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प्रश्नचिह्न पत्रिका ।। जनवरी 2025
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संपादकीयकविता
सतीश बुरा, तस्कीन, मधुमयी
गोपेंद्र कुमार सिन्हा गौतम, रजत दीक्षित" रजत"
ग़ज़ल
किरण सिंह
कहानियां
कला कौशल
नीरजा हेमेंद्र
व्यंग
डॉ. मुकेश 'असीमित '
विविध
रजनी मोरवाल, महासचिव (प्रलेस जयपुर राजस्थान)
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संपादकीय
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यात्राएँ
आप धीरे-धीरे मरने लगते हैं, अगर आप
करते नहीं कोई यात्रा,
पढ़ते नहीं कोई किताब,
सुनते नहीं जीवन की ध्वनियां,
करते नहीं किसी की तारीफ़।
आप धीरे-धीरे मरने लगते हैं, जब आप
मार डालते हैं अपना स्वाभिमान
नहीं करने देते मदद अपनी और न ही करते हैं मदद दूसरों की।
आप धीरे-धीरे मरने लगते हैं, अगर आप
बन जाते हैं गुलाम अपनी आदतों के,
चलते हैं रोज़ उन्हीं रोज़ वाले रास्तों पे,
नहीं बदलते हैं अपना दैनिक नियम व्यवहार,
नहीं पहनते हैं अलग-अलग रंग, या
आप नहीं बात करते उनसे जो हैं अजनबी अनजान।
आप धीरे-धीरे मरने लगते हैं, अगर आप
हीं महसूस करना चाहते आवेगों को,
और उनसे जुड़ी अशांत भावनाओं को,
वे जिनसे नम होती हों आपकी आंखें,
और करती हों तेज़ आपकी धड़कनों को।
आप धीरे-धीरे मरने लगते हैं, अगर आप
नहीं बदल सकते हों अपनी ज़िन्दगी को,
जब हों आप असंतुष्ट अपने काम और परिणाम से,
अग़र आप अनिश्चित के लिए नहीं छोड़ सकते हों निश्चित को,
अगर आप नहीं करते हों पीछा किसी स्वप्न का,
अगर आप नहीं देते हों इजाज़त खुद को,
अपने जीवन में कम से कम एक बार,
किसी समझदार सलाह से दूर भाग जाने की
तब आप धीरे-धीरे मरने लगते हैं।
~ मार्था मेड
कैम्पस के चारदीवारी तरफ दो चार कर रहा था तब तक एक परिचित इंसान ने मुझे यह कुछ लाइनें मेरे मुरझाए चेहरे पर फेंक दी मैंने गिरे चुने कुछ शब्द इकठ्ठा किया। करने को कुछ नहीं था तो मैंने स्वयं को इन पंक्तियों से खंगाला और विचार किया। अभी अभी तो एक बच्चे ने मेरे से बोला था मुझे सारी दुनिया घूमने जाना है उसी यात्रा की तैयारी में मैं रोज लाइब्रेरी की शक़्ल देखता हूं। एक और लड़की को मैं जानता हूँ जो सिर्फ़ घूमना-फिरना जानती है। उसने बना रखा है अर्से से एक लंबी लिस्ट बहरहाल वह एक गुमशुदा व्यक्ती की तलाश में हैं जो उसका हाथ पकड़कर गुम हो जाय।
यात्राएँ कई समस्याओं का हल बनकर आती हैं। वो आपको फिर से जिंदगी की चुनौती से लड़ने के लिए तैयार कर देती हैं। ट्रैवलिंग आपको थोड़ी देर के लिए चेंज नहीं करती है, ये आपको मेंटली और शारीरिक तौर पर भी तैयार कर देती है। इसलिए घूमते रहना चाहिए और बेहतर होते रहना चाहिए।
दादियाँ और नानीयाँ दुनिया की सबसे बढ़िया कहानीकार होती हैं। जब मैं छोटा था तो मेरी नानी मुझे कहानियाँ सुनाया करती थीं। वे मुझे अपनी यात्राओं के बारे में सुनाया करती थीं। उनकी यात्राएं मेरे गाँव के नज़दीक के गाँवों और शहर की थी। जब वे पहली बार शहर गईं तो उनके साथ क्या हुआ? ये सब सुनना मुझे बहुत अच्छा लगता था। वो कहती हैं कि मुझे और कई विदेशी शहरों को देखने जाना चाहिए था। मैं नहीं जा पाई, तुम ज़रूर जाना। तब मैं समझ नहीं पाता था कि वो ऐसा क्यों कहती थीं? लेकिन अब समझता हूँ कि वो यात्रा करने को नहीं, यादें समेटने को कहती थीं। नानी कुछ दिन पहले ही हमे छोड़कर चली गई। उनसे आखिरी बातचीत छठ के दिनों में हुआ था। उनसे मिलना तो अगले के भी अगले साल हुआ था खूब बातें हुईं थीं। नानी को मम्मी से अच्छी हिन्दी आती थी। वे देश परदेश अकेले घूम लेती थीं। अब हमारे पास यात्राओं का ब्यौरा लेने के लिए दादा- दादी या फिर नाना- नानी में से कोई नहीं है। मैं जब जब यात्री बनकर कहीं जाउंगा नानी तुम बहुत याद आओगी...
आप भी घूमने निकल जाया कीजिए। घूमने से आदमी घुलता है।ये बिल्कुल भी फर्क नहीं पड़ता कि आपकी यात्रा कैसी थी? बस वो अनुभव और यादें मायने रखती हैं जो आपको लंबे समय तक याद रहेगा। बस इसलिए यात्राएँ करते जाना और यादें बटोरते जाना।
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कविता
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सतीश बुरा
जवाहर नगर, हिसार हरियाणा
ईमेल: boorasatish123@gmail.com
तलाश खुद कि
तलाश खुद कि
इस भागते जमाने में
मैं खुद कि तलाश किया करता हु
खुदसे अनजान उस रब कि पहचान किया करता हु
भूल चूका हु खुदको कही
खुदकी अब तलाश किया करता हु।।
ज़माने वाले बिन जाति पूछे
जवाब नहीं देते कोई
नाम के आगे जाति क्यों लिखी
इस बात कि तलाश किया करता हु
भूल चूका हु खुदको कही
अब खुदकी तलाश किया करता हु।।
दूसरे मुलख में एक मुलख के
लगते गले और मिलते हँसकर
उस वंजर कि मैं अपने मुलख में
तलाश किया करता हु
आपस में लड़ना क्यों नहीं छोड़ते
वजह कि मैं तलाश किया करता हु
मैं भूल चूका हु खुदको कही
खुदकी अब तलाश किया करता हु।।
चिकित्सक हु ना मैं
अपनेपन को तलाश किया करता हु
बिना जाति पूछे मैं इलाज़ किया करता हु
चढ़ता है खून ज़ब किसी जरूरतमंद के
तो जाति कि बात नहीं होती
भूल चूका हु मैं खुदको कही
खुदकी अब तलाश किया करता हु......
पुराना भारत
मैं रोज नए ख्वाब बुना करता हु
हिन्दू मुस्लिम सिख कि ज़िद्द से दूर
कही अपने भारत के बारे में लिखा करता हु।।
यू तो है वजूद अधूरा मेरा
पर मैं तो अपने पुराने भारत का नाम लिखा करता हु।।
मैं तो बिना जाति पूछे गले लगा करता हु
भारतमाता कि भूमि पर
जो मरमिटे उनको नमन किया करता हु
हम एक थे तो हुए आज़ाद
जो आजादी के लिए लड़े
उनसे ना उनका धर्म पूछा करता हु
मैं हिन्दू, मुस्लिम सिख कि ज़िद्द से दूर
अपने पुराने भारत का नाम कही लिखा करता हु......
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तस्कीन
सम्पर्क: सैदपुर रोड, पन्ना लाल आटा चक्की के सामने,
भिखना पहाड़ी, पटना, 800004
ईमेल: taskeenwrites786@gmail.com
पंछी और लड़कियाँ
एक पंछी..
