक दिन में नहीं हुआ
एक दिन में खोखला नहीं हो गया पहाड़
एक दिन में नहीं बहा
उसके नीचे का हजारों लीटर पानी

वहां रहने वाले लोग अब कहाँ जाएंगे
कोई नहीं जानता
कर्ज लेकर घर बनाना और
उसे दरकते हुए देखना
आसान नहीं होता

आज दुनिया देख रही है
वहां की हर तस्वीर
पत्थर में पड़ने वाली दरार
कलेजे में कब पड़ जाती है
ये वही जानता है
जिसका घर माचिस की
तीली की तरह बिखर रहा है 


डॉ निर्मल प्रवाल

सम्पर्क: डूंडलोद - सैनीपूरा, झुंझुनूं (राजस्थान) - 333702
ईमेल: drnksaini@gmail.com

नदी हूँ
पहाड़ी से गिरती 
खड्ड से उठती 
बहती हुई गाँव-गाँव 
शहरों शहरों 
कहीं खुलकर बही जंगल जोहड़ों में 
कहीं बंधी बंधन बाँधों में 
कभी पुल के नीचे से भी 
गुजरना स्वीकारा 
स्वीकारा गंदे काले कलूटे नालों को

बहती-बहती पहुँची घरों में 
कभी खेत खलिहानों में नहर बनी 
शहरों की रौनक 
अय्याशियों के अड्डों के निकट 
चार दिवारी में सिमटी झील बनी

नदी हँ नारी हूँ 
हर दर्द तकलीफ उठाती 
खुद के अस्तित्व को भूल 
धरा पर फैले विशाल सागर बनाती हूँ।


मिलती रही माँ
कमरे की सिलदर 
पर एक लुगड़ी मिली 
जिसके कोनों पर लगी गांठों की 
पोटलियों में मिलती रही माँ

रेज़गारी मुड़े हुए मुड़े हुए नोट 
इलायची संठ काली मिर्च 
ककड़ी मतीरे घीया के बीज 
बचपन की मेरी फूल पातड़ी

हर वर्ष एक गांठ खोलता 
उसमें सुरक्षित रखी मां की 
यादों से मिल कर 
उस गांठ को वैसे ही बांध देता हूँ

घर के पीछे किचेन गार्डन 
जिसमें ककड़ी मतीरे और घीया 
की बेलों में फाल आ गया है 
जब भी माँ की याद आती है 
इन बेलों के बीच बैठ जाता हूँ।


वीरेन्द्र नारायण झा

सम्पर्क: समया, पत्रालय: मेंहथ-847404, वाया: झंझारपुर, जिला: मधुबनी (बिहार)
ईमेल: bnjha977@gmail.com


विवशता
मेरे गाँव में
पेड़ तले
मिलती नहीं अब छाँव
उसके साये में भी
मिलती नहीं अब ठाँव
पेड़ों पर नहीं आते
अब फल

नहीं बनाती चिड़िया
अपना घोंसला 
सूखी डाल पर
उसी दिन पेड़ों को
पानी पिलाया जाता
जो खास एक दिन
उसके लिए मुकर्रर होता

क्या करें पेड़!
आबादी का भार ढोते-ढोते
बिन तने और शाखा के
खड़े हैं आज भी मेरे गाँव में 
कंकाल बने!

हत्या
जिसके दम पर है
हरियाली छाई यहाँ
धूप और बारिश में
छाता बन जो खड़ा रहता
अपना फल आप नहीं 
औरों को खिलाता
दोस्त हो या दुश्मन
सबके लिए उसका
वर्ताव एक-सा रहता
इंसानों की सांसों की डोर
है उसी के अस्तित्व से जुड़ा
हर पल दूसरे की फिक्र करने वाला
पक्षियों का भी आशियाना बनता
और अंत आने पर इनसानों का
श्मशान तक साथ निभाता
आज उसी की
इंसान अपने हाथों हत्या करता।


टि्वंकल तोमर सिंह

सम्पर्क: एमएमएस, 1/7 सेक्टर - ए सीतापुर रोड योजना जानकीपुरम, लखनऊ -226021 
ईमेल: twinkletomarsingh@gmail.com

दोहरे कर्तव्यों की मार
हर दिवस वह
सुबह के सूरज के साथ उगती है,
भले ही रात्रि में कितनी देर चाँद के साथ जागी हो.
उसके जागने से उसके परिवार में शुरू होता है दिन,
न जागे तो नई तिथि का अखबार
घर के अंदर आ कर बता ही नहीं पायेगा
कि तारीख़ बदल गयी है.
सात बजे हैं, रसोई में खटी है,
आठ बजे हैं, साड़ी में लगा रही है पिन.
अन्नपूर्णा की भूमिका से
अन्न कमाने वाली भूमिका की यात्रा
मात्र आधे-एक घंटे में पूरी करती है.
स्वाभिमान का कद बढ़ाने को
थोड़ी ऊँची एड़ी की चप्पल पहनती है
फिर चल देती है ठक, ठक, ठक!

घर के कमरों से कार्यालय के गलियारों तक
उसकी विश्वास भरी चाल की गूँज है.
सब संभाल सकती है वह,
उसके हर घंटे का लक्ष्य है तय.
फ़ाइल चार बजे तक निपटा देनी है,
साढ़े पाँच बजे बेटी को ट्यूशन से लेना है,
रास्ते में पनीर खरीदते जाना है,
सास को नौ बजे डॉक्टर के पास ले जाना है,
हर लक्ष्य के पूरे होते ही
उस पर लगाती है सही का निशान.

कुछ तय नहीं है तो बस उसका अपना भविष्य
दोहरे कर्तव्यों का दौड़ दौड़ कर
वहन करने वालों का
घुटना अधिक स्वस्थ रहता है
या जल्दी घिस जाता है?
कहीं उसमें से आवाज़ तो नहीं आती, थक, थक, थक !



वेद प्रकाश तिवारी


सम्पर्क: देवरिया, उत्तर प्रदेश  
ईमेल: vedprakasht13@gmail.com

युद्ध
अहिंसक होने की भ्रांति में
और धार्मिक होने के अहंकार में
तीन हजार सालों में
पांच हजार युद्ध लड़े गये
आदमी आदमी को 
मारता ही रहा , काटता ही रहा
जहां युद्ध हथियारों से लड़ना संभव नहीं था
वहां भय और शोषण के द्वारा
मानवता का गला घोंटा गया
और आज हम देख रहे हैं
युद्ध का ऐसा विध्वंसक रूप
जहां आदमी अमादा है 
पृथ्वी को ही नष्ट कर देने पर

रोज मर रही है मानवता को बचाने के लिए
क्या हम मानव धर्म को 
जीवन विरोध से नहीं बचा सकते ?
महायुद्धों के दुष्परिणामों से लेकर सबक
क्या एक नए युग की शुरुआत
नहीं कर सकते ? 
क्या निहित स्वार्थों की देकर तिलांजलि
अपनी पृथ्वी नहीं बचा सकते ?

इस विद्वेष भरे समय में
जिनकी कोख में सृजन होता है सृष्टि का 
जो पोषण और संवर्धन करती हैं 
हमारी सभ्यता और संस्कृति का
जिसने दमन और उत्पीड़न झेल कर भी
मनुष्य को मनुष्य होने का बोध कराया
हमारी उंगली पकड़ कर
सभ्यता के मुकाम तक पहुंचाया
उस नारी की अस्मिता के साथ खिलवाड़
बदस्तूर आज भी जारी है
वह गुजरी हो चाहे किसी भी कालखंड से
कल भी पीड़ित थी आज भी दुखियारी है

पर हम इस योग्य अब तक नहीं बन पाए
जहां हम मनुष्य होने का 
गौरव प्राप्त कर सकें
नारी संघर्ष को 
अपने जीवन का हिस्सा बना सकें
कितनी दुर्भाग्यपूर्ण है यह बात भी
कि इस विद्वेष भरे समय में
सिर्फ पुरुष ही नहीं, 
अब स्त्रियां भी कर रही हैं
स्त्रियों का शोषण
जिसे जब भी मौका मिला
नारियों की अस्मिता को रौंद कर
सियासत का मैदान प्रशस्त किया
कभी 'मणिपुर' में 
तो कभी 'संदेशखाली' में 
मनुष्यता को कलंकित किया। 

▪︎▪︎▪︎▪︎▪︎▪︎▪︎▪︎▪︎▪︎▪︎▪︎▪︎▪︎▪︎▪︎▪︎▪︎▪︎▪︎▪︎▪︎▪︎▪︎▪︎▪︎▪︎▪︎▪︎▪︎▪︎▪︎▪︎▪︎▪︎▪︎▪︎▪︎▪︎▪︎▪︎▪︎▪︎▪︎▪︎▪︎▪︎▪︎▪︎▪︎▪︎▪︎▪︎▪︎▪︎▪︎▪︎▪︎▪︎▪︎▪︎▪︎▪︎▪︎▪︎▪︎▪︎▪︎▪︎▪︎▪︎▪︎▪︎▪︎▪︎▪︎▪︎▪︎▪︎▪︎▪︎▪︎▪︎▪︎▪︎▪︎▪︎▪︎▪︎▪︎▪︎▪︎▪︎▪︎▪︎▪︎▪︎▪︎▪︎▪︎▪︎▪︎▪︎▪︎▪︎▪︎▪︎▪︎▪︎▪︎▪︎▪︎▪︎▪︎▪︎▪︎

कहानियाँ 
हरिंदर राणावत

सम्पर्कजनसत्ता अपार्टमेंट, फ्लैट नंबर. डी – 003, सैक्टर 9, वसुंधरा, गाजियाबाद (उत्तर प्रदेश), पिनः 201012
ईमेल: harinder.ranawat@gmail.com

एक था नूंह
बेटी की आवाज आ रही थी - पापा उठो .. पापा उठो
सुबह-सुबह जब उसे, मुझे उठाना होता तब वह इसी तरह लयबद्ध तरीके से इन
लफ्जों को धीरे धीरे बोलती। उसके इस तरीके में किसी को तकलीफ न पहुंचाने
की कोशिश जाहिर होती थी। यह लफ्ज बोलने से पहले वह कमरे का दरवाजा भी हल्के से खोलती। 
जब-जब बेटी को मेट्रो स्टेशन तक छोड़कर आना होता, मुझे जग कर उठ बैठने में देर नहीं लगती। मैं कबर्ड की ड्राअर में से कार की चाबी उठाता, बाहर जाते समय पहनने वाली टोपी अलमारी में से निकालता और बेड के पास पड़ी रहने वाली साइड टेबल पर से मोबाइल ले लेता।
ये सब चीजें लेकर मैं बेटी को आवाज लगाता - बेटा मैं चल रहा हूं। बेटी की
आवाज आती .. ठीक है।
बालकनी की तरफ का छोटा गेट खोलकर मैं तेज कदमों से कार की ओर बढ़ जाता। अक्सर ऐसा होता था कि जब बेटी जगाती, तब मैं नींद में कोई स्वप्न देख रहा होता। कार स्टार्ट करते समय मैं इस खंडित स्वप्न को याद करने लगता। अक्सर सपना याद नहीं आता। कभी-कभार याद आ जाता तो लगता, दिल से कोई खलिश मिट गई हो।
सीट बैल्ट बांधते हुए मैंने देखा, बेटी तेज कदमों से आ रही थी। उसके
बैठते ही मैंने हैंडब्रेक नीचे की और गेयर डालकर कार बढ़ा दी।
सोसाइटी के गेट से निकलकर कुछ दूर ही पहुंचे थे कि एक आवाज
सुनकर खटका सा हुआ। यह असामान्य आवाज थी और बिल्कुल वैसी ही,
जैसी कभी-कभार जब भी आती तो मन आशंकित हो उठता था।
पहले जब यह आवाज आती थी तो दिल धक से रह जाता था। ऐसा लगता था कि आशंकाओं की ढेर सारी मधुमक्खियां आसपास मंडराने लगी हैं। तब मैं खुद को दिलासा देता कि इनमें से कोई मधुमक्खी मुझे डंक नहीं मारेगी। मैं कार चलाता रहता। यह आवाज कुछ-कुछ ऐसी होती .. धप्-धप् धप्-धप्।
बेटी मोबाइल में व्यस्त थी, मेरे आसपास मंडरा रही आशंकाओं की मधुमक्खियों से बेखबर। 

धप्-धप् की आवाज तेज होती जा रही थी और कुछ देर में हालत यह हो गई कि पूरे ब्रह्मांड में सिर्फ यही आवाज अनहद नाद की तरह गूंजने लगी तो मैंने
अनायास ही बेटी से कहा - बेटू कुछ गड़बड़ है।
मैं बेटी से कहना नहीं चाहता था लेकिन यह भी चाहता था कि वह स्थिति
की गंभीरता को भांप ले क्योंकि मैं समझ गया था कि मौजूदा स्थिति पहले जैसी नहीं थी, जब मेरी आशंकाएं निराधार साबित होती थीं। क्योंकि इतना तो मैं जान ही गया था कि धप्-धप् की यह आवाज कार के किसी टायर में हवा कम हो जाने की वजह से होती है। 

पहले ऐसा होने पर सोसाइटी पहुंचकर कार खड़ी करने के बाद जब मैं उतर कर देखता था तो किसी एक टायर में हवा कुछ कम जरूर होती थी लेकिन आपात स्थिति जैसी नौबत नहीं होती थी।
लेकिन इस समय मैं जान गया कि स्थिति गंभीर है। मैंने कार चलाते हुए बाईं तरफ देखा। वह लगभग खाली मैदान था जिसके एक कोने पर दूध का
कारोबार करने वाले लोगों के कच्चे घर थे। पास ही उनकी गाय भैंसें बंधी थीं,
गोबर के उपले सूख रहे थे और कुछ चारपाइयां पड़ी थीं। लेकिन मेरी नजरें ढूंढ़
रही थीं उस शख्स को, जिसका नंबर मैंने अपने फोन में टायर अहमद के नाम से सेव कर रखा था। नाम तो उसका अहमद ही था, लेकिन मैंने अपने स्वार्थ की वजह से उसका नाम टायर अहमद रख दिया था। क्योंकि वक्त-बेवक्त कार
के टायर से जुड़ा कोई काम पड़ने पर जो शब्द सबसे पहले जेहन में आता, वह
टायर ही होता।

टायर अहमद की कच्ची-पक्की दुकान उस विशाल मैदान के सड़क से सटे हुए हिस्से में थी। और अब मैं कार चलाते हुए टायर अहमद की दुकान
तलाश रहा था।
हालांकि मुझे उम्मीद कम थी क्योंकि कुछ दिन पहले का वाकया मेरे जेहन में
घूम रहा था। तब प्रशासन का अतिक्रमण हटाओ अभियान चल रहा था और
टायर अहमद की दुकान जैसी कितनी ही दुकानें हटा दी गई थीं। उसी का नतीजा था कि अब दूध बेचने वालों को छोड़कर पूरा मैदान सपाट नजर आ रहा था। मैदान के दूसरी तरफ आवासीय सोसायटियां थी, जिनकी बालकनियों पर सुबह की कुनकुनी धूप उतर रही थी।
सड़क पर कम ही लोग थे और इक्का दुक्का वाहन। इस वजह से हमारी कार से आ रही धप्-धप् की आवाज कुछ ज्यादा गूंजती लग रही थी।
सपाट मैदान की ओर देखते हुए मेरा दिल बैठने लगा लेकिन एक उम्मीद बची
थी। कुछ आगे जाकर एक दुकान और थी। इस उम्मीद के साथ एक्सीलेटर पर मेरे पैर खुद ब खुद दब गए लेकिन रेड लाइट आने पर कार को रोकना पड़ा। मैं अपने मिशन को लेकर एकाग्रचित्त था लेकिन रेड लाइट ने मुझे झुंझलाहट से भर दिया। लाइट ग्रीन होने पर मुझ में फिर आशा का संचार हुआ और कुछ मीटर आगे पहुंचकर मैंने उम्मीद भरी निगाहों से बाईं तरफ देखा।
कुछ टायर पड़े थे। एक बक्सा था जिस पर ताला लटक रहा था और दो-एक
खाली कुर्सियां थीं।

मैंने उस पंचर वाले को अपने ख्यालों में देखा। वह अपने घर में चारपाई पर बैठा गिलास से चाय सुड़क रहा था। फिर मैंने सोचा, हां - उसे भी सुबह की चाय इत्मीनान से पीने का पूरा हक है।
अब मैं जान गया था कि घर लौटने के सिवा कोई चारा नहीं बचा है।
सोसाइटी में घुसने पर मैंने कार खड़ी की और बेटी से पूछा, बेटा स्कूटी से चला
जाएगा। बेटी के लिए यह मन की मुराद पूरी होने जैसा था लेकिन उसने भावहीन चेहरा रखकर हां में सिर हिला दिया और कार का दरवाजा खोलकर उतर गई।
बेटी को स्कूटी से मेट्रो स्टेशन तक जाने में अपने अस्तित्व से जुड़ी स्वतंत्रता का एहसास होता होगा। मुझे उसके स्कूटी लेकर जाने में कोई एतराज नहीं था लेकिन उसकी मां का मानना था कि जब पापा सुबह छोड़ आते हैं और दोपहर को पापा या मैं तुझे ले आते हैं तो स्कूटी पर जाने की क्या जरूरत है और स्कूटी तू अपनी लोकेलिटी में तो चलाती ही है। बेटी के लिए मां का आदेश सर्वोपरि था।
कार की चाबी निकाल कर मैं उतरा और टायर को देखा। मेरा जी धक से रह गया। टायर जमीन से इस कदर चिपका हुआ था कि बीच में कोई पतला कागज डालना भी मुमकिन नहीं था। कई जगह से टायर कट फट गया था और लोहे के रिम से चिपका गया था।
मुंह को आया कलेजा लेकर मैं चलने को ही था कि कार की सफाई करने वाला आ गया। देख कर उसने कहा, टायर तो कट गया है, चूंकि कलेजा मेरे मुंह को आया हुआ था इसलिए मुझसे कुछ बोला नहीं गया। मैंने भरे मुंह और भारी मन से हूं किया। वह कुछ देर टायर को और कुछ देर मुझे देखता रहा। उसके चेहरे पर सहानुभूति और हैरानी थी।
घर में दाखिल होकर मुझे लगा कि अब सो जाने के सिवा कोई चारा नहीं है। हालांकि यह भी लगा कि अगर मैं नहीं सोऊं तो बेहतर होगा। टायर की याद भी मुझे बेचैन किए दे रही थी। यह झुंझलाहट भी थी कि आज का आधा
दिन यानी मेरी छुट्टी का आधा दिन उस काम में बीतने वाला था, जो बिन बुलाए आ धमका है और जो मेरे पूर्व निर्धारित कामों की सूची में कहीं नहीं था। लेकिन अब वह आकर पूरी फेहरिस्त पर छा गया था।
मैं सोच रहा था और सोचते सोचते उदासी भरी नींद में चला गया। दोपहर को जब उठा तो सबसे बड़ा सवाल था अब क्या हो। 
कार को किसी पंचर वाले की दुकान तक ले जाना नामुमकिन था। एक ही सूरत थी। पंचर वाले को ही कार तक आना होगा।
मैं सोच रहा था कि टायर अहमद की दुकान तो अपनी जगह से बेदखल होकर सृष्टि में कहीं बिला गई है। लेकिन मेरे पास उसका फोन नंबर था हालांकि उसे
लेकर भी जो आशंका थी, वह सही निकली।
पिछले दिनों फोन का सिम खराब होने की वजह से जो कई नंबर उड़ गए थे,
टायर अहमद का नंबर भी उन्हीं में था। फिर मुझे याद आया मैं उसे यूपीआई से भुगतान करता था। जरूर वहां बैलेंस हिस्ट्री में वह भुगतान दर्ज होगा। मैंने
तुरंत ऐप खोला और हिस्ट्री में गया। टायर अहमद के नाम से सर्च किया। टायर अहमद नाम कहीं नहीं मिला। फिर याद आया कि उसके नंबर पर जब मैं भुगतान करता था तो वहां शबनम खातून या ऐसा ही कुछ नाम आता था। भुगतान करने के बाद मै टायर अहमद को स्क्रीनशॉट दिखाते हुए वह नाम बोलता भी था ताकि शक की कोई गुंजाइश न रहे। मैंने शबनम खातून के नाम से ढूंढ़ना शुरू किया और कुछ मशक्कत के बाद टायर अहमद का नंबर मेरे सामने था।
मैंने तुरंत नंबर मिलाया। दूसरी तरफ से टायर अहमद की आवाज आई .. जी कौन।
मेरे याद दिलाने पर वह मुझे पहचान गया। तब मैंने उससे पूछा कि बड़े मैदान से उसकी दुकान थी, वह अब कहां है। उसने बताया कि उसकी दुकान नजदीक ही सड़क के उस पार है। इस पर मैंने कहा, यह तो बड़ी अच्छी बात है। फिर मैंने उसे याद दिलाया कि चार-पांच महीने पहले उसने मेरी कार के ट्यूबलैस टायर को ट्यूब वाले टायर में बदल दिया था। और अब वही टायर न तो ट्यूबलैस और न ही ट्यूब वाला रहा है।
करीब पांच महीने पहले यही टायर कम हवा पर चलने की वजह से पंचर हो गया था और कुछ जगहों पर कट भी गया था। तब टायर अहमद ने ही सुझाव दिया था कि वह इसमें नई ट्यूब डाल देगा, जिससे टायर 6-8 महीने चल जाएगा, उसके बाद मैं नया टायर खरीद सकता हूं, इस समय नए टायर पर पैसे लगाने का फायदा नहीं। मैंने यह सोचकर कि टायर अहमद एक पेशेवर के नाते सलाह दे रहा है तो ठीक ही कह रहा होगा, उसे इस परियोजना के लिए हरी झंडी दे दी थी।
वही टायर 6-8 महीने तो नहीं लेकिन 5 महीने के सेवाकाल के बाद आज अलविदा कह गया था।

टायर अहमद ने कहा, वह थोड़ी देर में ही लड़का भेज रहा है। इस
पर मैंने उसे कहा कि कोई जल्दी नहीं है। वह एक घंटे तक लड़के को भेज सकता है। मेरी योजना थी कि तब तक मैं एक कप चाय पी लूंगा और सलाद काट लूंगा। लेकिन टायर अहमद ने कहा, नहीं एक घंटा क्यों, लड़का दस मिनट में पहुंच जाएगा। मैंने कहा, बहुत अच्छा।
अब मैं न चाय पी सकता था न सलाद काट सकता था। मैंने सोचा रसोई में पड़े चार-पांच बर्तन धो देता हूं और साथ ही गीजर ऑन कर देता हूं ताकि कल लाई कच्ची सब्जियां गर्म पानी से धोई जा सकें। इन कामों को निपटा रहा था कि फोन की घंटी बज उठी। मैंने बात की तो टायर अहमद ने कहा .. लड़का सोसाइटी के बाहर खड़ा है, आप गार्ड रूम में फोन कर दें। लेकिन गार्ड को फोन करने की जगह मैंने खुद ही जाना उचित समझा। जाकर देखा तो सोसाइटी के गेट के बाहर मोटरसाइकिल पर एक व्यक्ति था जो लड़का तो कतई नहीं लग रहा था। उसकी उम्र 35-40 वर्ष के करीब होगी लेकिन वह जिस तरह से मोटरसाइकिल पर बैठा था और उसके हाव-भाव में जैसी व्यग्रता थी, उससे मुझे यकीन हो गया था कि वह टायर अहमद का भेजा हुआ ‘लड़का’ ही है।

मैंने गार्ड से कहा, उसे भीतर आने दें। 

मैं पैदल ही लौट रहा था। ‘लड़का’ मोटरसाइकिल इतनी धीमे चला रहा था कि वह लगभग मेरे साथ ही चलता लग रहा था। कार की चाबी मैं साथ ही लाया था। मैंने कार की डिग्गी खोली। इससे वह समझ गया कि यही उसका कार्यस्थल है।
उसने मोटरसाइकिल स्टैंड पर लगाई और कार की खुली डिग्गी के पास पहुंच
गया। मुझे लगा अब आगे का काम उसी के सुपुर्द कर देना चाहिए और मुझे
जाकर सब्जियां गर्म पानी में डाल देनी चाहिए।
कमरे में लौट कर मैंने सोचा कि ‘लड़के’ को डिग्गी में से स्टेपनी वाला टायर निकाल कर लगाने में ज्यादा समय नहीं लगेगा, तब तक मैं समाचार चैनलों पर खबरों से रूबरू हो लेता हूं 

टीवी लगाया और जैसी आशंका थी, समाचार चैनलों पर वही
नकारात्मक खबरें छाई हुई थीं।
बड़ी खबरों में एक खबर थी, देश की राजधानी से सटे एक जिले में कल
सांप्रदायिक तनाव फैलने के बाद भड़की हिंसा आज दूसरे जिलों तक
फैल चुकी थी।
टीवी एंकर सिंहगर्जना करते हुए, हिंसा पर उतारू भीड़ द्वारा की जा रही आगजनी, पथराव और उत्पात दिखा रहे थे। यह दृश्य न सिर्फ चिंताजनक और दुखद थे, बल्कि खौफनाक और गुस्सा दिलाने वाले भी।
कुछ चैनलों पर परिचर्चाएं चल रही थीं। इनमें एक पक्ष का कहना था कि यह सब एक समुदाय की ओर से सुनियोजित तरीके से किया गया, क्योंकि उपद्रव को जिस तरीके से अंजाम दिया गया वह अनायास नहीं हो सकता। इतनी सारी गाड़ियों को फूंक दिया जाना, घरों और होटलों की छतों पर से पथराव करना, दुकानों को जला देना, आखिर इतने बड़े पैमाने पर आगजनी और हिंसा के लिए साजो सामान जुटाना तुरत-फुरत तो हो नहीं सकता। दूसरे पक्ष का कहना था कि एक समुदाय के लोगों ने उकसाने वाले काम किए। सोशल मीडिया पर भड़काऊ पोस्ट डालीं तो उसकी प्रतिक्रिया तो होनी ही थी। एक समुदाय के नेता के तौर पर एक चर्चित शख्स बंटी मानेसर के नाम की चर्चा हो रही थी और दूसरे समुदाय के नेता के तौर पर एक बड़े राजनीतिक दल के विधायक दिलावर खान का नाम सामने आ रहा था।
एक चैनल बता रहा था, बीती रात एक समुदाय के धार्मिक स्थल पर एक व्यक्ति
को भीड़ ने मार डाला। समाचारों के मुताबिक अब तक दोनों समुदायों के छह लोग मारे जा चुके थे। 

एक चैनल पर खौफनाक सीन थे। जला दी गईं और खाक हो चुकी अनगिनत गाड़ियां दिख रही थीं। इनमें एक एंबुलेंस भी थी। दूसरे चैनल पर  दिखाया जा रहा था कि उत्पातियों ने एक बस को अपने कब्जे में ले लिया और उसे चलाते हुए ले जाकर एक स्कूल की दीवार से टकरा दिया। 

परिचर्चाओं में दोनों पक्षों की अपनी-अपनी दलीलें थीं जिन्हें सुनकर किसी के आम इंसान के मन में नफरत और क्रोध का ज्वार उठ सकता था।
मैं अलग-अलग चैनल बदलता रहा। फिर टीवी बंद कर दिया और गर्म पानी वाली छोटी बाल्टी में से सब्जियां निकाल कर उस टोकरी में रख दीं जो प्लास्टिक की बनी थी और पानी रिस जाने के लिए उसके बीच में खाली जगहें बनी हुई थीं। मैंने पंखा चला दिया ताकि सब्जियों पर से बचा-खुचा पानी भी सूख जाए जिससे मैं इन्हें फ्रिज में रख सकूं। फिर मैंने सोचाअब चल कर देख लेना चाहिए कि लड़के ने कितना काम पूरा कर लिया।
बालकनी का छोटा गेट खोलकर मैं बाहर आया। यह अगस्त के दिन थे और धूप बहुत तीखी नहीं थी। लड़के के पास पहुंचकर देखा, टायर फिट हो चुका था।   मैंने राहत की सांस ली और डिग्गी का दरवाजा नीचे खींचकर बंद कर दिया।
कुछ क्षण चुप्पी में बीतेजिसमें अगस्त की हल्की हवा में पेड़ों के पत्ते धीरे-धीरे
हिल रहे थे और दीवार के परे सड़क पर से  गुजरते वाहनों की हल्की
ध्वनियां आ रही थीं।