जिसका मूल स्वभाव उड़ना
और गगन को नापना है।
एक दिन पंछी को चाहने वाले
उसे अपने क़रीब रखने की ख़्वाहिश में
उसे पकड़ते हैं और
अपने पास पिंजरे में डाल देते हैं।
उसे वक़्त -वक़्त पर खाने को खाना,
पीने को पानी देते हैं,
उससे मिलने आते हैं,उससे बातें करते हैं
और उसे अपने क़रीब देखकर ख़ुश होते हैं।
लेकिन पंछी उसी वक़्त बेचैन हो रहा होता है।
वो चाहता है उसके आस -पास जो लोग है
वो उस पिंजरे का दरवाज़ा खोल दे और वो आसमान में उड़ सके।
लेकिन कोई उसके मन को नहीं समझ पा रहा होता है।
पंछी कुछ दिन कोशिश करता है वहाँ से निकलने की
क्यूंकि वहां उसका दम घुटता है,
वहाँ से आसमान दूर दिखता है
मगर वो वहाँ से निकल नहीं पाता
और वो हार जाता है
फिर आहिस्ता - आहिस्ता पंछी को भी पिंजरे की आदत हो जाती है....
और फिर एक दिन पिंजरे का दरवाज़ा खुलता है और वो उड़ नहीं पाता
दुखदायी ये है कि अब वो उड़ना भूल चुका है....
मुझे इस समाज में लड़कियां पंछी जैसी लगती हैं.....
मैं और ज़िन्दगी
खुद पे जो गुजरी उसे लिख न सके
जो देखा गुजरते दूजे पर उसे लिखा किये हम
खुद का दर्द सीने मे सुलगता रहा
दूजे को देखा दर्द मे तो दुआ किये हम
सर्द रातें, बरसातें भाती है महलों से
ऐसी खूबसूरती से अक्सर पर्दा किये हम
कुतरे हैं पर कितने मोहब्बत ने
सो तो मोहब्बत से किनारा किये हम
आँखों में तैरते सपने को, बहते देखा है
तभी अपनी नींद का सौदा किये हम
तीरगी ने हौसलों को सताया तो बहुत
फिर फलसफा जीने का जुगनू से सीखा किये हम
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मधुमयी
शाहजहाँपुर , उत्तर प्रदेश
ईमेल: smadhumayi786@gmail.com
कविता
अक्षर-अक्षर सुख-दुःख ढाला,
लिखती हूँ कुछ तरुणाई सी।
थी कभी सुवासित पुष्पलता,
अब अनुभव की अमराई सी ।।
कोरे पृष्ठों पर बिखर गई,
मैं बिन स्याही की कविता हूँ।
मत बांधों मुझको सीमा में,
मैं तो अरण्य की सरिता हूँ ।।
मैं मधुर कल्पना हूँ कवि की,
स्वप्नों की मादक हाला हूँ ।
नर व्यथा-कथा भूले आकर,
मैं स्वर्णमयी मधुशाला हूँ ।।
स्नेह का नन्हा अंकुर बन,
बंजर मन में भी फूटी हूँ ।
पल्लवित हुई तो छाया दी,
मैं बीज बनी जब टूटी हूँ ।।
कुछ रजत-रश्मियाँ आशा की,
आँचल में रखकर लायी हूँ ।
सम्पत्ति बनाकर संयम को,
पीड़ा में भी मुस्काई हूँ ।।"
गीत
पूर्णता जीवन की हो
जिसकी अभावों की धरा पर
कंटकों सा तन औ मन हो
भला क्या विस्मय रहेगा
कौन तब 'मधुमय' रहेगा ?
पूर्णिमा के चंद्रमा को
देख मचलीं उर्मियां
शशिकला के रूप के
उद्वेग को कब तक सहेगा
उदधि कब 'मधुमय' रहेगा ?
नेह के छींटे कोई छोड़े
अमिय की वृष्टि सा
राख क्या जीवित हुई पर
अहो! यह विस्मय रहेगा
प्रेम कब 'मधुमय' रहेगा ?
जग कहे कायर भले पर
तोड़ सारे बन्धनों को
ले हलाहल कंठ में जब
मृत्यु को जीवन कहेगा
मधु कहाँ 'मधुमय' रहेगा ?
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गोपेंद्र कु सिन्हा गौतम
देवदत्तपुर औरंगाबाद बिहार
ईमेल: gopendrakumarsinha@gmail.com
जग सुंदर
जग सुंदर
तो हम सुंदर
धरातल और
नभ सुंदर।
वाणी सुंदर
भावना सुंदर
दिल सुंदर और
मन सुंदर।
हर मुल्क सुंदर
मादरे वतन सुंदर
जैसा बाहर सुंदर
वैसा अंदर-सुंदर
सब भाषा सुंदर
बोली सुंदर
संगीत सुंदर
रंगोली सुंदर
हर कथा सुंदर
कहानी सुंदर
बचपन सुंदर तो
जवानी सुंदर
हर सुबह सुंदर
शाम सुंदर
शुरुआत सुंदर तो
अंत सुंदर
हर दिन सुंदर
रात सुंदर
जब दिल मिले तो
बात सुंदर
हर खाना सुंदर
पीना सुंदर
स्वाद मिले तो
घास-पात सुंदर
हर पर्व सुंदर
त्यौहार सुंदर
अगर हम सबका
व्यवहार हो सुंदर
सर्वधर्म सुंदर
जाति सुंदर
परिवार सुंदर तो
सब साथी सुंदर
फूल सुंदर
कांटा भी सुंदर
हम सुंदर तो
सरा जग सुंदर
तारीखें याद रहेंगी
चाहे बीते दिन
या बीते महीना
गुजरे एक-एक
करके साल
जो कुछ घटित
हुआ इन दिनों
वे तारीखें याद रहेंगी!
चाहे वह सुख
या मिला हो दर्द
एक-एक कर गुजरा
जो जिंदगी में
जो भी रिश्ते नाते
बने बिगड़े इस बीच
वे तारीखें याद रहेंगी!
चाहे वे मजदूर
या हों वे किसान
कितना संघर्ष किए
एक-एक दाने उपजाने में
उनके माथे से टपके
पसीने के जब बूंद
वे तारीखें याद रहेंगी!
चाहे रोटी,कपड़ा
या हो वह मकान
इलाज के अभाव में
लड़खड़ाती जुबान
जिसके लिए जलाया
एक-एक बूंद खून
वे तारीखें याद रहेंगी!
नफ़रत की सौगात
या महंगाई की मार
निजीकरण की धूम
तानाशाही व्यवहार
निजी स्वार्थ के लिए
संविधान से खिलवाड़
वे तारीखें याद रहेंगी!