अब सिर्फ मेहनताना दिया जाना था। मैंने टायर अहमद को फोन मिलाया और उसे बताया कि काम हो गया हैक्या मैं इसी नंबर पर पेमेंट कर दूं। इस पर टायर अहमद ने कहापेमेंट लड़के को ही कर दीजिए। मैंने पूछाकितने। उसने कहा100 कर दीजिए। मैंने कहा, ठीक है
बात करते हुए मैं लड़के से कुछ दूर आ गया था। उसके पास जाकर मैंने पूछातुम्हें पेटीएम कर दूं। उसने कहाहां। मैंने पूछानंबर से या स्कैन करके।
उसने कहानंबर से ही कर दें। मैंने उससे नंबर पूछा। नंबर डालते ही
उसका नाम आ गया।

मैंने मोबाइल उसे दिखाते हुए और पुष्टि करने के लिए पूछा, विजय कुमार। उसने भी पुष्टि की। मैंने पेमेंट कर दी और कहापैसे आ गए होंगे,
देखो। लड़के ने अपने मोबाइल में देखने की जहमत नहीं कीलेकिन पूछा जरूर,
कितने किए हैं। मैंने कहा, सौ।

सुनकर वह आश्वस्त हो गया। पेमेंट होने से पहले उसके चेहरे पर हल्की सी आशंका थी। लेकिन अब वह जीवन के प्रति उत्साहित लग रहा था।

उसने मोटरसाइकिल की ओर बढ़ते हुए कहासाहब तीन मोबाइल
चोरी हो चुके हैंएक तो अभी चार-पांच दिन पहले ही हुआ। मोबाइल खोने की पीड़ा उसकी आंखों में उतर आई थी। मैंने पूछाअरे कैसे।
बस साहब क्या बताएंकिस्मत ही खराब चल रही है। हम बड़े लोग तो हैं नहीं,
बड़े लोग होते तो पुलिस अब तक पता लगाकर दिलवा देतीलेकिन छोटे लोगों
की कौन सुनेगा। इस बार तो मैं पुलिस के पास गया ही नहींपिछली बार गया
था तो मुझे कहा कि 5000 रुपए जमा करा दोमोबाइल ढूंढ देंगे। अब
साहब 5000 होते तो बात ही क्या थीमैं फिर गया ही नहीं पुलिस के पास।
चूंकि उसे अपनी व्यथा सुनाने के लिए एक श्रोता मिला था तो उसने मोटरसाइकिल स्टार्ट करने की जल्दी नहीं की। कार के टायर की ओर संकेत करते हुए उसने कहायह काम मैं करता नहीं हूं। मेरी तो पान सिगरेट की गुमठी हैगुजारा चल जाता है। यह काम तो अहमद ने सिखा दिया। जब से उसे मेरे मोबाइल चोरी होने का पता चलाउसने कहातुझे टायर बदलना सिखा देता हूंसोसाइटियों में लोगों को जरूरत पड़ती रहती हैमेरी जगह तू चले जाया करनातेरे थोड़े पैसे बन जाएंगे।
कहते-कहते लड़का मोटरसाइकिल पर बैठ चुका था। जाते-जाते उसने कहाठीक है साहब। मैंने कहाओके।
मोटरसाइकिल का गेयर डालकर उसने स्पीड बढ़ा दी और गेट से बाहर निकल
गया।
मैं चुपचाप उसे जाते देख रहा था।
जेहन अजीब कैफियत में था। एक ही बात दिल-दिमाग में धप् धप् करती कौंध रही थी। 
हमारा कौन सा संसार वास्तविक है ...

बंटी मानेसर और दिलावर खान का संसार
या
टायर अहमद और विजय कुमार का संसार।


राजा सिंह

सम्पर्क : एम: -1285 सेक्टर-आई, एल. डी.ए.कॉलोनी, -कानपुर रोड,लखनऊ-226012
ईमेल: raja.singh1312@gmail.com

पहचान
क्या पहचान सिर्फ आँखों की होती है? आंखें इस पहचान को दिल दिमाग तक क्यों नहीं ले जाती हैं? वह लड़का तो खैर तीन वर्ष से परिचित था किन्तु अपने पिता को भी वह कहाँ जान पाई, जिनके साथ उम्र के तीस साल गुजारे थे?... और अब तक उनके रंग बदलते व्यक्तित्व से अपरिचित हूँ, वैसे ही जैसे तीन साल से परिचित उस लड़के, प्रेमी, पति से !
दोनों एक जैसे ही थे, सिर्फ एक हल्का सा फर्क था। हर व्यक्ति को देखते वक़्त एक ख्याल सा रहता है कि वह इन्हें पहली बार देख रही हूँ. किन्तु शनै शनै यह अहसास तारी रहता है कि ऐसा तो कोई और देखा है। और फिर उसे ताज्जुब होता है कि अरे, ऐसा तो अपना बाप है! यह अपना और पराए का फर्क नहीं था। यह भीतर तक गहराई में उतरने पर आभास होता है कि बाहरी आवरण के अलावा भीतर से सब एक हैं। वह उसके प्यार में आकंठ डूब जाती है। जैसे वह पिता को चाहती थी, एकदम आज्ञाकारी समर्पित सी। इसलिए जब वह पहली बार मिला तो जाना पहचाना सा लगा था। जैसे कि वह पहले भी मिली हो दूसरी बार मिलने पर लगा था, कि वह उसे बहुत पहले से जानती है। उसको लेकर उसके मन में कोई आशंका नहीं थी।
वह जब कम्पनी के डायरेक्टर से मिलने आया था तो वह वही बैठी थी. वह किसी अन्य एम.एन.सी में कार्यरत था। और फिर डायरेक्टर कि अनुपस्थिति में उसने अलग से मिलने की इच्छा व्यक्त की, तो भीगे ठंडे मौसम में भी दो मिनट उसकी उपस्थिति की जो सेक लगी, वह मन से उतर कर पूरे शरीर में फैल गई थी। जो हर मुलाकात में तारी रहती और गर्मी में कसक भरी ताजी ठंडी हवा का अहसास कराती। उनके मिलन ने अब मन से उतर कर दिल में दाखिल होकर स्थायी डेरा बना लिया था।
कई चीजें अंदर से बदल जाती हैं किन्तु बाहर से वही रहती है। और कई चीजें बाहर से बदल जाती किन्तु अंदर से वही रहती है। पिता और प्रेमी ऐसे ही बदले थे। परंतु वह उसके सानिध्य में अंदर बाहर दोनों रूप में बदल नहीं पाई थी। पता नहीं लड़के के अंदर क्या-क्या, कहाँ-कहाँ बदल गया था, वह पकड़ नहीं पाती थी. दिमाग चलता है, दिल में हलचल होती है, लेकिन उसके मुताबिक कार्य नहीं होता है। वह सिल्क कि तरह नरम था तो लोहे माफिक कडक भी हो जाता था।
 अब जबकि वे अलग अलग हो गए है, किन्तु पहले से व्याप्त उसकी गंध अभी तक उससे लिपटने को आतुर रहती है। अब उसे लगा कि वह उसके साथ लिपटने को सकुचाती सिर्फ उसके पास से गुजरती थी और फिर परे हो जाती थी। प्रत्येक व्यक्ति प्रेम चाहता है । प्रेम की चाहना ही वासना में तब्दील होती है और आपस में आबद्ध करती है। परंतु जब हृदय के मूल्यवान स्वप्न तितर-बितर हो जाते है तो वेदना कराह उठती है। वासना और वेदना दोनों विचित्र है, और वह दोनों से आप्लावित है। संपर्क हीनता के कारण जब हृदय का उपयोग नहीं होता तो फिर एक दूसरे के प्रति मार्मिक विचार टूट जाते है, क्योंकि वह असहिष्णु और अधैर्य की प्रतिमूर्ति था। उसने सोचा।
पिता ने जब वापस लौटी बेटी का मुख देखा तो उसकी आँखें उसी तरह सतर्क हो उठी थी, जब उसकी लड़की ने जिद की उससे जुडने की। और उसका सर नीचा हो गया था, बिना उसके कुछ कहे। उनके भीतर अथाह संवेदना का गहराता सागर था, वो तनावपूर्ण चुप्पी जो क्रमशः उपेक्षा और तिरिष्कार पूर्ण व्यवहार में बदल गई थी। बेटी वही कहीं किसी जगह बिल्कुल वही थी जो हमेशा होती थी। सिर्फ बाहर कुछ बदल गया था। चहकती हुई कोयल, गूंगी थी, बुलबुल के मानिंद पिंजरे में, अड्डे में कैद। वह ठंडी भावना विहीन प्रस्तर प्रतिमा में तब्दील हो चुकी थी।
“मुझे यह पता था यह समय किसी दिन अचानक आ जायेगा।“ पिता ने कहा।
“इस तरह से कभी नहीं सोचा था।“ माँ की आवाज सकुचा गई।
माँ हत बुद्धि सी खड़ी रह गई थी। वह एक तीक्ष्ण-जिह्वा, घरेलू और दयालु महिला थी। किन्तु बेटी के दिल में क्या चल रहा है, इसका अनुमान होना बड़ा ही कठिन था। उसने अपने कमरे में पिता की तरफ देखा फिर माँ की तरफ। पिता बेहद रोष में थे और माँ निःशब्द। बेटी अव्यक्त थी। अपने मूल चरित्र में कोई भी अभिव्यक्ति स्तर पर खुल नहीं रहा था।
पिता आज भी उसके जीवन का अवलम्ब बना हुआ है। पिता के दृष्टिकोण से वह एक उच्च-वंशीय कन्या है जो अपनी जिद के कारण इस दैन्य दशा को प्राप्त हुई है। जबकि वह जीवन और समाज के प्रति जवाबदेह थी। उसके ना रो पाने का दुख। माँ का रोना रह-रहकर कर फूटता है, उसके संबंध विच्छेद का दर्द। माँ ने उसका साथ दिया था उस लड़के के साथ विवाह को लेकर, जब पिता किसी भी तरह राजी नहीं हो रहे थे। जब लड़की प्रतिरोध में अपने सर को दीवारों से टकराकर रही थी, तब माँ की ममता ने लहूलुहान बेटी को अंक में समेट लिया था।
“जान लेकर मानोगे?” माँ बिफरी थीं. उस क्षण पिता पिघले थे। जिंदगी में पहली बार माँ ने उन्हें निर्दयी सम्बोधन से उकेरा था। वह सहम गए थे। सारी तोहमत उनमें आकर स्थिर हो गई थीं। उन्होंने सहमति दी और लड़की ने फिर उनकी हर सलाह को पूर्णतया अंगीकार करने का इरादा कर लिया था। भरपूर तृप्ति का सबब था।
अपने पिता को न पहचान कर लड़की ने उनका कहन पालन करने का निश्चय किया। उस लड़के से उसके विवाह की अनुमति देकर उन्होंने जो उसे उपकृत किया था, उसका ऋण चुकाने हेतु उसने उनके कहन को आदेश की तरह परिपालन किया था। परिणति वह वर्ष-भीतर ही वापस थी।
माँ शायद वही थीं किन्तु वक़्त बदल गया था। अब वे पिता के साथ हो ली थीं। उसे माँ की बात अच्छी तरह, मगर कुछ बेतरतीब ढंग से याद है कि तुम्हारी मर्जी से शादी हो रही है, निभाना. लड़की के जीवन में आत्मविश्लेषण का मौका था। उसके प्रति जो आकर्षण था वह लड़के के प्रति पतित्व और अपने पत्नीत्व के आधार पर ही था या परस्पर यह आकर्षण प्रेम उसकी सज्जनता, पद प्रतिष्ठा और शिष्टता के प्रति था, जो टूट गया प्रतीत होता है। पहले वह अनुभव शून्य थी, अब नहीं।
‘माँ फिर आप माफ कर सको ... मुझे माफ कर देना। क्या पिता ने अधर्म से, छल से, कपट धोखा से उसे पति हीन नहीं किया है ? सिर्फ प्राण लेना ही जीवन लूटना नहीं है बल्कि श्रीहीन कर देना भी मृत्यु से कम नहीं। पत्थर सिर्फ चोट मारने के लिए ही नहीं होते इनसे स्थिर पानी में भी लहरे उठाई जा सकती है। लड़की में वही स्तब्ध-पूर्ण मुख आँखों में न्याय की मांग करता अविश्वसनीय चेहरा था।
वह उसके भव्य सफेद सौंदर्य को देखकर वह इतना हतप्रभ हो गया था की दिमाग सुन्न हो गया था। जिसे वह दिल की अनंत गहराइयों से चाहता था वह उसे वैसी नहीं लगती थी जैसा उसने सोच रखा था। दिल की सच्चाई और सही निर्णय से दुर्भाग्य का कोई संबंध नहीं है। भाग्य-दुर्भाग्य के आपने ही चक्र और नियम हैं। 

कितनी ही देर तक लड़की को देखता रह जाता है। वह उससे अलग हो रही थी अकारण, यह कहते हुए कि तुम वैसे नहीं निकले जैसे दिखते थे। उस दिन वह हंस दिया था। उसने देश परदेश देखा था, लड़कियां और स्त्रियाँ भी देखी थीं किन्तु ऐसी, जिसकी काया उसकी अवश्य थी परंतु अंदर अक्षरशः पिता थे, कतई नहीं। वह किसी भी चीज को डूबकर नहीं सोचता था जबकि वह क्षुद्र बातों को भी गंभीर मुद्दा बना लेती थी। समय बदलने के साथ वह बिल्कुल नहीं बदली थी, आखिर वह कब तक बदलता?
उसने जो कुछ लड़की से कहना चाहा था, वह समझ गई थीं किन्तु उसके दिल दिमाग में छाई पिता कि उक्तियाँ सदैव विचरती रहती थी.... ‘लव मेरिज से फायदा क्या यदि इसमें भी दहेज देना पड़े?’ ...’यह लो आठ लाख- अब इसमें चाहे कार खरीदो, फ्लैट, वर्ल्ड टूर, या फिर विवाह खर्च !’ (जबकि वह उनकी एकमात्र संतान थी और संपदा करोड़ों के पार)।.. फिर पिता ने लड़के की सलाह की अनदेखी की। पिता ने लड़की को नामित करने से भी इनकार कर दिया था।
जाते हुए लड़की ने उस पर लालची और लोभी का भी तगमा अटका दिया था। यह कलंक है उस अपराध का जो उसने किया ही नहीं था। इस तोहमत से भी वह विचलित नहीं हुआ था। क्योंकि वह जानता था कि वह ऐसा नहीं है। लड़के ने अपनी जमा पूजी से सब कुछ इकट्ठा किया फ्लैट, कार और यूरोपियन टूर भी। वह घर खर्च में भी कोई सहयोग के लिए अनिच्छुक थी,यह पुरुष जिम्मेदारी है! खीज कर उसने अपना खर्च खुद उठाने को कहा था, और तभी लड़की ने उसका घर छोड़ दिया।
लड़का एक बार उसे अलग रहने के दरमियान मनाने गया था अपनी बहिन के विवाह का निमंत्रण देने।... ‘ऐसे शुभ अवसर पर घर कि बहु को घर में होना अतिआवश्यक है,’ उसके पिता ने कहा था।
‘जब आपसे ही अलग हूँ तो अन्यों से जुड़ाव कैसा?’ लड़की ने घृणा तिरिस्कार और रौब से जाने को मना किया।
‘तुम्हारा क्या ख्याल है, हम इन तीन वर्षों में आपस में अपने प्यार को इतना विकसित नहीं कर पाएं कि आपस में अलग होने के भय से सहम जाएं?’ लड़के ने पूछा था। इसमें संदेह नहीं है की हर एक के पास कुछ न कुछ ऐसा होता है जो मूल्यवान और महत्वपूर्ण होता है और वह अपने प्रिय को देना चाहता है। उसका गिड़गिड़ाना जारी रहा, शब्द वाक्य बहते चले गए।
 हर युगल व्यक्ति चाहता है की दूसरा उसे पहचाने और उसके भीतर पहुंचे उसकी आत्मा में प्रवेश करें। यह हो ना सका। वे एक दूसरे से परिचित होकर भी अपरिचित रह जाते है।
किन्तु उसने कुछ अलग सा जवाब दिया था, ‘मैं घटित परिस्थितियों की सफाई नहीं चाहती हूँ। जो कुछ हम में घटित हुआ है, उसे वहाँ के वही छोड़ देना है। अब स्थितियाँ पहली जैसी नहीं रही है और ना भविष्य में रह पायेंगी।‘
एक अर्थ भरी दृष्टि देखकर कहा, ’यह अस्वाभाविक प्रवृति है. तुम्हारे प्रति गुप्त श्रद्धा प्रेम के कारण स्वयं के हाथों स्वयं को बलिदान करना नहीं हुआ !’ उसे लगा कि लड़की परिचित भी नहीं सिर्फ एक अजनबी -एक भयानक अजनबी। उसका दम घुटने लगा, कराह उठा। उसकी बातचीत, कष्ट, दुख, सुंदर चेहरा, बेवकूफ चेहरा, शालीनता सब छल है-जो खींचता है, आकर्षित करता है, उसी तरफ मन चल पड़ता है। लड़का वही स्तब्धपूर्ण मुख, आँखों में न्याय की मांग करता हुआ, करुण मूर्त भाव लिए वापस लौट आया था।
 ‘आप अगर माफ कर सको .. मुझे माफ कर देना।‘ लड़के ने विह्वल होकर अपने माता-पिता से कहा। वे खेदमय आश्चर्य में थे. फिर वे तीनों रोने लगे माता-पिता और बहन, जैसे घर में कोई गमी हो गई हो !
लड़की को वह याद आता था किन्तु वह बताती नहीं थी। उसने उसके पैसों से खरीदी कार वापस कर दी। किन्तु उन्होंने उसे लड़की नहीं दी। वह इतनी मौन-गंभीर होती जा रही थी कि किसी भी व्यक्ति से रहा नहीं जाता होगा। उसके भीतर एक अजीब व्यथा से दिल कुम्हला रहा था। उसका शरीर शिथिल हुआ जा रहा था। उसने लड़की के कंधे पर हाथ रखा जिसे उसने सहजता से हटा दिए। उसका विच्छेदन अंत भटकने का शिकार था, फिर भी उनमें अभी तक चेतना थी, ऊष्मा थी।
माँ को कोई कसूरवार नहीं लगता। कभी वह पति, तो कभी बेटी और कभी दामाद की तरह देखती और चुप लगा जाती। जैसे कि वह खुद कसूरवार है! वह विवश थीं। उसे पति से सहमत होना आता था।
लड़की वापस नहीं मिली। प्रति उत्तर में तलाक का नोटिस मिला। उस पर मानसिक और शारीरिक प्रतारणा का आरोप लगाया गया था। इन आवश्यक प्रथकीय वर्षों में उसमें कभी भी लड़की से संपर्क साधने कि कोशिश नहीं की थी, क्योंकि तब प्रथकीय समय बढ़ जाता और वैसे भी उसे नीली आँखों वाले उसके काईया पिता से काफी एलर्जी विकसित हो चुकी थी, और अब तो वह पूरी तरह पितामय हो गई होगी।
तीन वर्ष केस चला, किन्तु फैसला नहीं हो रहा था। वकीलों ने आपसी सहमति से केस समाप्त करवा दिया। लड़के को सिर्फ पंद्रह लाख देने पड़े गुजारा भत्ता के रूप में। लड़के-लड़की को अब तक समझ में नहीं आ रहा था कि इस प्रकरण का खलनायक कौन है। वे खुद या अन्य कोई? प्यार करने वाले इस कदर तक निष्ठुर हो जाते है? लड़की रुवासी थी तो लड़का व्यथित। दोनों शर्मसार क्या कहते ?
‘हम किसे दोष दें?’ वह भीरु स्वर में बोली।
 ‘हम नियति कि सामने घुटने टेक देते है।‘ लड़के ने अफसोस किया।
  अदालत में तलाक मंजूर हो गया था। लड़का और लड़की कानूनी रूप से भी अलग हो गए थे। वस्तुतः अलग तो वे तीन वर्षों से ज्यादा से थे। जब से वह आई थी उसके माँ बाप दहशत में थे। जब भी वे उसे देखते तो ऐसा लगता कि उसमें निरीहता टपक रही है।
समय आगे ही नहीं चलता है कभी पीछे भी चल पड़ता है। वह वैसे फिर हो गई जैसे गुड़गाँव नौकरी पर जाने से पहले थी। अब लड़की पुनः पिता के आधीन हो गई थी। गुड़गाँव छोड़ दो। वह नौकरी छोड़ दो। यदि वर्क फ्रॉम होम हो सकता है तो वही नौकरी करो। वरना उसका मोह नहीं छूटेगा। ..। घर में ऐसे रहो जैसे अस्तित्वहीन हो।..। अगर घर से बाहर कदम रखना पड़े तो हम तीनों लोग एक साथ चलेंगे। बाहर अकेले सिर्फ मैं..! ‘उससे अब भी खतरा है।‘ वह सुनती रही और मानती रही.
लड़की के सुबह से शाम तक कार्यक्रम निश्चित थे। जिसमें एकाग्र होकर वह सुबह-शाम होती थी। किन्तु उसके दिमाग में एक अस्थिर बेचैनी बनी रहती। सदैव पिता की हिदायतें गुँजती रहती। वस्तुतः उसका बोलना, निकालना, मिलना सीमित था, जो लड़की तरफ से नए की तलाश के प्रतिकूल करता था। उसके इस एकांत प्रिय जीवन से परिवार में कोई खुश नहीं था। किन्तु जन लज्जा के अनुकूल था।
“मैं तेरा दूसरा व्याह करूंगा, अपनी जाति-समाज के लड़के से और वह भी अविवाहित से।” लड़की के पिता ने आश्वस्त किया। पिता ने बहुत कुछ अमूल्य दिया है उसमें आत्मीयता सर्वाधिक है और उसके अनुरूप ही सुवासित स्मृतिया ही कैद है किन्तु कोई अप्रिय गंध अवश्य रही है जो कि न्यायसंगत नहीं है।