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रजत दीक्षित"रजत"
जगदलपुर, बस्तर,छत्तीसगढ़
ईमेल: rajat009.rd@gmail.com
पोटली यादों की
न बुलाओ इतने पास वफाओं से डर लगता है,
ज़ख्म मिले इतने अब मोहब्त से डर लगता है।
दूर से नजर आती है बहुत खुशनुमा ये जिंदगी,
उफनते समंदर में भी किनारों से डर लगता है ।
फ़कत जलाया मुझे सिर्फ़ आफ़ताब ने ही नही,
अब तो बरस्ती चांदनी रातों से भी डर लगता है।
समेट लाया वो सारे अश्क जो रातों ने बिखेरे थे,
छलक जाये न आंखों से कंही यही डर लगता है।
ग़मो ने बांटा है जिंदगी को आपस मे इस कदर ,
अब तो सपनों में भी मुस्कुराने से डर लगता है।
ख़्याल उसका साथ है वो मेरे सामने हो न हो,
हो जाए न वो मुझसे जुदा सोच के डर लगता है ।
दस्तियाब नहीं होते सभी को यंहा ये लम्हे "रजत',
इक पोटली है यादों की उसे खोने से डर लगता है।
आशाओं की माया
प्रफुल्लित है मन आज
कुछ नयी बात हुई है,
कोने में ह्रदय के एक नयी सी झंकार हुई है।।
जल उठे फिर से क्यों
बुझते दीप अकुलाते,
इठलाती परछाइयों में आज नयी होड़ हुई है।।
कल तक काले बादल थे
घनघोर डराने वाले,
आकाश पटल पर सूरज की बेला प्रखर हुई है।।
हर्ष जहां इक ओर खड़ा
अपने अश्रु पी लेता है,
उल्हासित स्वर में आज यहां ये झंकार हुई है ।।
वेदना और उसकी अभिव्यक्ति
जब संभव न हो,
अर्थ मौन को देने "रजत" मेरी कविता खड़ी हुई है।।
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ग़ज़ल
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किरण सिंह301 क्षत्रिय रेसिडेंशी
रोड नंबर 6 ए शिव मंदिर से पहले
विजय नगर रुकुनपुरा, पटना बिहार 800014
ईमेल: kiransinghrina@gmail.com
एक ग़ज़ल
मैं भी लिखती थी बहुत सी चिट्ठियाँ,
प्रेम भर - भर भेजती थी चिट्ठियाँ।
रोज करती थी प्रतीक्षा डाकिया की,
लायेगा वो आज मेरी चिट्ठियाँ।
धड़कने बढ़ जाती थीं दिल की मेरे,
खोलती थी जब पिया की चिट्ठियाँ।
होठों से अपने लगाकर चूमती थी ,
बांवरी सी उनकी सारी चिट्ठियाँ।
होती थी अनुभूति सच्चे प्रेम की ,
पढ़ती थी जब भी मैं उनकी चिट्ठियाँ।
जब रहे इसपार हम उसपार वो,
दूरियों को पाट देतीं चिट्ठियाँ।
पी तुम्हारे हैं तुम्हारे ही रहेंगे,
तुम रखो विश्वास कहतीं चिट्ठियाँ।
होती है अनुभूति कि हूँ मैं जवाँ,
पढ़ती हूँ जब भी पुरानी चिट्ठियाँ।
अब एस एम एस का जमाना हो गया,
बन गई हैं अब कहानी चिट्ठियाँ।
है किरण मजबूर अपनी आदतों से,
लिखती है ग़ज़लों में अब भी चिट्ठियाँ।
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कहानी
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कला कौशल
यमुना कृष्णा पुरं, यशपाल नगर, न्यू काॅलोनी, बाघा
डाक-सुहृद् नगर, बेगूसराय -851218, बिहार
ईमेल: kalakaushal2014@gmail.com
श्मशान का भोज
निर्धन निस्पृह हो गये। वे ना तो कुछ बोल पा रहे थे और ना ही समझ पा रहे थे। अवाक् और विस्मित नेत्रों से अशर्फी की लाश को टटोलते,उसे झॅंझोड़ते। फिर एक टक उसे देखने लगते। उधर कलिया चीखती और छाती पीटती हुई मूर्छित हो रही थी। गाॅंव की जनी जात उसे घेरे ढाड़स दे रही थीं। उसे समझा रही थीं कि अशर्फी उनका बेटा नहीं था ! दैव ने उसे उनकी बाॅंझ की कालिख पोॅंछने के लिए ही भेजा था।सो वह अपना काम करके चला गया,सरग का वासी हो गया।
गोतिया समाज निर्धन के ओसारे पर बैठे लोकाचार निबाह रहे थे। बेचारे निर्धन को ब्याह के बाईस वर्षों के बाद बेटा हुआ था। अशर्फी पूत को पाकर वे धन्य हो उठे थे। उम्र से ज़्यादा निराशा के बोझ से हारे-पछाड़े दोनों प्राणी जवानी के दिनों का उत्साह पा गए थे। जिस निर्धन में सारी इच्छा,तृष्णा का लोप हो गया था,जो बस हाड़ों का भार लिए चल रहा था,उसमें दूनी उम्र जीने की तड़प शुरू हो गई थी।
निर्धन के बाबू-माई तो उसकी लड़कई में मर गए थे।पास की एक निपूती पितियानी ने उसे पाला-पोसा था। निर्धन की बियाही कलिया को वह बड़े लाड़ से घर ले गयी थी। परंतु वह उसे लड़कोरी होते नहीं देख सकी थी। कलिया की गोद में हुलसते दूधमुॅंहे की रट लगाए ही वह चल बसी। अपने लोगों ने कितना बुझाया था कि निर्धन; कलिया बाॅंझ है, तूॅं उसका छोह छोड़ दे, दूसरी लुगाई कर ले। पर उसने किसी की एक न सुनी। वह हर एक को यही कहता कि कलिया का हाथ पकड़ा है तो मरने के बाद ही छूटेगा ! परंतु भीतर-ही-भीतर दोनों प्राणी एक-दूसरे को साक्षी मानकर घुटते रहे।
एक रोज़ निर्धन जब मजूरी कर आया और उधर कलिया भी ड्यौढ़ी की टहल करके लौटी तो निर्धन ने पूछा-"कल्लो, आज बड़ा ख़ुश दिख रही हो,कोई ख़ास बात है?आज दोनों जून का टिक्कड़ मिल गया है क्या?"
"एक जून तो भारी पड़ता है,दोनों जून का टिक्कड़ कौन देने लगा!"
"...तो तेरी ख़ुशी का राज़ क्या है? ज़रा हम भी तो सुनें?इस तरह तो तूॅं ज़माने के बाद सॅंवरी है!"
"हाॅं, राज़ ही तो बताना है।"
"तो कह न...! पहेली कब तक बुझाती रहेगी ?"
"मैं गर्भिणी हो गयी हूॅं।"
"क्या...! क्या तूॅं माॅं बनने वाली है? मैं बाप बनने वाला हूॅं?"
कलिया झेॅ़प गयी।नज़र नवा कर बोली-"हमारा तप पूरा हो रहा है।अब मैं भी प्रसूति पीड़ा भोगने वाली सोहागिनी होऊॅंगी।"
"सुन कलिया,यह बात हम दोनों के अलावा तीसरा कोई न जानने पाये।" निर्धन ने जोश में होश के साथ कहा। "कल से तूॅं ड्यौढ़ी जाना भी छोड़ दे।हम दिन भर उनके बैलों के साथ बहते ही हैं,तूॅं कुछ दिनों तक नहीं जाएगी तो उनका कुछ भस-धॅंस नहीं जाएगा।हम कह देंगे कि वह कुछ दिनों तक नहीं आएगी,मन अच्छा नहीं रहता है।बेशी करेंगे तो पिछली तेरी मजूरी नहीं देंगे। और कुछ!"
इस तरह गर्भिणी कलिया ने नौ महीने पूरे किए थे।इस बीच निर्धन ने साॅंईॅं और सास दोनों की तरह उसका ध्यान रखा और शुश्रूषा की। अंतिम महीने के किसी दिन उसे दर्द उखड़ा था। निर्धन आज उसे छोड़ कर जाना नहीं चाहता था। परंतु भोर से ही ड्यौढ़ी की हाॅंक-पर-हाॅंक आ रही थी।सो उसे कलिया को छोड़ कर जाना पड़ा।इधर कलिया का दर्द बढ़ता जा रहा था। पड़ोस की बूढ़ी-पुरनियों ने उसे संभाले रखा।उसी दिन निर्धन के सूने में ही उसे बेटा हुआ था। यानी अशर्फी!
अशर्फी ने उन दोनों के जीवन को बदल दिया था। वह ज्यों-ज्यों बड़ा होने लगा,उससे उनकी उम्मीदें भी बढ़ने लगी थीं।वे दोनों उसे एक अलग जीवन देना चाहते थे।जिस पर उनके अपने जीवन के अंधेरे न हों। जिसकी छत्रच्छाया में उनका बुढ़ापा निश्चिंत और निर्द्वंद्व कट सके। ड्यौढ़ी में कई दफे कहा गया कि अशर्फियां को छोटे बौआ के साथ पटना जाने दे। वहाॅं वह अच्छे संसर्ग में सलीका सीख जाएगा। कुछ 'क-ट-प' भी जान जाएगा। परंतु कलिया और निर्धन इसके लिए तैयार नहीं हुये।
कलिया ने निर्धन से कहा -"आख़िर हमारा अशर्फी पटना में बरतन माॅंजना,कपड़ा कचारना और रसोई बनाना ही तो सीखेगा ! यही तो उसे संसर्ग का लाभ मिलेगा।निर्धन ने उसकी बातों से सहमति व्यक्त की।
इधर कुछ दिनों से अशर्फी बीमार पड़ा था।दिन भर लोगों के उलाहने बटोरने वाला आज खटिया पर पड़ा था।शीतदंश से उसके शरीर सूज गये और चेहरे पीले पड़ गए थे। कलिया रोज़ गाॅंव की ठाकुरबारी का नीर लाकर उसे पिलाती। उसके सिरहाने में बाबा का भस्म,अक्षत आदि रखती। कलिया को पूरी उम्मीद थी कि जिस ठाकुर बाबा की मान-मनौती से उसे अशर्फी रत्न मिला,उनके नीर,नैवेद्य से वह ठीक भी हो जाएगा। उनके धाम में देर होती है,अंधेर नहीं होता। उधर शाम को काम की थकान से चूर होकर निर्धन लौटता तो बग़ल के गाॅंव से एक गुणी ओझा को बुला लाता। ओझा जी झाड़-फूॅंक करते। निर्धन हर बार उन्हें दक्षिणा देकर विदा करता। वह उनके श्री चरणों में सर रखकर घिघियाता "-महाराज मेरा लाड़ला ठीक हो जाएगा न!"
ओझा जी बड़े आशावादी थे। "अरे,पगले, इसमें तुझे कोई संदेह है क्या? वह ठीक होकर दौड़ेगा। फिर संत मूर्तियों को तृप्त कराना।"
इसी तरह कुछ रोज़ और बीत गये। अशर्फी की दशा लगातार बिगड़ती गयी। रह-रह कर उसे कंपकंपी होती और देह ठंडी हो जाती। "कल्ली, मुझे अब अंदेशा होने लगा है। कहीं अपना लाल..." निर्धन इतना ही बोल पाया था कि कलिया ने उसके मुॅंह पर अपनी हथेली रख दी।" ऐसा नहीं बोलिए! कहीं दैव हमें जाॅंच रहे हों।"
"कल्ली,आज चमरु हरवाहा कह रहा था कि ठाकुर बाबा की दुआ भी तभी लगती है,जब डाक्टर,वैद्य की दवाई दी जाये।" निर्धन को रुआंसा होते देख कलिया भी विह्वल हो उठी।विपत्काल में ढाड़स का बड़ा महत्त्व है। परंतु जब ढाड़स देने वाला ही रुदित हो तो पीड़ित का क्या कहना! उसी दिन दोनों उसे लेकर सदर अस्पताल गये थे। डाक्टर ने अशर्फी की गंभीर स्थिति देखकर उसके माॅं-बाप को दुत्कारा। इतने दिनों से कहाॅं थे? रास्ता भटक गये या अस्पताल अपनी जगह से दूर चला गया था!
दोनों डाक्टर के पाॅंव में गिर पड़े। मेरे बच्चे को बचा लीजिए। उसके ताने से निर्धन दम्पति और भी घबरा गये थे। जैसे कुएं से बाल्टी ऊपर आ रही हो पर बीच में ही रस्सी छूट गयी हो। "मेरे बच्चे को बचा लीजिए... डाक्टर साहब आप ही हमारे ठाकुर बाबा हैं,आप ही हमारे इष्ट,श्रेष्ठ हैं।"
डाक्टर ने उन लोगों की दुस्थिति देख कर और कुछ कहना उचित नहीं समझा। अपने चिकित्सन में लग गया। परंतु लाख प्रयास के बावजूद डाक्टर अशर्फी को नहीं बचा पाया था।
सुमिरन ने कहा-"अकलू चाचा,इसी तरह पीठ और ठेहुने को गमछी से कसे बतियाते रहिएगा कि श्मशान की तैयारी भी कीजिएगा ? वे दोनों जने तो बेसुध पड़े हैं। आख़िर जो करना है,ऊ गोतिया समाज को ही तो...!"
"सो तो सुमिरन ठीके कहते हो।पर हम लोग तो देह से ही न करेंगे! अशर्फी बारह पार का था,अब तो उसमें काम लगेगा।अरथी का खर्च,श्मशान में भोज,फिर श्राद्ध का खर्च आदि में थूक-सतुआ सानने पर भी तीन-चार हज़ार तो लग ही जाएंगे। यह कौन देगा? घर की पिछवाड़ी पर निर्धन पहले ही बाबू भजनानंद जी से रुपया ले चुका है।"अकलू ने कहा।
इस पर भुखलू बोला-"निर्धन को भी समझा-बुझा कर पूछना चाहिए कि ऊ क्या राय देता है। आख़िर उसी की राय से न हमलोग कुछ कर सकते हैं !"
भुखलू के सुझाव पर सभी ने सहमति दी। कुछ लोग निर्धन को उठा-पठा कर लाये।उसका मतिभ्रंश हो चुका था।वह समझ नहीं पा रहा था कि यह सब क्या हो गया? कैसे हो गया और अब क्या करना है? उसने कहा-"भैयारी,मैंने कौन-सा पाप किया,किसका दिल दुखाया,किस अपराध का यह दंड मुझे मिला है?" अकलू के हाथ को झकझोरते हुए निर्धन ने कहा।
"निर्धन धैर्य धरो और मन को सकत करो। यह सब ऊपर वाले की लीला है। उनकी लीला में हम,तुम या कोई कुछ नहीं कर सकता। अशर्फी जिनका था,उनके पास चला गया। जितने रोज़ तुम्हारे पास रहा,तुम्हारा था। उतने दिन के तुम भागी थे। अब सांसारिक करतब करो।"
अपने कंधे पर बेसुध पड़े निर्धन को हिम्मत धराते हुए अकलू ने कहा। "कलिया को भी बुझाओ कि अशर्फी को यमदूत ले जा चुके हैं। अब वह प्राण भी दे देगी तो अशर्फी लौटने वाला नहीं। अब तो तुम्हारा इतना ही वश है कि मृतदेह की सद्गति करो। हम लोगों का भी यह धर्म है कि पुरखों की परंपरा के अनुसार उसे पंचावयव में अर्पित कर दें। तुम होश करो और बताओ कि श्मशान का खर्च कैसे पूरा होगा?"
"मुझे अब किसी कर्मकांड में विश्वास नहीं रहा।"
"लेकिन पुरखों के कर्म तो करने ही होंगे।"
"मेरे पास एक छदाम नहीं है।"
"तो यह सब कैसे होगा?"
इस पर रूखे भाव से निर्धन ने कहा -" बूढ़ा अशर्फी नहीं,मरा किशोर अशर्फी है। यदि इन कर्मकांडों में ताम-झाम नहीं होगा तो क्या पुरखों की पगड़ी उतर जाएगी !"
"इसमें ताम-झाम क्या है?"
"ट्रैक्टर-ट्रॉली,अरथी का सिंगार और श्मशान में भोज आदि के बिना क्या लाश नहीं जल सकती?"
"निर्धन होश करो। तुम बड़बड़ा रहे हो।अशर्फी के अकाल मरण से हम सभी लोग दुःखी हैं। पर जो सदियों से हमारा सनातन समाज करता आया है,उसे तो करना ही होगा। चाहे रो कर करें या मर-खप कर करें।
"तो मैं क्या करूॅं?"