लड़की ने सोचा- क्या अपनी जाति-समाज में वैवाहिक संबंध-विच्छेद नहीं होते है ? उसकी अपने मामा के लड़के का सजातीय वधू के साथ तलाक हो चुका था। तब उसका कारण बहू क्यों बनी थी? उसने सोचा कि विवाह गैर जरूरी है ? किन्तु वह अपने रुख पर अडिग नहीं थी फिर भी ...
“क्या दुनिया में लोग अकेले नहीं रहते!“ लड़की ने अस्पष्ट, धीमे एवं आर्द्र स्वर में पूछा।
‘एक सकारात्मक जीवन जीना असंभव है।‘ पिता ने कहा।
किन्तु पिता उसके लिए किसी सजातीय नए कुँवारे लड़के की तलाश नहीं कर पाए। यह एक तरह से असंभव ही था। इससे उलट तो मुमकिन था जैसा कि पहले समाज में प्रचलित था।
लड़की के हृदय में सारी मायूसी, अवसन्नता तथा म्लानता के बावजूद बहुत गहरे-गहरे, कहीं कुछ तो फड़फड़ाता रहता था। शायद वह सेक्स चाहना थी जो दबी रहकर भी उभर आती थी। वह इससे अनजान ना रही थी । उसका अनुभव जो सारी दीवारें, सारी परतें, सारे व्यवधान तोड़फोड़ कर बाहर निकालना चाहती थी। किन्तु नैराश्य में, अथक उत्साह से और निःशेष आशा से इस कर्महीनता के निर्जीव सागर में डूब जाना होता है। फिर भी सानिध्य की कसक रह-रह कर उठती रहती ही थी। इस घुटन भरे माहौल में वे उन दो पुरुष आँखों की तलाश सदैव रहती जो सहज मैत्री, ससंपर्क एवं संसर्ग से परिपूर्ण हो ! इस विराट एकांतता में बर्फ सी जमी हुई शारीरिक मिलन की चाह कही से एक ऐसी दृष्टि की तलाश में अवश्य रहती जो अपनी गरम साँसों से पिघला सके।
पिता को लगा कि इस जगह और मकान में ही खोट है। वह जिद में थे। उन्होंने हुक्म दिया अब यहाँ नहीं रहना है। उसने नई नौकरी की जिसमें वर्क फ्रॉम होम सुविधा थी। प्रतिदिन जाना नहीं था..। हाँ... ! यह ठीक है। वे यहाँ का घर किराये पर देकर पूना में शिफ्ट हो गए, एक फ्लैट में... यहाँ भी उसे वैसे ही रहना था जैसे लखनऊ में... सिर्फ आपस में। उसने सोचा जब वर्क फ्रॉम होम से नौकरी करनी थी तो लखनऊ अपने घर से क्यों नहीं? उसे लगा कारागार बदल दिया जाएगा, इस आशंका के तहत कि लखनऊ से भागना मुमकिन हो सकता है।
लड़की के पंख यदि काटे नहीं गए थे तो भी चिपका दिए गए थे जिससे कि वह उड़ ना सके। उसे घर की कैद मुहैया करवा दी गई थी। और सुरक्षा के कारण उसकी जेल लखनऊ से पूना स्थानांतरित कर दी गई। यहाँ से भागने उड़ने कि गुंजाईस नहीं थी कम से कम उसके पास तो नहीं। हर माह मिलने वाला उसका वेतन पिता के खाते में होना था। यह कार्य लड़की को नियमतः करना अनिवार्य था। वह फ्लाइट लेस बर्ड, कीवी के रूप में स्थिर हो गई थी, किन्तु फ्लैट-घर की चहारदीवारी में सीमित।
.... पूना में आए हुए भी पाँच साल बीत गए थे किन्तु वह वैसे ही थी पुनः अविवाहित। उसे यह समझ में नहीं आता था कि पिता को कैसे समझाया जाए।.... एक कटु सच को कैसे झूठ में परिवर्तित किया जा सकता है? लड़की में किसी के प्रति कोई आतुरता नहीं उपजती थी। खाली खाली नजरों हर चीज देखती और कोई राह ना मिलने पर वापस अपने में स्थिर हो जाती। एकाकी शून्य में विचरा करती किन्तु सबसे उदासीन। उसे अपने से ही मुलाकात असंभव लगती थी। थी। उसकी अति व्यस्तता चमक रही और उसका परायापन जाग रहा था।
इतनी बड़ी दूर निकल आने के बाद भी वह अक्सर लौटती थी, उन दिनों में ... पहले वह सेक्स के प्रति अशिक्षित तथा अपूर्ण होते हुए भी आधुनिकता के संपर्क में थे। एक दूसरे के प्रति प्रलोभन से दब चुके थे। उसके प्रति वर्जना की भावना नहीं थी। अकसर वह पूछ लेता ‘सेक्स करेंगी ? और सहमति होने पर ही वह संसर्ग रति होते। फिर से उसकी याद आई कि वह इतना बुरा नहीं था जितना महसूस कराया गया था। आखिरी मुलाकात के समय वह उससे सीधी आँखों से देख नहीं सकी थी। घने काले बादलों का झुंड उसकी आँखों में उतर आता, किन्तु बरसात नहीं होती। शायद लड़के कि बरबादियों की हवा उन्हें उड़ा कर कही दूर ले गई है। वह पिता की खुशफमियों की जंग में शतरंज के राजा की तरह बेबस, वजीर के रहमोकरम पर जिंदा थी।
वह जानती थी कि पिता का पुनः स्थापित शासन का कारण उसका प्रेम विवाह असफल होना था। किन्तु उसे शारीरिक और मानसिक रूप से कैद करना अकारण है। इसके बावजूद उनकी कैद निरर्थक सिद्ध होती क्यों जा रही है ?वह सोचती यदि पिता धोका धड़ी करके उसे अविवाहित सजातीय लड़के से बांध भी दिया तो जिंदगी भर के लिए उसकी ताड़ना प्रताड़ना की हकदार वही तो होगी? फिर क्या वह यह स्वीकार कर पाएगी कि वह अभी तक अविवाहित है ! झूठी का तगमा कब तक वह ढोएगी ? क्या यह कारण नहीं होगा कि उसे एक और तलाक के लिए सदैव तैयार रहना पड़ेगा? उसे लगता है कि अपनी असफलता उपरांत पिता की, प्रत्येक शर्त स्वीकार नहीं करनी चाहिए थी। हाँ...! निःसंदेह वह पिता की हिदायतें नहीं बल्कि शर्तें ही थी उसे साथ रखने की। वह विद्रोह चाहती किन्तु उसके पास कोई संभावनीय साथी की गुंजाइश नहीं थी। उसके विलग होने के निपट अकेले में वह क्षण फिर... फिर आता, जब उसके शरीर की धमनियों में पुरुष-स्त्री की मित्रता एवं संसर्ग संपर्क के एक नशे की तरह प्रवाहित होता। लड़के के साथ उसके प्रथम मिलन स्मरण मात्र से ही उसका चेहरा रक्तिम हो आया था। उसे लगा तब वह ज्यादा सुंदर लगती थी।
पिता के प्रति नफरत उपज रही थी। माँ का कोई रंग नहीं था, वह कभी लड़की के रंग में होती तो कभी पति के साथ। पिता को उसकी उससे विवाह की एक गलती याद है जो उसने लड़की को नामिनी बनाने की सलाह दी थी किन्तु उसके प्रतिकार में उनकी अपनी अक्षम्य गलतियां जीवित उसे खा रही थीं। निस्सहाय की भावना से आत्मविश्वास का लोप होता है और एक दूसरे पर विश्वास करने की क्षमता कम होती जाती है। उसमें गुस्से का, क्षोभ का, खीझ का, और अविवेकपूर्ण कुछ भी कर डालने के प्रवृति विकसित होती जा रही थी।
एक सपना अकसर उसे रात में प्रताड़ित करता है। वह एक कमरे से भी बड़े पिजरे में बंद है और वह पिजरा बहुत मजबूत लोहे के सीखचों से सुरक्षित है और बाहर उसे शेर, बाघ और भेड़िया घेरे हुए है। उसे ललकारते रहते है की बाहर निकले तो उसे हड़प-गड़प जाएं। अचानक उसे शेर बाघ और भेड़िया माँ, पिता और उस लड़के में तबदील होते लगे। वे अट्टहास कर रहे थे। फिर वे लड़ झगड़ कर शांत हो गए या पस्त हो गए चिल्लाते, गुर्राते हुए। बाहर शेर, बाघ और भेड़िया थक कर, लस्त-पस्त चुप थे। उसने अपने पिंजरे को देखा वह निकल भागना चाहती थी किन्तु पिंजरे में ताला जड़ा था। वह निराश हताश रो पड़ी। उसके रोते ही सब जग गए और फिर उसपर हमला करने लगे किन्तु पिंजरे के लौह आवरण में वह सुरक्षित थी। और उसकी नींद खुल जाती. देखती है सही में, वह सपनों में भी रोई है।... एक रात में ऐसे ही उद्दिन्ग सोई थी... ‘उसके पिंजरे का ताला खुला था और बाहर सभी हिंसक सोये थे। उसने धीरे से निकलने को सोची और आहिस्ता से बिना खटक किए निकल गई... वह प्रसन्न थी..’ यह भोर के सपने की हकीकत थी।
 विषाद, अवसाद में डूबती उतराती लड़की उसकी आरोही आत्मा त्रस्त निष्कृति सोचती. वह मानती कि हर शख्स में कोई दूसरा भी होता है। बुरा-बुरे के अलावा भला भी होता है और भला-भले के अलावा बुरा भी होता है। उसका अपना जीवन साथी चुनना स्वयं का चुनने का भविष्य स्वतंत्र रखना चाहती है। वह खूँटे से बंधी निरीह बलि पशु सी नहीं रहना चाहती। यौनिक प्रसंगों की अनदेखी नहीं की जा सकती । उनका भी जीवन में सुरभित स्मृतियाँ है उनके प्रति प्रतिबंधता होनी आवश्यक होती है। उसके लिए मन-पसंद का बड़ा महत्व है, किन्तु यदि प्रारंभ अविश्वास से होगी तो... ?
लड़की का कल्पना प्रिय मन ने हर उस सुदर्शन व्यक्ति के आस-पास चक्कर काटने लगता, फिर विस्मयातुर दृष्टि से सकुचाकर खो जाता, मन की अनंत गहराइयों में।
साँझ जब बिल्कुल झुकी होती तो उसका मन पुरुष संसर्ग की चाहना का शिकार होता। उसमें अपनी आकृति खो गई होती, पहले झेप, फिर लज्जा, फिर संकोच, फिर बातचीत, फिर रोमांस का विकास कुछ इस तरह होता कि वह आत्मरति में लीन हो जाती। आत्मरति से क्षुधा तो शांत हो जाती किन्तु संतुष्टि न मिलती। मनुष्य और प्रकृति के आपस में अधिकार करके छा जाने के अप्रतिम रूप के साहचर्य का क्षण आता, किन्तु खो जाता भयावह अटल गहरहियों में। विशाल गहरा काला आकाश और नीचे निस्तब्ध शांति में कलपती वह। मानो नग्न आकाश, मुक्त पल और निरपेक्ष मस्त आत्म धारा का खुमार और ऐसी लंबी एकांत रातें में वह होती थी। उसे लगता लाखों नग्न धारणाएं फूटकर निकल रही है और अविभाज्य अंग में तिरोहित हो रही हैं।
पिता के प्रति दुराग्रह या दुर्भाव का एक भी विचार उसके दिल में नहीं है। किन्तु आजकल के माहौल में बिना उठापटक और खींचातानी से वैवाहिक संबंधों को नकारात्मक या निन्दात्मक नहीं किया जा सकता। जबकि गहरी आत्मीयता एक ऐसा आदर्श है जो आज के समय तिरोहित होता जा रहा है। वह एक सीमा के अंतर्गत अपना मतभेद दिखाती लेकिन शालीनता की पकड़ कही भी ढीली होने नहीं दी। शोषण और नियंत्रण उसकी व्यक्तिगत जिंदगी के स्थायी भाव बनते जा रहे थे। परिवार, करिअर और कठोर पारिवारिक नियन्त्रण उसे छलने और डँसने लगे थे. हताशा के उस दौर में उसकी माँ ने कई बार... ’पिता सही है’ यह ज्ञान माँ ने दिया । अब बड़ी शिद्दत से उसे पलायन की तलाश थी।
एक दिन उसके मैनेजर ने कंपनी में बुलाया और कहा, “वर्क फ्रॉम होम में कम से कम दो दिन सेंटर आना आवश्यक है।“ प्रस्ताव दिया, “यदि पांचों दिन आ सके तो उसका पैकेज बढ़ जाएगा और आने-जाने का भत्ता या सुविधा मिलेगी... नहीं तो नौकरी ज्यादा दिन...नहीं...?”
एक लंबे और कष्टदायक अरसे के बाद बेतकल्लुफ़ी से उसके पास बैठ गई। लड़की को लगा कि प्रस्ताव उसकी पिंजरे से मुक्ति है। उसने तुरंत हाँ कर दी।... शर्त यह रखी कि उसके घर को यह सुनिश्चित किया जाए कि वर्क फ्रॉम होम की सुविधा समाप्त हो गई है।
इसमें संदेह नहीं है था कि इस प्रस्ताव के कारण उसमें एक सकारात्मक ऊर्जा भर दी थी। अपनी हार से मन में उत्पन्न हुई अभाव और आत्मग्लानि जलन को वह शांत करना चाहती थी। इसमें उसकी पिता के प्रति संकल्पना, प्रस्तुतिकरण और निष्पादन से उनकी पुत्री प्रियता कहीं से भी प्रभावित नहीं होती है।
पिता पर लड़की का इस तरह से समझौते के विरुद्ध एवं विकल्प हीनता के कारण एक क्षोभ के तहत, काली भावना छाई हुई थी। पिता के चेहरे पर आश्चर्य एवं घृणा के भाव रहे होंगे, फिर भी यह पिता-पुत्री की जीत-हार से परे जीवन की सहजता में जो व्याप्त है वही प्राप्त है के अनुरूप है। उनका उस असभ्य और बर्बर वृति के सामर्थ्य और शक्ति के प्रति खिंचाव रहना एक तरह की प्रवृति ही है, लड़की ने सोचा।
दोनों के बीच दो जमानों का फर्क था, फिर दोनों के बीच बड़े फासले थे। इस मध्य वर्ग में रहते हुए उसके बाल एकदम सफेद हो गए है और वह जन घृणा को पहचानता था। लड़की की अति व्यस्तता चरम पर थी और साथ में उसका परायापन जगमगा रहा था।
उस दिन मौसम खुशगवार था और पिता के हाथ में अखबार था। वे बेटी के लिए वैवाहिक विज्ञापन में उलझे थे कि वह दिख गया। एक सजातीय विधुर लड़के का प्रस्ताव उन्हें भीतर तक भिगो गया। उन्होंने धीरज की सांस ली।
पिता ने तुरंत-फुरन्त अपनी लड़की का प्रस्ताव प्रेषित कर दिया। लड़की का एक पृथक कमरा अवश्य था लेकिन पिता का बहुत दिनों के बाद इस तरह का उत्साहित पत्र-व्यवहार, उसे कई प्रश्नों से भर गया।
कुछ ही दिन गुजरें थे कि, प्रति उत्तर आ गया, सभी संलग्नकों सहित।
“कैसा लगता है तुम्हें?” पिता ने लड़के का फोटो दिखाते हुए पूछा।
लड़की ने एक गहरी सांस खींची, जी धंस गया। फिर दिल की बात बताई। “काफी गहरा रंग है,” लड़की ने झिझकते हुए कहा।
“ये तर्क, ये उक्तियाँ ,यह लॉजिक, यह फिलास्फी । जिंदगी को साफ दिखने वाले तथ्यों जिंदगी को जानबूझकर तोड़-मरोड़कर पेश करने के तरीके है ! तुम किसे सिखाती हो ?...मध्यवर्गीय घर, भारतीय संस्कृति और उस पर पिता का घर में, उपहास, तिरस्कार और निंदा का विषय बनती है। लेकिन जब वही अच्छे खाते-पीते परिवार की गृहलक्ष्मी बनती है तो उसका सम्मान आसमान छूता है।..” वे इस तरह की दर्जनों बाते करते थक से गए थे। उनके मस्तिष्क में एक उत्तेजना फैल गई थी। धीरे धीरे वे शांत हुए स्तब्ध हुए और फिर शर्मिंदा हो गए।
लड़की शांत निर्विकार बैठी रही। उन्होंने जो कहा उनका ज्ञान और अनुभव था, उसका नहीं। वह स्त्री आधुनिक, खुली दृष्टि-सम्पन्न नवयुवती है। पिता उसके क्रोध के विषय नहीं थे। सिर्फ इसलिए कि उनका उसके प्रति अच्छा व्यवहार ! क्या उनकी सच्चाई का यह अंतिम प्रमाण है, और निर्णायक प्रमाण माना जा सकता है? प्रश्न जिंदगी में होने वाली गलतियों का नहीं है। प्रश्न उन रिक्तियों का है जो बीच में रहते हुए गलती सुधारी नहीं जा सकती। कौन बेमतलब लड़ाई-झगड़ा करें? उसे स्वयं अपने निज का परिष्कार और विकास करना हैं। मुक्ति अकेले में अकेले को नहीं मिलती। उष्म संपर्क हीनता के कारण जब हृदय का उपयोग नहीं हो पाता, तो मूल्यवान स्वप्न खो जाते हैं. महत्वपूर्ण भाव और मार्मिक विचार टूट जाते हैं और सृजनशील संकल्प शक्ति गायब हो जाती है।
प्रत्येक संवेदनशील व्यक्ति प्रेम का भूखा है। अपने से प्रेम का अभाव और ज्यादा प्रेम की भूख बढ़ाती है। ज्यों ज्यों परिस्थिति बिगड़ती है वह सहानुभूति के लिए और तरसता है। लेकिन उसकी प्रेम प्रदान करने की शक्ति चुकती जाती है। अपनी अस्तित्व रक्षा हेतु हारे-थके अपन के सामने समर्पण करते चले जाते है।
 हताशा के इस दौर में लड़की ने पिता का वैवाहिक प्रस्ताव बिना किन्तु-परंतु के स्वीकार कर लिया था। परिवार, कैरियर, कठोर पारिवारिक नियंत्रण और हाई-प्रोफाइल जॉब-लालच ने व्यक्तिगत पसंद-नापसंद को दरकिनार कर दिया था। थोड़ा बौद्धिक क्षमता का व्यक्ति क्या इस तरह की पराधीनता स्वीकार कर पाएगा?
पिता ने इस विवाह में दिल खोल कर खर्च किया और इसमें दूसरे लड़के और उसकी माँ का मुंह बंद कर दिया। इस लड़के के पिता नहीं थे। पिता वापस लखनऊ आए और लड़की को नौकरी छोड़नी पड़ी पिता-माता के साथ देने के लिए. वे दोनों आश्वस्त थे अब की बार सब ठीक होगा।
लेकिन सुख लड़की के पास नहीं आता था वह उसके बारे में सोचती भी नहीं थी। उसने दुख रहित जीवन की कल्पना करके ही अपनी सहमति दी थी। दूसरे लड़के के पास आने पर लड़के में सुख की भरमार थी किन्तु उसे चैन का अहसास भी नहीं मिला। यह लड़का सिर्फ अपनी माँ के विषय में सोचता था। कभी उसके दुख सुख के विषय में जानने के आवश्यकता नहीं समझी। वह अपना सुख लेकर उसके पास दुख छोड़ जाता। वह उससे अलग होना चाहती थी किन्तु वह उससे अलग नहीं हो पाती थी, क्योंकि रास्ते बंद थे। इसलिए वह एक अजीब गुस्से में तनी रहती। जब कभी माँ या पिता का फोन आता तो शिकवा शिकायत नहीं सिर्फ भर्रायी आवाज से स्वागत करती।
मरता कोई नहीं है, किन्तु जिंदगी में जानबूझकर बुराई मोल लेना, क्षोभ पछतावे की जनक होती है। उसी का शिकार हो गई थी वह। लेकिन वह ढीली पड़ चुकी थी। उसके मनोहर व्यक्तित्व का लोप होता जा रहा था। लड़की के मन में कुछ ऐसी तश्वीरे फैल गई थीं जो उसके मन के कुत्सित लोक में जाने कब से छिपी पड़ीं थी। वही कहीं एक घर और उसका अहाता उसे दिखता ... एक लड़का दरवाजे पार खड़ा उसके स्वागत में उत्सुक है, किन्तु वह उलझन में है, कुछ झझकती है। कुछ पूछती है, जिज्ञासा और कौतूहल से भरे जीवन में झूज पड़ने का साहस नहीं है किन्तु अपने सम्मान को पुनर्स्थापित करने हेतु वह उसके ओर चली आई।
किन्तु इसके बावजूद जब वे जुडते है तो उनके बीच एक गहरा पर्दा पड़ा रहता है। दो समयों का अंतराल था जिसमें अतीत की भावना और आगामी की चिंता और दुश्चिंता चेतना और संस्कार दोनों संचित होते है। अंतर के केंद्र में सिमटा हुआ वैविध्य की विभिन्न सतहें विद्यमान रहती है।
ये दूसरे के दिन थे। दूसरा मांस का भूखा था और माँ का गुलाम। उसके भीतर अकसर एक अंधी वासना उठती थी जिसका लड़की के मन से कोई रिश्ता नहीं था। वह उसे जब चाहे आपने पास घसीट लेता। अपनी चालीस सालों के भीतर दबोच लेता और वह खिंच आती। बिल्कुल एक कबूतर की तरह बाज के सीने से। तब उसे पहला याद आता जो पूछता था ‘सेक्स करेंगी ?’....और उसकी स्वीकृति पर ही आगे गतिमान होता. उसे लगता कि वासना और वेदना एक ही तरह से व्यवहार करते है. इस वासना में तृप्त नहीं आती थी बल्कि अपने प्रति वेदना, करुणा उभरती थी।
वेदना और वासना की अधिकता आत्मविश्वास की कमी और निस्साहयता को जन्म देती है। दोनों बाहरी दुनिया द्वारा आरोपित होती है। वेदना और वासना आत्मा को कुचल देती है। इन सब से निजात अपनी भीतर समाई तेजस्विता के प्रतिकरण से ही होता है। उसमें तेजस्विता की कमी नहीं थी। जिसके कारण उसमें ताकत और हिम्मत बची हुई थी। लेकिन ताकत और हिम्मत हमेशा साथ नहीं देती हैं. बाहर मकड़ी के जाले समान फैले चक्रव्यूह से पार पाना आसान नहीं है। उसे खुद ही कुछ करना पड़ेगा।
उसने दूसरे पर भी समर्पण नहीं किया था। उसकी माँ और उसमें दो जमानों का फर्क था। लड़के की माँ समय से 50 वर्ष पूर्व की बहु के रूप में देखना चाहती थी जो वह बन नहीं सकती थी। बुढ़िया ने बताया पाँच साल बीत जाने पर भी पहले वाली माँ बन न सकी थी। उसमें खोट थी। तुम से बड़ी उम्मीद है। लड़की को उसकी बात असंगत लगी, लेकिन उसने शालीनता से कहा, “हर दम खोट लड़की में ही नहीं होती लड़कों में भी होती है।“ लड़की ने प्रतिवाद किया।
वह बिगड़ गयी। “इसका क्या मतलब ? मेरे लड़के में खोंट है ? बेटे ! देखो बहु क्या कह रही है ?”
तकरार की परिणति सदैव लड़की के साथ हिंसा में बीतती थी। जिसे माँ बेटे दोनों अंजाम देते थे। परंतु लड़की डरती नहीं थी।
आखिरी बार उसने पुलिस बुला ली. वह हंस रही थी। उसके आगे के दाँत टूटे हुए थे। वह एक अजीब से तनाव में थी। चेहरा सूजा हुआ और शरीर कुछ-एक जगहों से टूटा-फूटा। कुछ अफसोस के साथ वह लड़के को देख रही थी। वह उससे कुछ कहना चाहती थी, लेकिन अब वह लड़की को कुछ सुनना नहीं चाहता था। उसे यह विचित्र सा लगता था।

दूसरे के यहाँ से वह भाग आई। वह भागकर घर चली आई। बहुत देर तक बूढ़ी का चेहरा उसके पीछे पीछे भागता रहा । फिर अचानक गायब हो गया और अपने पिता का चेहरा एक अजीब निगाहों से उसे निहारता मिला, जैसे कुछ पूंछ रहा हो?

लड़की वापस मुड़कर अपने शहर को चल दी. दूसरा भी कुछ देर तक सोचता रहा फिर बोला, ‘जा सकती हो फिर ना आने के वादे के साथ।‘ किन्तु यहाँ रहना है तो माँ के मन-मुताबिक। लड़की को उसकी बात असंगत लगी। लेकिन फिर उसे पहला वाकया याद हो आया उस वापसी को भी माँ-पिता ने ना पसंद किया था। लड़की डर सी गई। लड़की के पैर ठिठक गए। किन्तु उसके पास लौटना नहीं था। उसने सोचा अब तुरंत चलना चाहिए।  

     पिता उसकी तरफ देखता रहा। वह परेशान था कि लड़की को क्या हुआ ?

 “नहीं ! उसने सिर हिलाया।... क्या बात है ?”

“कुछ खास नहीं।“ उसने लापरवाही दिखाई।

“कुछ भी नहीं ?” पिता-माँ दोनों को आश्चर्य हुआ।

“वह मुझे अपनी माँ के समय, माँ की तरह ढालना चाहता था। मैं 50 वर्ष पीछे का जीवन अपनाना नहीं चाहती थी।

पिता ने सिर उठाया । हैरत में लड़की को देखा। उसका चेहरा शुष्क गरमाई में तप रहा था। जिसमें लिखा था -लोग निर्वाह करते है, निभाते है, बूढ़े हो जाते है, फिर मर जाते है, किन्तु साथ नहीं छोड़ते।

माँ सचमुच उसकी ओर देख रही थी -उसकी क्लांत थकी आँखों में एक द्रवित सा मोह झलक आया था। किन्तु पिता की कर्कश आँखों में बहुत ही निर्जन बीहड़ फ़ैला था। एक क्षण के लिए वे विचलित हो गए। वे सहसा समझ ना सके कि क्या किया जाए, अब क्या होगा?

“इसका कोई फायदा होगा?” पिता ने चिढ़ते हुए कहा.

“लेकिन हम अपना रुख न्याय-अन्याय की तरफ न दे सके, सहन न कर सके तो...?” उसे लगा कि पिता के भीतर पाप-पुण्य, न्याय-अन्याय, प्रेम-वासना, ईश्वर-मनुष्य, झूठ-सच को समर्थन-प्रतिकार सब कुछ खो गए है। क्या कारण है यहाँ तक अपनी लाड़ली के प्रति भी ? क्या कारण है? वह अनभिज्ञ थी।

उसने डिवोर्स की प्रक्रिया स्वयं प्रारंभ कर दी थी। कानपुर पुलिस के सहयोग से उसने अपना घरेलू-हिंसा, मानसिक-प्रताड़ना का केस माँ-बेटे के विरुद्ध दाखिल कर के ही वह वापस पिता के घर लखनऊ आई थी।

 अब वह अपने घर के सामने बैठी है। साँझ का पता नहीं कब उत्तर आई थी, कब साँझ डूब गई थी? सब अंधेरे में खो गए थे। आसपास घरों की बत्तियाँ जल गई थीं। उसे लगा वह किसी दूसरे शहर में है। वह ना जाग रही थी ना सो रही थी। सोच रही थी। क्या यह संभव है की वह पहले वाले लड़के के पास लौट चले? किन्तु अब संभव नहीं है क्योंकि उसने भी दूसरी शादी कर ली थी। उसकी दूसरी शादी सफल थी और लड़की की असफल रही थी। उसके जीवन से प्रेम प्यार स्नेह सब चुक से गए थे। अब वह किसी से प्रेम कर सकेगी ? स्वप्नों की धूँध छट चुकी थी। 

वह नितांत निपट अकेली थी। जी, हाँ ! उसने इन बीते वर्षों कुछ नहीं कमाया, सिर्फ अकेलापन कमाया है। वह क्या करें ? कौन उसकी बात सुने ? वह अकेली रहेगी किन्तु कैसे ? विवाह नहीं करेगी । बहुत से लोग अनब्याहे रहते है। किन्तु खर्च तो अकेले का भी होता है ? अब तो कोई जॉब भी नहीं है।

उसे लगा कि वह अनाथ है। ….फिर कुछ याद आया उसकी अंतिम कंपनी का मैनेजर काफी सहयोग करता था, उसकी विपदाओं के निरूपण में। एक दूर का दिलासा था। 

तुरंत से पेशतर वह उठी और उसने आपने कागजों को खँगाल डाला। वह कुछ देर इस उम्मीद में खड़ी रही कि अब मेरा चेहरा उसके जेहन में उभरेगा या नहीं ? लेकिन बदहवास मन तर्क से परे होता है। आखिर में उसने चैन की सांस ली जब उसे उसका नंबर उसके मोबाईल में ही मिल गया।

उससे बात करते हुए वह अधिक विपन्न दिखाई दे रही थी। हालांकि उसके जॉब छोड़ने को लेकर वह बिफर गए थे। किन्तु वह उनसे कैसे कहती कि दूसरे विवाह की यह अनिवार्य शर्त थी, क्योंकि दूसरा व्यापारी था और कानपुर में ही उसे स्थापित रखना, रहना चाहता था।  वे अब उस कंपनी में नहीं थे बल्कि किसी और प्रसिद्ध कंपनी में उप निर्देशक पद पर बंगलोर में पोस्टेंड थे। लड़की ने उन्हें अपनी विपदा बताई. वे उसकी वेदना, कष्ट से द्रवित हुए। तुरंत अपना प्रार्थनापत्र आदि प्रेषित करने को कहा।

उसका काम बन गया जॉब मिल गई। नियुक्ति पत्र पाते ही वह चल दी।

लड़की ने जल्दी जल्दी सब तैयारी की बंगलोर जाने की। उसकी पागल सी इच्छा थी कि तुरंत पहुँच जाए। पिता ने साथ जाने के सहयोग को उसने नकार दिया। “मैं अकेली ही जाऊँगी और अकेली ही रहूँगी। किसी को साथ देने की जरूरत नहीं है। मैं पूर्णतया अकेली हूँ।“ उसने कुछ हठीले स्वर में जवाब दिया। माँ को उसका इस तरह से बोलना, निकलना कुछ अपशकुन सा लगा। वे हैरान से सन्न से रह गए। जैसे दिन में अंधेरा छा गया हो, आवाज रहित अंधेरा।       

लड़की को इस बात की तसल्ली थी कि अब वह जीवित रह सकेगी। अब उसे किसे से भी नहीं मिलना है। उसे लड़कों में आकर्षण खोता जा रहा था। विवाह के शौक ने तो आत्महत्या कर ली थी। उसे इस बात की तसल्ली थी कि वह अब किसी के प्रति जवाब देह नहीं है! वह महसूस करती है की धर्म सत्ता और समाज सत्ता सब पुरुष पक्षधर हैं, परंतु उसे स्त्री द्रोही नियम अस्वीकार है। पिता की संशय-रोक-टोक-डांट से परे वह भटकना चाहती थी। पिता से अलग रहे। इस तरह ठंडे भावना-विहीन प्रस्तर पुरुष से क्या कहे, कुछ कहना-सुनना बेकार है?लड़की के भीतर अथाह संवेदना का गहराता सागर हिलोरे ले रहा था किन्तु तनाव पूर्ण चुप्पी,पैना और तिरिस्कारपूर्ण व्यवहार पिता का उसे विचलित करता कि असहिष्णु अधैर्य पिता से अलग रहे।  

▪︎▪︎▪︎▪︎▪︎▪︎▪︎▪︎▪︎▪︎▪︎▪︎▪︎▪︎▪︎▪︎▪︎▪︎▪︎▪︎▪︎▪︎▪︎▪︎▪︎▪︎▪︎▪︎▪︎▪︎▪︎▪︎▪︎▪︎▪︎▪︎▪︎▪︎▪︎▪︎▪︎▪︎▪︎▪︎▪︎▪︎▪︎▪︎▪︎▪︎▪︎▪︎▪︎▪︎▪︎▪︎▪︎▪︎▪︎▪︎▪︎▪︎▪︎▪︎▪︎▪︎▪︎▪︎▪︎▪︎▪︎▪︎▪︎▪︎▪︎▪︎▪︎▪︎▪︎▪︎▪︎▪︎▪︎▪︎▪︎▪︎▪︎▪︎▪︎▪︎▪︎▪︎▪︎▪︎▪︎▪︎▪︎▪︎

आलेख 
डॉ. अमल सिंह ' भिक्षुक '

सम्पर्क: 133/30, भारती गंज सासाराम-821115 जिला - रोहतास (बिहार) भारत ।
ईमेल: dramalsingh@gmail.com