"अभी के काम की बात करो।रात से लाश पड़ी है,दिन चढ़ता जा रहा है।जिसके कारण गोतिया समाज की सारी जीवन चर्या थम-सी गयी है।"
"गोतिया समाज से मेरी आरजू मिन्नत है कि लाश को बग़ल की गंडक नदी में जल समाधि करा दें,यही मेरी राय है।" "आख़िर निर्धन तुम ऐसी ऊट-पटांग बातें क्यों कर रहे हो? जब ज़िंदा था अशरफी तो तुम्हारी आंखों की पुतली,हृदय की धड़कन था,क्या मरने के बाद उसके प्रति तुम्हारा कोई धर्म,रिश्ता नहीं बचा? उसके मरने से तुम्हारे बाप बेटे का रिश्ता भी ख़त्म हो गया? यदि तुम ऐसा मानते हो तो हमारा समाज और हमारी परंपरा तुम्हें इसकी इजाज़त नहीं देती है।"
"जब जीवन ही नहीं बचा तो रिश्ते कैसे? परंतु यदि समाज का यही नियम है,हमारी परंपरा जो हमें प्राणों से प्रिय है तो यही सही।"
उसी समय बिरादरी के श्रेष्ठ जनों का पंच बाबू भजनानंद जी की ड्यौढ़ी पर गया। उनसे सनातन धर्म के अंतिम संस्कार के रक्षार्थ नमस्कार,विनती की। "मालिक,दस धूर में निर्धन की झोपड़ी बची है। उसे आप ले लीजिए,ताकि अशर्फिया का दाह संस्कार और श्राद्ध हो सके। पौरोहित्य और कौटुंबिक जेवनार करा कर यह अभागा पवित्र हो सके।"
"अरे,जब अशर्फिया जन्मा था,तभी से निर्धनमा दोनों जीव का ज़मीन पर पैर नहीं पड़ता था।...घमंड बापो को नहीं छोड़ता है।"
"मालिक,ई तो बौरा गया है। पहले ख़ुशी में अब मातम में। पता नहीं,क्या-क्या बड़बड़ा रहा है।जल समाधि करेंगे,ई करेंगे,ऊ करेंगे! मालिक,हमलोग तो ज़ोर-ज़बरदस्ती से पुरखों की परंपरा के लिए इसे मज़बूर किये हैं।अब आप ही के ऊपर सब कुछ है।"
"तुम लोग ज़ोर-ज़बरदस्ती कर सकते हो,हम नहीं कर सकते। पहले वाला समय नहीं है।जब तुम लोग इतनी चिरौरी कर रहे हो तो निर्धनमा और कलिया अंगूठे का निशान लगाए,हम काग़ज़ बनाते हैं ।"
काग़ज़ पंचों को पढ़ा दिया गया।उसमें लिखा था कि निर्धन और कलिया अपने बेटे अशर्फी के श्राद्ध तक अपनी झोपड़ी में रह सकते हैं।उसके बाद झोपड़ी छोड़नी होगी या पैसे के एवज में उसके चुकता हो जाने तक दोनों को ड्यौढ़ी में काम करना पड़ेगा।
निर्धन निशान देने के लिए अंगूठा बढ़ाया तो उसके हाथ कांप गये। उसकी आंख से लोर चू कर काग़ज़ पर गिर पड़े।" यही दुपहरिया थी,ठीक आज से बारह साल पहले,जब अशर्फी के जन्म लेने पर उसने अपने घर के पिछवाड़े को बेचने लिए लिए अंगूठे का निशान लगाया था।आज उसके मरने पर घर बेचने लिए अंगूठे का निशान दे रहा है।" मन में ज्वार उठी और वह फूट-फूट कर रो पड़ा।
शाम में अशर्फी की अरथी उठी और देर रात गए शव यात्री लौटे। श्मशान के स्वादिष्ट भोज की डकारें अभी तक आ रही थीं।
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नीरजा हेमेंद्र
कथाकार
ईमेल: neerjahemendra@gmail.com
जीवन पैरागेम नहीं है
मैं कार्यालय से बस से वापस घर जा रही थी। मेरा घर कार्यालय से लगभग छः कि0मी0 की दूरी पर है। कार्यालय से बस द्वारा लगभग एक कि0मी0 आगे बढ़ी थी कि प्रतिदिन की भाँति मेरी दृष्टि उस कोठी की ओर चली गयी जो मेरे मामा जी का घर है।
वो कोठी आज भी वैसी ही दिख रही है जैसी आज से छः-सात वर्ष पूर्व से दिख रही है। घर के बाहर कोई नही दिख रहा था। मैं प्रतिदिन इसी मार्ग से बस द्वारा कार्यालय जाती हूँ। और प्रतिदिन यहाँ से गुज़रते हुए एक बार मामा जी के इस हवेली नुमा कोठी की ओर स्वतः दृष्टि चली जाती है।
छः-सात वर्ष से ही प्रतिदिन मैं यह कोठी देख रही हूँ। इतने कम समय में ही यह कोठी कितनी पुरानी दिखने लगी है। छत के किनारे कंगूरों और खिड़कियों के छज्जों पर घास उग आयी है। कहीं-कहीं से कंगूरे के कोने और पलस्तर गिर भी रहे हैं। बंगले के चारों ओर दीवारों पर बारिश के पानी से काई जम गयी है। जब से यह बंगला बना होगा तब से कदचित् इसका रंगरोगन नही हुआ होगा। साज-सज्जा और रंगरोगन के लिए भी तो घर के सदस्यों के भीतर उमंग, उत्साह होना चाहिए। जिसका कदचित् यहाँ नितान्त अभाव है।
मामा जी के बड़े से घर के दो तरफ खुलने वाले गेट में एक में ताला लटका रहता है। दूसरी तरफ वाले गेट से आना-जाना रहता है। इस गेट से भी मैंने कभी-कभी ही किसी को आते-जाते देखा है।
छः-सात वर्ष पूर्व यहाँ की कुछ ऐसी स्मृतियाँ हैं जो मेरे मन-मस्तिष्क से कभी मिट नही सकतीं।........
.....पहले मेरे नाना-नानी का घर यहाँ से समीप के एक छोटे से शहर में था। मामा जी भी नाना-नानी के साथ वहीं रहते थे। मामा जी की प्रारम्भिक शिक्षा उसे छोटे से शहर में हुई। मैं बहुत छोटी थी जब मामा जी पास के बड़े शहर यानी कि यहाँ पर उच्च शिक्षा प्राप्त करने के लिए चले आये थे।
मेरी नानी की दो सन्तानें थीं। एक मेरी मम्मी दूसरे मामा जी। मेरी मम्मी मामा से बड़ी थीं। मामा जी और उनकी उम्र में छः-सात वर्ष का अन्तर था। माँ का विवाह भी छोटी उम्र में हो गया था। माँ के बच्चे यानि कि हम बड़े होते गये। बड़े तो मामा जी हो गये थे।
मामा जी के विवाह के लिए नानी चिन्तित रहतीं। मामा का विवाह तो दूर की बात थी, उनका कहना था कि वो अभी शिक्षा प्राप्त कर रहे हैं। जब तक कोई नौकरी नही पा लेंगे तब तक विवाह नही करेंगे।
मैं मम्मी के साथ बहुधा नानी के घर जाया करती थी। क्यों कि नाना-नानी अकेले रहते थे। मम्मी उनका हाल जानने जाती रहती थीं। ऐसा इसलिए सम्भव हो पाता क्यों कि मेरा घर नानी के घर से अधिक दूर नही था। नानी के घर से थोड़ी दूर पास के छोटे से कस्बे में था हमारा घर। मामा अवकाश के दिनों में कभी-कभी नानी के घर आते थे।
हम चार भाई-बहन थे। पापा की दवा की दुकान थी। जो ठीक-ठाक चलती थी। मैं जब भी मम्मी के साथ नानी के घर जाती तो नानी को अकेलेपन से जूझते हुए पाती। हम सब को देखते ही उनका चेहरा खिल उठता। जब हम घर आने लगते तो नानी एक-दो दिन और रूकने को कहतीं।
कभी-कभी मम्मी एक दिन और रूक जातीं। जब हम घर आने लगते तो नानी की उदासी देखी नही जाती। वह बार-बार कहती कि बेटवा शीघ्र विवाह कर लेता तो ठीक रहता।
’’ बिटिया को यहीं छोड़ दो। हमारे साथ रहेगी और यहीं पढ़ेगी। ’’ नानी मम्मी की ओर देख कर मेरे लिए कहतीं। मैं मम्मी की ओर ना में संकेत कर देती। यह सोचकर कि मम्मी कहीं हाँ न बोल दें।
समय अपनी गति से आगे बढ़ता जा रहा था। मामा की शिक्षा पूरी हो गयी। किन्तु मामा घर नही आये। नानी उनके आने की बाट जोहती रही। मामा नही आये। वो नौकरी की तैयारी करने के लिए वहीं रूक गये।
’’ मम्मी, मैं भी अपनी शिक्षा पूरी करने के पश्चात् विवाह करूंगी। ’’ मैं माँ से कहती।
’’ हाँ...हाँ...एक तो मेरा भाई पढ़ कर नौकरी ढूँढ़ रहा है। तुम भी उसी की लाईन में लग जाना। ’’ मम्मी ने कुछ व्यंग्य और थोड़े गुस्से मेें कहा।
’’ अभी से क्या सोचना अभी तो मेरा स्नातक भी पूरा नही हुआ है। और अभी से मम्मी से बात क्यों करना?....’’ मम्मी की बात सुनकर मन ही मन सोचते हुए मैं काॅलेज जाने की तैयारी करने लगी।
लगभग एक वर्ष भी न व्यतीत हुए थे कि पता चला कि मामा का चयन पी0सी0एस0 के द्वारा ए0डी0एम0 के पद पर हो गया। मामा की प्रथम पोस्ंिटग दूसरे शहर में हुई, जो नानी के घर से दूर था। अब तो नानी के घर मामा का आना और कम हो गया।
प्रशासनिक कार्यों के कारण अवकाश बड़ी कठिनाई से मिलता। नानी मामा को देखने को तरस जाती। ये तो अच्छा था कि फोन का चलन आम हो गया था। अतः नानी लगभग प्रतिदिन मामा को फोन करतीं।
मैं स्नातक पूरा कर अभी नौकरी आदि के फार्म भर ही रही थी कि मेरे मम्मी-पापा को एक नौकरीशुदा अच्छा लड़का मिल गया। मेरी विवाह तय होना ही था। मेरे लिए मेरे पापा का यही लक्ष्य था, मेरा विवाह समय से हो जाना। जो उन्हें पूरा होता दिख रहा था।
आने वाले विवाह के सीजन में मेरा विवाह हो गया। विवाह से पूर्व मैंने नौकरी के लिए एक-दो परीक्षाएँ दे दी थीं। मेरा विवाह उसी शहर से थोड़ी दूर हुआ जहाँ मामा जी ने अपनी शिक्षा तथा नौकरी की तैयारी पूरी की थी।
अब नानी की एक ही इच्छा थी कि मामा जी का विवाह हो जाए। मामा जी का विवाह हुआ उनकी पसन्द की लड़की से जो ट्रेनिंग में उनके साथ थी। अब वो भी ए0डी0एम के पद पर कार्यरत थी। विवाह के पश्चात् मामी अपनी नौकरी पर चली गयीं। मामा अपनी नौकरी पर।
नानी ठहरी पुराने जमाने की। उन्होंने सोचा कि विवाह पश्चात् बहू उनके साथ गाँव में रहेगी। उनको कहाँ ज्ञान था कि छोटी कलक्टर बहू भी नौकरी पर जाएगी और बेटे के साथ कभी-कभी उनसे मिलने आएगी।
नानी-नाना अकेले रहते-रहते अब थक चुके थे। उनकी उम्र हो गयी थी। अब वे अन्तिम समय अपने एकलौते पुत्र के साथ रहना चाहते थे।
’’ हमको कुछ हो जाएगा तो बेटवा को आते-आते सारा दिन लग जाएगा। हमारी मिट्टी की दुर्दशा हो जाएगी। ’’ नानी मेरी मम्मी से कहती। क्यों कि मामा को ट्रेन से नानी के पास आने में लगभग एक दिन लग जाता।
’’ तुमको कुछ न होगा अम्मा। हम सब तुम्हारे पास रहेंगे। फोन से एक हाँक लगाओगी। तुरन्त सब लोग आ जाएंगे। दवा-दारू होगा तुम ठीक हो जाओगी। तुम ये बेकार की चिन्ता न किया करो अम्मा। ’’ मम्मी नानी को समझाते हुए कहतीं।
’’
नानी तुम नही रहोगी तो कैसे जान पाओगी कि तुम्हारी मिट्टी की दुर्दशा हो रही है कि सम्मान? ’’ मेरे सामने नानी कभी ये बात कह देती तो मैं हँसी में ये बात कह देती।
’’ ये लड़की हर बात में हँसी करती हैं। ’’ मम्मी मुझे झिड़की देते हुए कहतीं।
’’ काहे डाँट रही हो बिटिया को? सही तो कह रही है। मरने के बाद कौन जानता है कि दुनिया में क्या हो रहा है? ’’ हँसते हुए नानी मम्मी से कहतीं।
विवाह के पश्चात् मैं ससुराल में रहने लगी। लगभग छः माह पश्चात् पता चला कि नौकरी के लिए कुछ परीक्षाएँ जो मम्मी के घर रह कर मैं दे आयी थी, उनमें से एक नौकरी में मेरा चयन हो गया है।
मैं बहुत खुश थी। सच कहूँ तो मैं विवाह के पश्चात् अब नौकरी की उम्मीद खो बैठी थी। सोच लिया था कि अब घर का सजाने-सँवारने का ही काम करूँगी। जो कि कुछ बुरा नही था।
डाक से ज्वइनिंग लेटर मिलते ही मैंने अपने पति के साथ जाकर नौकरी ज्वाइन कर ली। मेरा कार्यालय मेरी ससुराल से लगभग छः किमी0 दूर था। मुझे बस से जाना पड़ता था। इसी मार्ग में बीच शहर में मामा जी की ये बंगलेनुमा बड़ी कोठी पड़ती थी।
मैंने नौकरी पर प्रतिदिन आने लगी। दिनचर्या व्यवस्थित हो गयी। लगभग पाँच माह मुझे माँ बनने का उत्तरदायित्व निभाना था। इसके लिए मैंने अपने कुछ अवकाश बचाकर रखे थे। पहले सन्तान के आने की प्रसन्नता और प्रतीक्षा मेरी ससुराल में सबको थी। ससुराल में सबके सहयोग से मेरे घर और कार्यालय का काम व्यवस्थित था।
माँ को पता चला तो उन्होंने मुझसे कहा कि दामाद जी से कहना कि इस खुशखबरी को मुझे सबसे पहले बताएँ। मैं सबकी खुशियों में सम्मिलित थी। किन्तु मेरी चिन्ताएँ कुछ और थीं। वो चिन्ताएँ ये थीं कि बच्चा और कार्यालय साथ-साथ कैसे सम्हालूँगी? मेरी इस चिन्ता को कोई नही समझ सकता था।
समय पूरा होने पर मैं एक बच्ची की माँ बन गयी। लगभग दो माह का अवकाश मैंने ले लिया। मम्मी के घर से मेरे लिए, बच्ची के लिए कपड़े, पायल तथा मेवे, ड्राईफ्रूट के बने बहुत सारे लड्डू मम्मी ने भेजे थे। घर में रहते-रहते मैं भूल-सी गयी कि अब अवकाश समाप्त होने वाला है और मुझे कार्यालय जाना है।
किन्तु कार्यालय तो जाना ही था। बच्ची को घर के लोगांे के हाथोें सौपकर मैं कार्यालय आने जाने लगी। मेरी ससुराल में मेरे पति के भाई, दो छोटी बहनें, सास-ससुर सभी एक साथ रहते हैं। एक बड़े परिवार के साथ रहने में मुझे बहुत अच्छा लगता।
समय व्यतीत होता जा रहा था। देखते-देखते तीन वर्ष बीत गयी। मैं एक पुत्र की भी माँ बन गयी। बेटा छः माह का हो गया था। घर में सबकी आँखों का तारा था।
’’ सुनिए, माँ के घर गये मुझे बहुत दिन हो गये। सबको देखने का मन हो रहा है। अगले हफ्ते दो दिनों का अवकाश एक साथ हो रहा है। कहो तो माँ के घर चलें? ’’ एक दिन मैंने अपने पति से कहा।
’’ ठीक है। माँ से बता देना। तत्पश्चात् हम तैयारी कर लेंगे। दो दिन के लिए सामान पैक करने में कितना समय लगेंगा। ’’ मेरे पति ने कहा।
मैं पति की बात का अर्थ समझ गयी। मुझे कहीं आने-जाने के लिए अपने घर के बड़ों की आज्ञा लेनी चाहिए। ऐसा करने से बड़ों का सम्मान बना रहता है। बड़ो की दृष्टि में हम छोटों को स्नेह मिलता है। हमारे इस बड़े घर की अम्मा मेरी सास थी। जिनसे मुझे मायके जाने की आज्ञा मिल गयी।
मैं मायके गयी। सबसे मिली। सभी मेरे बच्चों को खूब स्नह दे रहे थे। बेटे को गोद से उतार ही नही रहे थे। सबसे मिल कर मुझे बहुत अच्छा लग रहा था।
शाम का भोजन कर के हम सब छत पर गये। बातों-बातों में मम्मी नानी का हाल बताने लगी कि नानी बार-बार मामा से कहती कि हमें अकेले यहाँ नही रहना है। मामा ने शहर में एक नया घर बनवा लिया है। नाना-नानी भी अब उनके साथ रहते हैं। ’’ मम्मी ने कहा।
’’ कहाँ पर नया घर बनवा लिया है? ’’ मैंने उत्सुकता से पूछा।