संवेदनाओं और विचारों की क्रांति : 'वर्जिन' का साहित्यिक विश्लेषण 
डॉ. जयप्रकाश कर्दम की हालिया प्रकाशित लंबी कहानी 'वर्जिन' अपने आप में एक विचारोत्तेजक साहित्यिक रचना है, जो आरंभ से अंत तक पाठक को अपने विचार प्रवाह में बांधे रखती है। कहानी समकालीन समाज और समय के ज्वलंत प्रश्नों से सीधे टकराती है, जो पाठक को गहरे चिंतन में डुबो देती है। इसीलिए यह अपनी विचारशीलता और संवेदनशीलता के अद्वितीय संयोग से समकालीन साहित्य में एक विशिष्ट स्थान बनाती है। कहानी अपने आरंभिक अंश से ही पाठक को गहरे सामाजिक प्रश्नों और मुद्दों से रूबरू कराती है, जिन्हें नजरअंदाज करना आसान नहीं होता। कर्दम की लेखनी इस कहानी में अपने समय और समाज के उन तीव्र सवालों से टकराती है जो अक्सर सतह के नीचे दफन रहते हैं। यह कहानी समाज के उन कटु यथार्थों को उजागर करती है जिन्हें देखते हुए भी हम अनदेखा कर देते हैं, और इसे करने का ढंग अत्यंत प्रभावशाली है।
          कहानी में समाज के कड़वे यथार्थ का प्रभावशाली चित्रण हुआ है। कहानी की नायिका, सुनीता, जो एक गरीब और असहाय लड़की है, अपने कौमार्य को बेचने के लिए विवश हो जाती है। यह कदम वह उस भयावह सामाजिक स्थिति के कारण उठाती है जहाँ बलात्कार जैसी घटनाएं सामान्य हो चुकी हैं और स्त्रियों की सुरक्षा पर प्रश्नचिह्न खड़ा करती हैं। इस निर्णय के पीछे समाज में व्याप्त असहिष्णुता और क्रूरता की नग्न सच्चाई को दिखाने का प्रयास किया गया है। 
            'वर्जिन' कहानी अपने संवेदनशील विषय और साहसिक दृष्टिकोण के कारण विशिष्ट है। इसमें लेखक ने समाज में व्याप्त विकृतियों पर करारा प्रहार किया है। कहानी का पात्र अशोक, जो सुनीता का मित्र, मार्गदर्शक और एक सशक्त व्यक्तित्व है, आदर्शवादी मूल्यों का वाहक है, और उसके माध्यम से लेखक के क्रांतिकारी विचार व्यक्त होते हैं। यह कहानी न केवल स्त्री-विमर्श को एक नया दृष्टिकोण प्रदान करती है, बल्कि समाज की उन थोथी नैतिकताओं और पुरानी मान्यताओं को भी चुनौती देती है जो स्त्रियों की स्वतंत्रता और उनके आत्मसम्मान को कुचलने का प्रयास करती हैं। कहानी का अंत पाठक को संतोष नहीं देता, बल्कि उन्हें सोचने और समाज की विकृतियों पर पुनर्विचार करने के लिए मजबूर करता है। कहानी के संक्षिप्त स्वरूप में भी गहरी अनुभूतियों और विचारों की गूंज है, जो आदर्शवादी समाज की नींव को हिलाने का साहस रखती है। 'वर्जिन' एक ऐसी कहानी है जो न केवल साहित्यिक दृष्टिकोण से महत्वपूर्ण है, बल्कि समाज को जागरूक करने और उसमें परिवर्तन लाने की दिशा में एक सशक्त कदम भी है।

         कहानी का विषय और उसका महत्त्व समाज की परिस्थितियों और मानवीय भावनाओं को समझने का एक सशक्त माध्यम होते हैं, जो हमें जीवन के विभिन्न पहलुओं पर सोचने के लिए प्रेरित करते हैं। 'वर्जिन' कहानी की नायिका सुनीता एक असहाय लड़की है, जिसकी सुंदरता ही उसके लिए अभिशाप बन जाती है। उसके पिता की मृत्यु सीवर की सफाई के दौरान हो गई, जिससे उसका परिवार गरीबी और असुरक्षा की स्थिति में फंस गया। ऐसे समाज में जहाँ स्त्री केवल भोग की वस्तु समझी जाती है, वहाँ सुनीता जैसी लड़की की स्थिति अत्यंत दुखद है। यह कहानी हमें यह सोचने पर मजबूर करती है कि समाज के गुंडे-मवाली और अन्य कुप्रवृत्तियां किस तरह गरीब और असहाय लड़कियों का शिकार बनाती हैं।

            कहानी का प्रमुख विचार यह है कि सुनीता अपने कौमार्य को बेचने के लिए मजबूर होती है। यह कदम उसकी बेबसी और उस भयावह सच्चाई को दर्शाता है जिसे वह समझ चुकी है—कि एक न एक दिन उसका बलात्कार हो सकता है। समाज की इस सच्चाई का सामना करते हुए, वह अपने कौमार्य को अपनी शर्तों पर बेचने का निर्णय लेती है। इस निर्णय में न केवल उसकी मजबूरी झलकती है, बल्कि समाज की उन क्रूर और दमनकारी ताकतों के प्रति एक प्रतिरोध भी दिखाई देता है, जो स्त्रियों की अस्मिता और अधिकारों को कुचलने का प्रयास करती हैं।

          यहाँ चरित्रों की गहराई और उनका सामाजिक संदर्भ विशेष ध्यान देने योग्य है। कहानी में अशोक का किरदार महत्वपूर्ण है। अशोक सुनीता का बेस्ट फ्रेंड, फिलॉसफर और गाइड है, जो उसे कठिन परिस्थितियों में संभालने का काम करता है। अशोक केवल एक मित्र नहीं, बल्कि समाज में नए विचारों और क्रांतिकारी सोच का प्रतिनिधि है। वह सुनीता को न केवल मानसिक संबल देता है, बल्कि उसकी जीवन की दिशा तय करने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। अशोक का यह किरदार एक आदर्शवादी दृष्टिकोण प्रस्तुत करता है, जो आज के समाज में बहुत कम देखने को मिलता है।

             कहानी में सुनीता का चरित्र न केवल उसकी व्यक्तिगत त्रासदी को दर्शाता है, बल्कि समाज की उन विकृतियों को भी उजागर करता है जिनसे वह गुजर रही है। वह एक ऐसी लड़की है जिसे सामाजिक दबावों और अपनी पारिवारिक जिम्मेदारियों के बीच संतुलन बनाना है। उसकी स्थिति इतनी विकट है कि उसे अपने कौमार्य को बेचने के लिए विज्ञापन तक देना पड़ता है। यह कदम उसके लिए न केवल आर्थिक मजबूरी का परिणाम है, बल्कि उस सामाजिक असुरक्षा का भी प्रतीक है जिसमें वह जी रही है।

           सामाजिक परिप्रेक्ष्य और नैतिकता पर प्रहार की कसौटी पर यदि कसा जाए तो 'वर्जिन' कहानी समाज की दकियानूसी और थोथी नैतिकता पर एक प्रबल प्रहार करती है। यह कहानी उन मान्यताओं को चुनौती देती है जो स्त्रियों की यौन शुचिता को उनके जीवन से भी बड़ा मानती हैं। यह विचार कि बलात्कार पीड़िता को आत्महत्या का अंतिम विकल्प चुनना पड़ता है, इस समाज की विकृतियों और उसकी नैतिकताओं की असलियत को उजागर करता है। कर्दम की इस कहानी में यौन शुचिता की पारंपरिक धारणाओं को तोड़ने का साहस है, जो सामंती और पूंजीवादी समाज के मूल्यों पर सीधा वार करती है।

         कहानी के अंत में जो अनुत्तरित प्रश्न छोड़ दिए जाते हैं, वे पाठक को सोचने पर मजबूर करते हैं। यह कहानी इस विचार को सामने लाती है कि क्या समाज की नैतिकता इतनी संकीर्ण है कि वह किसी स्त्री की स्वतंत्रता और आत्मसम्मान को पहचान नहीं सकती? क्या यह समाज इतना असंवेदनशील हो गया है कि एक लड़की को अपने कौमार्य को बेचने का विज्ञापन देना पड़ता है?

         भाषा, शैली और प्रस्तुति की दृष्टि से कहानी की भाषा सरल, सशक्त और प्रवाह पूर्ण है। संवादों के माध्यम से कहानी को आगे बढ़ाया गया है, जो इसे जीवंत बनाता है। नैरेटर की भूमिका महत्वपूर्ण है, जो घटित घटनाओं को संक्षेप में प्रस्तुत करता है और कहानी के प्रवाह को बनाए रखता है। कर्दम ने समाज के यथार्थ को जिस निपुणता से कहानी में पिरोया है, वह पाठक को झकझोर कर रख देता है। इस कहानी की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि यह अपने छोटे से विचार-सूत्र में भी इतनी गहराई समेटे हुए है, जो लंबे समय तक पाठक के मन-मस्तिष्क पर प्रभाव छोड़ता है।

        निष्कर्ष यह है कि डॉ. जयप्रकाश कर्दम की 'वर्जिन' एक दस्तावेजी कहानी है, जो स्त्री-विमर्श के दायरे से बाहर निकलकर समाज की उन कुरूपताओं और विकृतियों को उजागर करती है, जिन्हें अक्सर साहित्य में अनदेखा कर दिया जाता है। यह कहानी अपने पाठकों को न केवल मनोरंजन प्रदान करती है, बल्कि उन्हें जागरूक करती है, उनके सोचने के दृष्टिकोण को बदलती है, और उन्हें समाज के प्रति अपने कर्तव्यों का अहसास कराती है। 

            'वर्जिन' सिर्फ एक कहानी नहीं, बल्कि एक सामाजिक आंदोलन का आरंभ है, जो समय के साथ और भी प्रासंगिक होता जाएगा। यह कहानी समाज को उसकी खामियों से अवगत कराने और उन्हें सुधारने की दिशा में एक सशक्त कदम है। कर्दम की यह कृति साहित्य जगत में एक मील का पत्थर साबित होगी, और इसे लंबे समय तक याद किया जाएगा।

सीताराम गुप्ता 

सम्पर्क: ए.डी. 106 सी., पीतम पुरा, दिल्ली - 110034
ईमेल: srgupta54@yahoo.co.in

उचित नहीं सकारात्मक व उदात्त जीवन मूल्यों की उपेक्षा
आज का युग मानव संसाधन विकास का युग है। हर क्षेत्र में उत्पादकता बढ़ाने पर ज़ोर दिया जा रहा है। उत्पादकता बढ़ाने के लिए अन्य चीज़ों के साथ-साथ मनुष्य की उत्पादकता अथवा क्षमता बढ़ाना भी अनिवार्य माना जाने लगा है। इसीलिए मनुष्य को वो सब चीज़ें सिखाई जाती हैं जो व्यक्ति की पारंपरिक सोच को बदलकर उसकी कार्य करने की क्षमता में गुणात्मक परिवर्तन कर सकें। इसके लिए आज जिस प्रकार का प्रशिक्षण दिया जाता है उसमें कई ऐसी चीज़ें भी सम्मिलित हो गई हैं जिन्हें पहले महत्त्व ही नहीं दिया जाता था। आज प्रतियोगिता जीतने अथवा सबसे आगे बढ़ने में उनका विशेष महत्त्व हो गया है। आज हम लक्ष्य निर्धारित कर उसे प्राप्त करने के लिए कड़ी मेहनत करने पर बड़ा ज़ोर देते हैं जो एक तरह से ठीक भी है।

     जीवन में आगे बढ़ने के लिए अथवा कार्यों में अधिक कुशलता प्राप्त करने के लिए पहले भी प्रशिक्षण दिया जाता था लेकिन आज उसका महत्त्व बहुत बढ़ गया है या बढ़ा दिया गया है। लक्ष्य निर्धारित कर उसे पाने के लिए हर संभव प्रयास करना अच्छी बात है लेकिन लक्ष्य क्या है अथवा उसके दूरगामी परिणाम क्या होंगे ये आज महत्त्वहीन हो गया है जो हर दृष्टि से ग़लत है। विकास की अंधी दौड़ में हम किसी भी कार्य के दूरगामी परिणामों को देखते ही नहीं। आज इसी के कारण समस्याओं और तनाव का दुष्चक्र हमारा पीछा नहीं छोड़ रहा है। ज़रूरी है कि हमारे लक्ष्य ऐसे हों जिन्हें पूरा करने पर दूसरी समस्याएँ उत्पन्न न हों। एक तरफ विकास हो रहा हो और दूसरी तरफ विनाश हो रहा हो तो इसे वास्तविक विकास नहीं कहा जा सकता। विनाशरहित विकास ही श्रेयस्कर हो सकता है इसमें संदेह नहीं।

     आज सिखाया जाता हैं कि आगे बढ़ना है तो लोगों की परवाह मत करो। ठीक है लोग तो कुछ न कुछ कहते ही रहते हैं। हमेशा उनकी ही परवाह की जाए तो हम कुछ भी नहीं कर पाएँगे लेकिन लोगों की उपेक्षा तो ठीक नहीं। जीवन में आगे बढ़ने के लिए आज हम लापरवाही नहीं उपेक्षा के स्तर पर आ गए हैं। जीवन के एक क्षेत्र में उन्नति के लिए अन्य क्षेत्रों की उपेक्षा केसे की जा सकती है? लोग, राष्ट्र व समाज को छोड़िए आज हम घर-परिवार व माता-पिता तक की उपेक्षा करने लगे हैं। मात्र व्यक्तिगत उन्नति के लिए समाज की उपेक्षा अथवा मात्र भौतिक उन्नति के लिए जीवन के उदात्त मूल्यों की उपेक्षा ठीक नहीं। स्वास्थ्य अथवा नैतिकता की क़ीमत पर प्राप्त की गई समृद्धि भी संतुलित विकास नहीं।

     आज कहा जाता है पहले स्वयं को देखो। अपने लक्ष्यों को देखो। उन्हें प्राप्त करने के लिए जो भी करना हो करो। स्वार्थी बनो। एक सीमा तक स्वार्थी बनने अथवा अपना भला करने में कोई बुराई नहीं। लेकिन सोचिए हम जीवन भर केवल स्वार्थी बने रह कर क्या विशेष उपलब्धियाँ प्राप्त कर पाते हैं? राष्ट्र, समाज, परिवार, मित्रादि की उपेक्षा की क़ीमत पर आगे बढ़ गए तो बहुत कुछ खो भी तो दिया। बहुत सा अच्छा खोकर कुछ पा जाने को वास्तविक विकास या उन्नति नहीं कहा जा सकता। बहुत पढ़-लिखकर यदि हम अहंकारी हो जाते हैं तो ऐसा ज्ञान ही हम पर बोझ बन जाता है। यदि हम बड़े बनकर मान-मर्यादा अथवा शिष्टाचार भूल जाते हैं तो ऐसे बड़े होने से बड़ा न होना ही बेहतर होगा। यदि आगे बढ़ने की प्रक्रिया में हमारे अंदर नैतिक मूल्यों का ह्रास होकर अनैतिकता में वृद्धि होती जा रही है तो ऐसा विकास बेमानी ही नहीं हमारे लिए घातक भी होगा।

     आज के दौर में प्रशिक्षण का एक अन्य सूत्र है ना कहना सीखना। मेरे एक परिचित हैं जो मिलने पर प्रायः कहते हैं कि उनका पुत्र कहता है कि हमें ना कहना सीखना चाहिए अन्यथा लोग हमारा गलत फायदा उठाने लगेंगे। मुझे कभी नहीं लगा कि कभी किसी ने उनका गलत फायदा उठाया है। और साथ ही मुझे कभी नहीं लगा कि उन्होंने विषम परिस्थियों में कभी किसी की मदद की हो। विषम परिस्थियों में हममें से अधिकांश लोग कभी किसी की मदद के लिए आगे नहीं आते फिर हम कैसे लोगों पर ग़लत फायदा उठाने का आक्षेप लगा सकते हैं? कुछ लोग अपने कर्त्तव्यों के पालन मात्र को समाज अथवा लोगों पर बहुत बड़ा अहसान मान लेते हैं। वास्तव में समाज में अच्छे लोग लोगों की भलाई के लिए ही होते हैं अथवा कह सकते हैं कि जो दूसरे लोगों की भलाई के लिए चिंतित रहते हैं अथवा समाज के लिए कुछ करते हैं वे ही अच्छे लोग होते हैं।

     हर चीज़ को भौतिक उन्नति अथवा आर्थिक लाभ-हानि के तराजू में नहीं तौला जा सकता। हर बात के लिए ना कहना हमारी घोर स्वार्थपरायणता को ही दर्शाता है। किसी की मदद करने की बात हो और हम उसके लिए पूर्णतः समर्थ न हों अथवा कोई बेजा परेशान कर रहा हो तो ना कहना ठीक है लेकिन हर बात के लिए दूसरों को ना कहना कहाँ तक उचित है ये सोचने की बात है। उन्नति के मार्ग में क्या हम अकेले ही सब कुछ कर पाते हैं? जब पूरी दुनिया प्रत्यक्ष अथवा परोक्ष रूप में हमें सहयोग कर रही होती है तब तो हम ना नहीं कहते। जब माता-पिता स्वयं परेशानियाँ झेलकर हमें हर तरह की परेशानियों से बचाने की कोशिशों में लगे रहते हैं तब तो हम ना नहीं कहते। ये उनका फ़र्ज़ था लेकिन हमारा फ़र्ज़ कुछ भी नहीं है क्या?