’’ तेरी ससुराल से कुछ आगे। शहर के बीच में स्थान का नाम बताते हुए अम्मा ने कहा। अम्मा ( मेरी नानी ) बता रही थीं कि बहुत बड़ा बंगला बनवाया है। अम्मा अब बेटे के साथ हैं तो बड़ा आराम है। उनको तो यही चिन्ता रहती थी कि अन्तिम समय बेटे के पास रहें। बेटे ने उनकी इच्छा पूरी कर दी थी।
’’
मामा के अब कितने बच्चे हैं अम्मा? ’’ मैंने अम्मा से पूछा।
’’ वही एक लड़का है। आठ साल का हो गया। न ठीक से चल पाता है, न साफ बोल पाता है। दूसरा बच्चा उन लोागें का हुआ नही या किया नही भगवान जाने। आजकल का चलन है कि नौकरी में कोई खलल न पड़े इस लिए बहुत से लोग बच्चा नही करते हैं। ’’ अम्मा की बात सुनकर मेरा मन व्यथित हो गया।
कुछ देर पश्चात् भाई-भतीजियों के साथ मन पुनः प्रफुल्लित हो गया। किन्तु मन ही मन मैंने यह निश्चय किया कि मामा का घर मेरे कार्यालय के मार्ग में पड़ता है तो किसी दिन पति को बताकर मामा जी का घर ढूँढ़ने का प्र्रयास करूँगी। मैं जानती थी कि मामाजी और मामी दोनों अच्छी प्रशासनिक नौकरी में हैं। अतः घर ढूँढ़ने में दिक्कत नही होगी। आसपास के लोग सब उनको जानते होंगे।
....और एक दिन मैं सासू माँ को बता कर आयी थी कि समय मिला तो मामाजी के घर जाऊँगी। उस दिन माँ के बताये पते पर बस से उतर गयी। बस से उतर तो गयी किन्तु समस्या ये थी कि अब मामाजी का पता किससे पूछँू। यहाँ किसी को जानती नही। मात्र सामने की सड़क से बस द्वारा प्रतिदिन आया जाया करती हूँ। यहाँ के बारे में और कुछ नही जानती।
सहसा मुख्य सड़क पर सामने एक पान वाले की गुमटी दिख गयी। मेरे पग उधर ही बढ़ गये।
’’
भईया जयवर्धन जी, जो एक बड़े अफसर हैं उनके घर कहाँ है, बता सकते है? वो यहीं कहीं पर रहते हैं? ’’ मेरे इतना पूछते ही वो मुस्करा पड़ा।
’’ अरे मैडम जी, आप जहाँ से आयी हैं वहीं बायें से दूसरे नम्बर का वो बड़ा वाला बंगला उन्हीं का है। ’’ उस भले पान वाले ने मामा जी के बंगले की ओर संकेत करते हुए कहा।
मैंने अपनी दृष्टि उधर उठाई ही थी कि मेरे आश्चर्य की सीमा न रही। वो मामाजी का इतना बड़ा बंगला जो प्रतिदिन आते-जाते मेरी दृष्टि के सामने से गुज़रता था। शायद गेट के पास मामाजी का नेमप्लेट भी लगा है किन्तु मुझे थोड़ा भी आभास नही था कि यहीं और ये सामने ही मेरे सगे मामाजी का घर है।
मैं मामाजी के घर की ओर बढ़ गयी। मैं सोच रही थी कि इस समय मामा जी और मामी जी काम पर चले गये होंगे। नाना जी और नानी से मुलाकात हो जाएगी। हो सकता है उनका बेटा भी घर में हो। यदि हुआ तो उससे भी पहली बार ही मिलूँगी।
कुछ ही मिनटों में मैं मामा जी गेट पहुँच गयी और गेट पर लगी घंटी बजा दी। अन्दर से एक आदमी आया जो नौकर लग रहा था। उसने गेट पर लगी छोटी खिड़की से मेरे बारे में पूछा, और अन्दर चला गया। लगभग तुरन्त वो बाहर आया और गेट खोल कर मुझे नमस्ते किया और मुझे नानी के कमरे में ले गया।
मुझे भीतर कई कमरे दिखे। घर भीतर से बहुत भव्य लग रहा था। मैं नानी के कमरे गयी। नानी बेड पर लेटी थीं। उसी कमरे में एक और तख्त बिछा था जिस पर नाना जी बैठे थे।
’’ आप ठीक हैं नानी? ’’ कहते हुए मै। नानी के बेड के एक कोने में बैठ कर उनके हाथों अपने हाथों में ले लिया।
मैंने नाना के भी पैर छुए। नाना मुझे देखकर मुस्कराए जा रहे थे। मुझे देखकर उनके चेहरे पर कितनी संतुष्टि के भाव आ गये थे।
’’
अरे बिटिया! तुम इतनी दूर हम लोगों से मिलने चली आयी? बहुत अच्छा लग रहा है। ’’ नानी ने मेरा हाथ पकड़े हुए कहा।
’’ नानी, आपसे और नाना से मिलने की बहुत इच्छा थी। इसके लिए मैं बहुत दूर से नही बल्कि कार्यालय से आ रही हूँ जो यहाँ से तीन-चार किमी0 दूर है। मैं प्रतिदिन इधर से ही आती-जाती हूँ। ’’ मैंने नानी से कहा।
कुछ देर में नौकर ने चाय और साथ में खाने के लिए कुछ स्नैक्स हम तीनों के लिए लेकर आ गया। इस बार उसके साथ व्हीलचेयर पर एक आठ-नौ वर्ष का बच्चा था, जो अपनी व्हीलचेयर खुद चलाता हुआ आया।
बच्चे ने नानी की बेड के पास आकर अपनी व्हीलचेहर रोक दी और उत्सुकता से मेरी ओर देखा तत्पश्चात् प्रश्नवाचक दृष्टि से नानी की ओर देखने लगा। उस बच्चे के चेहरे के प्रत्येक भाव पढ़े जा सकते थे। इतनी क्लियर भावभंगिमा थी उसकी।
’’ ये मेरी बेटी मतलब तुम्हारी बुआ की बेटी है। ’’ नानी ने हाथों से संकेत कर के बताया।
बच्चा समझने की मुद्रा में हाँ में सिर हिलाता हुआ हाथ से दूर स्थित हमारे घर की ओर संकेत किया। उसकी मुखमुद्रा से स्पष्ट था कि वह सब कुछ समझ गया है और संतुष्ट हो गया है। वह कभी मुझे देख कर, कभी नानी को देख कर मुस्करा दे रहा था। प्रत्युत्तर में मैं भी मुस्करा दे रही थी।
’’
ये जयवर्धन का बेटा है। ’’ नाना जी ने मुझसे कहा।
’’
हाँ नाना जी। बहुत अच्छा बच्चा है। ’’ वैसे नाना जी के बताने से पूर्व ही मैं समझ गयी थी कि यह मामा का बेटा है। मम्मी ने मुझे बहुत पहले बताया था कि इसे चलने में दिक्कत है। जयवर्धन और उसकी बीवी बहुत बड़े-बड़े डाॅक्टरों से उपचार करवा रहे हैं।
’’
यश बेटा, कुछ खाओगे? ले लो। ’’ नानी ने एक प्लेट बच्चे की ओर बढ़ाते हुए कहा। बच्चे ने ना में सिर हिला दिया।
’’
आपकी तबियत कैसी है नाना जी? ’’ मैंने नाना जी की ओर मुखतिब होकर पूछा।
’’ अब ठीक है। थोड़ी कमजोरी हो गयी थी। चलने में दिक्कत हो रही थी। अब ठीक हैं। ’’ नाना जी ने कहा।
’’
हम भी छड़ी लेकर चलने लगे हैं। ’’ नानी कहा।
’’ अच्छा नानी अब चलते हैं। आप लोग अपने स्वास्थ्य का ध्यान रखिएगा। मैं फिर आऊँगी। ’’ कहते हुए मैं चलने के लिए खड़ी हो गयी।
जाने से पूर्व यशवर्धन के पास जाकर उसे सिर पर हाथ फेर कर प्यार किया। उसे भी समझाते हुए कहा कि पुनः आऊँगी। यश ने मेरा हाथ पकड़ लिया तो छोड़ ही नही रहा था। बार-बार संकेतों में बता रहा था कि मैं न जाऊँ।
बड़ी कठिनाई से उसे समझा पायी कि मैं शीघ्र ही पुनः आऊँगी। उसने मुझे टाटा किया। मैंने नाना-नानी के पैर छुए और बाहर निकल आयी।
बाहर सड़क पर कुछ मिनट ही खड़ी रही कि मुझे अपने घर जाने वाली बस मिल गयी। मैं बस में बैठ गयी। बस मेरे शहर की ओर चल पड़ी किन्तु मेरा मन तो जैसे नाना-नानी और यश के पास रह गया। मैं उन्हीं लोगों के बारे में सोचने लगी कि.....
......वृद्धावस्था
उम्र को कहा जाता है या ये कोई बीमारी है जो लाइलाज है। नाना-नानी मात्र वृद्ध ही तो हुए है और न तो ठीक से चल पा रह हैं न खा पा रहे हैं। नाना बता रहे थे कि शरीर में ताकत कहाँ से आएगी? न तो कुछ खाने की इच्छा होती है, न तो भूख लगती है।.....