     मानव संसाधन जैसा कि नाम से ही स्पष्ट है मानव को एक संसाधन के रूप में मान लिया गया है जो सही नहीं कहा जा सकता। यदि हम मनुष्य को संसाधन मानकर चलेंगे तो बड़ी गड़बड़ हो जाएगी। हम बहुत बड़े-बड़े मकान तो बना लेंगे लेकिन अच्छे घर, अच्छा समाज अथवा अच्छा राष्ट्र नहीं बना पाएँगे। आज समाज बदल रहा है। परिवर्तन स्वाभाविक है लेकिन उदात्त शाश्वत जीवन मूल्यों को नकारना किसी भी प्रकार से उचित नहीं। अवगुण अथवा विकार कभी विकास में सहायक नहीं हो सकते तथा उदात्त शाश्वत जीवन मूल्य कभी विकास में बाधक नहीं होते। हम विकास के नए दर्शन को अपनाएँ लेकिन जो उदात्त शाश्वत जीवन मूल्य प्रासंगिक हैं उन्हें न छोड़ते हुए ही। तभी वास्तविक उन्नति हो सकती है अन्यथा वह मात्र भ्रम होगी।

▪︎▪︎▪︎▪︎▪︎▪︎▪︎▪︎▪︎▪︎▪︎▪︎▪︎▪︎▪︎▪︎▪︎▪︎▪︎▪︎▪︎▪︎▪︎▪︎▪︎▪︎▪︎▪︎▪︎▪︎▪︎▪︎▪︎▪︎▪︎▪︎▪︎▪︎▪︎▪︎▪︎▪︎▪︎▪︎▪︎▪︎▪︎▪︎▪︎▪︎▪︎▪︎▪︎▪︎▪︎▪︎▪︎▪︎▪︎▪︎▪︎▪︎▪︎▪︎▪︎▪︎▪︎▪︎▪︎▪︎▪︎▪︎▪︎▪︎▪︎▪︎▪︎▪︎▪︎▪︎▪︎▪︎▪︎▪︎▪︎▪︎▪︎▪︎▪︎▪︎▪︎▪︎▪︎▪︎▪︎▪︎▪︎▪︎

विविध 
रेखा शाह आरबी
सम्पर्क: गिरिजा इलेक्ट्रॉनिक्स, काशीपुर, बलिया- बैरिया राजमार्ग, बलिया (यूपी) -277001
ईमेल: rekhasahrb@gmail.com

वेलेंटाइन वीक और प्रेम का कोना
यदि आप किसी से प्यार करते हैं किसी के लिए आपके मन में नरम एहसासों का मेला लगा हुआ है। तो वैलेंटाइन वीक सबसे सही समय है कि आप अपने हाले दिल को बताकर उन्हें अपनी भावनाओं का एहसास करवाये। फरवरी का वैलेंटाइन वीक प्रेम करने वालो के लिए बेहद ही मायने रखता है। एक तो मौसम की गुनगुनी मखमली धूप और चारों तरफ पेड़ पौधों पर आई हुई बसंती बहार, फूलों से लदे हुए बाग उपवन, खुशी से चहचहाते हुए पक्षी और नया वस्त्र धारण की हुई प्रकृति हर दिल में किसी खास के लिए अनुराग जगाता है। और मन को गुनगुनाने के लिए उकसाता है। मन के रेशमी एहसासों को महकाता, गुदगुदाता है ।

यदि आप किसी से प्रेम करते हैं या आपका पहले से ही कोई स्पेशल है चाहे शादीशुदा कपल है। तो यही सही समय है कि आप वैलेंटाइन वीक के मौके पर अपने पार्टनर को स्पेशल और विशेष महसूस करवाए। ताकि आपका रिश्ता और भी मजबूत हो जाए। इससे एक तो रिश्ते में ताजगी आएगी और एक नया उत्साह उमंग रिश्ते में भर जायेगा । जो किसी भी रिश्ते के लिए बेहद महत्वपूर्ण होता है।

आईए जानते हैं कि वैलेंटाइन के मौके पर ऐसा क्या किया जाए जिससे आपके पार्टनर के मन में भी आपके लिए नरम एहसासो वाले कोने में कुछ रंग बिखर जाए और कुछ एहसास एक नई ताजगी के साथ अंकुरित होने लगे।

सच्चाई से बात कहें-- यदि आप आप किसी से अपनी मन की बात कहना चाहते हैं। सच में किसी से प्रेम करते हैं तो आप पूरी सच्चाई के साथ भावनाए व्यक्त करे इसमें संकोच न करें। क्योंकि कोई भी लड़की या लड़का जब आप अपनी भावनाएं पूरी सच्चाई के साथ अपने पसंदीदा के सामने रखते हैं। तो वह उस पर गंभीरता से विचार करने को मजबूर हो जाते हैं। उटपटांग या हल्के शब्दों का प्रयोग करने से बचे। क्योंकि यह हो सकता है आपके पार्टनर को पसंद ना आए।

गिफ्ट दे सकते हैं-- गिफ्ट लड़का हो या लड़की किसी को भी देना हो । गिफ्ट पाना हर किसी को अच्छा लगता है । तो वैलेंटाइन डे के मौके पर अपने पार्टनर को एक प्यारा सा गिफ्ट जरूर दीजिए। जरूरी नहीं है कि बहुत कीमती ही रहे बस आप अपनी सच्ची भावनाएं उसमें समेट कर पार्टनर को भेंट कीजिए और फिर उनकी मुस्कान देखिए। यदि आप अपने पार्टनर के प्रति अपना गहरा प्यार दिखाना चाहते हैं। तो लाल गुलाब से बेहतर कुछ नहीं होता है । लाल गुलाब गहरे प्यार रोमांस का प्रतीक होता । इसके अलावा भी आप कार्ड्स, सॉफ्ट टॉयज ,परफ्यूम, टी टाइम लव मग, चॉकलेट्स इत्यादि देकर आप अपनी भावनाएं व्यक्त कर सकते हैं।

कुछ अच्छा सरप्राइज-- वेलेंटाइन वीक पर यदि आप अपने पार्टनर को कोई गिफ्ट दे रही है । तो उसे सरप्राइज करके दीजिए। जो आपके पार्टनर को बेहद अच्छा लगेगा। सरप्राइज गिफ्ट में आप किसी पसंदीदा जगह का ट्रिप भी प्लान कर सकते हैं । निजी रोमांटिक डिनर प्लान भी हो सकता है। कुछ भी ऐसा सरप्राइज जो आपके पार्टनर को यह महसूस कराए की उनके लिए आप बेहद इंपॉर्टेंट है । बड़े-बड़े रिश्तो को इन छोटी-छोटी बातों से बहुत मजबूत बनाया जा सकता है।

वक्त निकालना- जीवन की भाग दौड़ में रोज लगकर हम अपने बैंक बैलेंस का तो ख्याल रख लेते हैं। लेकिन जो चीज सबसे जरूरी है जैसे हमारा और हमारे पार्टनर के मन का ख्याल रखना भूल जाते हैं। जो अक्सर रिश्तो में दूरियों का कारण होता है। तो सबसे पहले सारे कामों को एक दिन के लिए कहीं साइड में रखकर आप अपने पार्टनर के लिए टाइम निकालिए और उनके साथ कुछ क्वालिटी टाइम बिताइए। कुछ भूली बिसरी यादों को फिर से जीवित कीजिए। उसके बाद चेहरे की मुस्कान और मन की खुशी को महसूस कीजिए। आपको खुद ही समझ आ जाएगा ।

और वैलेंटाइन वीक एक खूबसूरत मौका है जब आप किसी को स्पेशल फील कराए या कोई आपको स्पेशल फील कराए। जरूरी नहीं है कि गर्लफ्रेंड के लिए ही किया जाए। शादीशुदा अपनी पत्नी को भी इस दिन शादी के शुरुआती दिनों के जैसे एक दूसरे के साथ वक्त बिताकर खुशी महसूस करवा सकते है । हाथों में हाथ डालकर जैसे शादी के शुरुआती दौर मे चलते थे। गीली रेत पर चलते हुए खुशी महसूस तो कीजिए । बड़ा अनोखा और अनमोल एहसास होगा। उन लम्हों को फिर से एक बार जी कर देखिए। फिर से आपके रिश्तों में नई ताजगी और एक दूसरे पर बेतहाशा प्यार बरसेगा।


अलका शर्मा 

सम्पर्क: बाता कैथल हरियाणा
ईमेल: aksharma74042@gmail.com

बढ़ते मतलबी दौर में वफादारी की कीमत 
आज के आधुनिक दौर में जहां हर कोई अपने काम में व्यस्त रहता है ।वह अपनी व्यस्तता के दौड़ में अपने रिश्तों को दांव पर लगता जा रहा है। जिसके कारण वह आगे तो बढ़ता जा रहा है वफादारी से जुड़े तमाम रिश्ते खोता जा रहा है दिन प्रतिदिन सभी लोगों पर यह मतलबी दौर कहर ढाता जा रहा है। और इसकी चपेट ,में आते हुए लोगों की संख्या दिन प्रतिदिन बढ़ती जा रही है और मतलबी दौर के आने से वफादारी की कीमत को लुप्त होते हुए देख रहे हैं। जिसके कारण कि लोगों के दिलों में यह मतलबी दौर जहर घोलता जा रहा है। और इंसानों को इंसानियत से दूर करता जा रहा है। आज लोग सिर्फ एक दूसरे से मतलब तभी तक रखते हैं जब तक उन्हें दूसरे इंसान से काम होता है जब मतलब सिद्ध हो जाता है तो दूर हो जाते हैं जिसके कारण की इंसानियत को ताराम तार कर दिया गया है और एक इंसान का दूसरे इंसान से विश्वास उठता जा रहा है अगर आप भी इसी मतलबी युग से घिरे हैं तो अपने प्रेम विश्वास और इज्जत से उन लोगों के मन में भरा जहर निकालने का प्रयास करें और मतलबी दौर को खत्म करें और वफादारी के युग की स्थापना करें वरना एक ऐसा समय आएगा किसी भी इंसान का किसी भी इंसान पर विश्वास पूरी तरह से खत्म हो जाएगा पूरी तरह से खत्म हो जाएगा। आजकल यह मतलबी दौर बच्चों से लेकर वृद्धावस्था युवा अवस्था हर किसी को अपनी चपेट मैं लेता जा रहा है। और अपने हो या पराऐ रिश्ते सब में जहर घोलता जा रहा है। जिसके कारण की सभी लोगों के मन में सभी लोगों के प्रति घृणा डर है भय चिंता शक लालच लोभ अहंकार क्रोध ईर्ष्या देवेश बदलाव और एक दूसरे को क्षति पहुंचाने का विचार बदला लेने का विचार आदि को पनपता जा रहा है। इस दौड़ में इंसान कहीं ना कहीं आगे तो बढ़ता जा रहा है पर अपने आप को कहीं ना कहीं खोता जा रहा है अपने अंदर छुपी एक इंसानियत को खोता जा रहा है। इसीलिए इंसान मतलब के कारण इंसान इंसान से कटता जा रहा है। चलो इस मतलबी दौर को खत्म करने के लिए शुरूआत करते हैं। जिन भी रिश्तों में मतलबी दौर घिरा हुआ लगता है। उन्हें प्रेम धैर्य से जीतने का प्रयास करते हैं और एक नई सोच के और ले चलते हैं और एक अच्छा सा जहां रचने का प्रयास करते हैं।

▪︎▪︎▪︎▪︎▪︎▪︎▪︎▪︎▪︎▪︎▪︎▪︎▪︎▪︎▪︎▪︎▪︎▪︎▪︎▪︎▪︎▪︎▪︎▪︎▪︎▪︎▪︎▪︎▪︎▪︎▪︎▪︎▪︎▪︎▪︎▪︎▪︎▪︎▪︎▪︎▪︎▪︎▪︎▪︎▪︎▪︎▪︎▪︎▪︎▪︎▪︎▪︎▪︎▪︎▪︎▪︎▪︎▪︎▪︎▪︎▪︎▪︎▪︎▪︎▪︎▪︎▪︎▪︎▪︎▪︎▪︎▪︎▪︎▪︎▪︎▪︎▪︎▪︎▪︎▪︎▪︎▪︎▪︎▪︎▪︎▪︎▪︎▪︎▪︎▪︎▪︎▪︎▪︎▪︎▪︎▪︎▪︎▪︎

दिल्ली विश्वविद्यालय में आयोजित छठा अंतरराष्ट्रीय गिरमिटिया महोत्सव

 नई दिल्ली, 6 सितम्बर। महाराजा अग्रसेन कॉलेज, दिल्ली विश्वविद्यालय में शनिवार को छठा अंतरराष्ट्रीय गिरमिटिया महोत्सव 2025 बड़े धूमधाम से आयो...