.....दो निवाले मुँह में डाले नही कि मन भर जाता है पेट भरे न भरे। जबरदस्ती कुछ खाने का प्रयत्न करो तो लगता है कि सब पेट से बाहर आ जाएगा। ’’ नाना की बातों में कितनी विवशता थी। यह विवशता उम्र की थी या वृद्धावस्था नाम की बीमारी की। कुछ भी समझ पाना कठिन है।
मन में ये प्रश्न भी चल रहा था कि क्या वृद्धावस्था कोई बीमारी है या मात्र शरीरिक दुर्बलता। नाना-नानी को युवावस्था से देखते हुए अब इस उम्र में देखना बड़ा ही दुखदाई है।
नाना-नानी ने तो अपनी उम्र जी ली है। मैं यशवर्धन के बारे में सोच रही थी। वो बच्चा बड़ा होकर कैसे रहेगा? उसकी भी उम्र बढ़ेगी तो उसकी देखभाल कौन करेगा? वो दिनभर घर में अकेले रहता है? उससे बातें करने वाला उसकी उम्र का कोई नही है।
अकेलेपन को वो अभी से महसूस कर रहा है। तभी तो चलते समय मेरा हाथ नही छोड़ रहा था। नौकर समय-समय पर भोजन दे देता होगा। दैनिक कार्यों में हेल्प कर देता होगा। उसे देख कर मेरा मन बहुत दुखी हो रहा था। बच्चों को ऐसा बनाकर भगवान कौन-सा सुख पाते हैं? ओह! यशवर्धन तुम्हारे हाथो का स्पर्श मैं अभी तक महसूस कर रही हूँ।
नानी तो बिस्तर पर से उठी ही नहीं। कदाचित् उन्हें उठने में तकलीफ होती होगी। गेट तक छोड़ने नाना ही आये।
अनके अनसुलझे प्रश्नों को मन में लेकर मैं घर आ गयी। रसोई में शाम का काम सबके साथ मिलकर करने के पश्चात् मैंने माँ को फोन मिलाया। मामा के घर जाने की बात उनसे बतायी।
मम्मी बहुत कुछ जानना चाहती थीं। विशेषकर नाना-नानी के स्वास्थ्य के बारे में। मैंने कह दिया सब कुछ ठीक है।
’’ मामा-मामी से मुलाकात हुई? ’’ मम्मी बातें पूछती ही चली जा रही थीं। उनका मन नही भर रहा था।
’’ उनसे कैसे मुलाकात होगी मम्मी? वो लोग तो आॅफिस गये थे। ’’ मैंने कहा।
’’ मम्मी, मैं शीघ्र ही पुनः नाना-नानी से मिलने जाऊँगी। आपको उनका हाल बताती रहूँगी। ’’ मैंने मम्मी से कहा। मेरी बात सुनकर मम्मी बहुत खुश हुई।
मामा जी के घर गये दो महीने हुए थे। अब मैं किसी दिन पुनः जाने के लिए सोच रही थी। घर में माँ जी ने आज्ञा दे दी थी।
उस दिन कार्यालय के लिए निकल रही थी कि फोन की घंटी बज उठी। माँ का फोन था।
’’ बिटिया तुम कहाँ हो? नाना जी नही रहे। मैं और तुम्हारे पापा अब वहाँ के लिए निकल रहे हैं। तुम आॅफिस नही गयी हो तो आज छुट्टी कर लो और मामा के घर आ सको तो अच्छा रहेगा। तुम्हारे घर की जैसी स्थिति हो वैसा ही कर लेना। ’’ मम्मी ने रोते हुए कहा।
कार्यालय से अवकाश ले कर मैं सीधे मामाजी के घर गयी। मम्मी-पापा यहाँ पहली बार आये थे। जब कि मामाजी का बंगला बने कई वर्ष हो गये थे। मैं मम्मी-पापा से पहले पहुँची थी। क्यों कि मुझे मामाजी का घर ढूँढ़ना नही था। मम्मी-पापा पूछते-पूछते आ ही रहे होंगे।
मामाजी तैयारियों में व्यस्त थे। मैं यशवर्धन के पास बैठी थी। वह चुपचाप खामोशी से सब कुछ देख रहा था। उसका चेहरा भावशून्य हो रहा था। मैं उसे बार-बार गले लगा ले रही थी। इतनी देर में मम्मी-पापा आ गये।
मैं मम्मी के पास जाने लगी। किन्तु यशवर्धन ने मेरा हाथ जोर से पकड़ लिया था और उठने नही दिया। मम्मी ने ये सब कुछ देख लिया और उसके पास बैठने के लिए कहा।
नानी बार-बार यही कह रही थीं कि ’’ नाना तो ठीक थे। न जाने क्यों हमें छोड़ कर चले गये? ’’ नानी बार-बार यही बोल रही थीं। वो ठीक से रो नही पा रही थीं। या ये कहंे कि बुढ़ापा रोने नही दे रहा था।
घंटे भर में नाना जी को चार कंघे लेकर चले गये। घर में सब कुछ वैसा ही हो गया जैसा पहले था....सन्नाटा।
दूसरे दिन मम्मी-पापा के साथ मैं भी मामजी के घर से चली आयी।
’’
नाना जी ठीक थे। नानी अस्वस्थ थीं। नाना मुझे गेट तक छोड़ने आये थे। ’’ मैंने मम्मी से कहा।
’’ जिसकी जब लिखी होती है....। ’’ कह कर मम्मी रोने लगी।
ये दुःख भरे दिन किसी प्रकार व्यतीत हो रहे थे कि लगभग छः पश्चात् नानी इस दुनिया से चली गयीं। मम्मी-पापा, मैं सभी लोग पुनः मामा जी के घर गये। नाना जी की भाँति इन्हें भी चार कंधो पर उठा कर दुनिया के इस झमेले से मुक्त कर दिया गया।
अगले दिन हम सब घर आने के लिए तैयार होने लगे तो मामा ने कहा कि-आज और रूक आओ। कल चले जाना।
मैं समझ गयी कि पिता के चले जाने के पश्चात् माँ का साया सर पर था। इस कारण मामा जी को अकेलापन महसूस नही हुआ। माता-पिता का साया सिर पर हो, चाहे वे बिस्तर पर पड़े ही हों तो क्या बहुत बड़ा सहारा होता है।
मामाजी के सिर से माता-पिता दोनों का साया उठ चुका था और वो अकेलापन महसूस कर रहे थे। यही कारण था कि उन्होंने पिछली बार नही बल्कि इस बार हमें रूकने के लिए कहा।
एक दिन और रूक कर हम घर चले आये।
’’ अच्छा हुआ अम्माँ को इस अकेलेपन के दर्द से मुक्ति मिल गयी। ’’ पहली बार मैंने मम्मी के मुँह से किसी की मृत्यु के बारे में ऐसा कहते सुना।
’’ क्यों माँ? क्या तकलीफ थी नानी को? मामाजी इतने बड़े अफसर हैं। ’’ मैंने मम्मी से कहा।
’’
मामा-मामी दोनों काम पर चले जाते हैं। नौकर के भरोसे अबोला बच्चा यशवर्धन रहता है। नानी चल-फिर भी नही पातीं थीं कि वो उठकर देख सकें कि नौकर बच्चे को क्या खिला-पिला रहा है? कैसे रख रहा है? ’’ मम्मी की बात सुनकर मैं थोड़ी चिन्तित हो गयी।
’’ मम्मी, मामा जी को दूसरा बच्चा नही हुआ? ’’ मैंने मम्मी से जानना चाहा।
’’ दूसरा कहाँ से होता? जयवर्धन की बीवी नौकरी करने के लिए दूसरा बच्चा आने ही नही दी। जय बता रहा था कि दो बार एबार्शन करा दिया था। ’’ कह कर मम्मी ने दुःख भरी ठंडी आह भरी और चुप हो गयीं।
’’ किसे पता था कि एक बच्चा होगा और वो ऐसा हो जाएगा? ऊपर वाले की जैसी इच्छा? ’’ मैंने मम्मी को सान्त्वना देते हुए कहा।
मुझे चिन्ता मात्र यशवर्धन की थी। दिन में कोई समस्या आने पर वो बच्चा नौकर से कैसे कहता होगा? नौकर कितना समझता होगा? उसकी समस्या का समाधान कैसे होता होगा?.....आदि.....आदि...अनेक प्रश्न मन में उठ रहे थे। मन व्यथित हो रहा था, भारी हो रहा था।
घर आयी तो पति से इसकी चर्चा की। उन्होंने मुझे एक सुझाव दिया जिसे किसी दिन मामा जी के घर जाकर या फोन पर बता दूँ।
’’ क्यों न किसी दिन उनके घर चली जाऊँ? फोन पर आपनी बात ठीक से समझा पाऊँगी या नही और मामा जी भी समझ पाएंगे या नही। ’’ मैंने पति से कहा।
’’ ठीक है, जैसा तुम्हें ठीक लगे। किन्तु मम्मी से बता देना। ’’ मेरे पति ने कहा।
कुछ दिनों पश्चात् एक दिन मैं कार्यालय से लौटते समय मामा जी के घर चली गयी। मामा जी और मामी कार्यालय से आ चुके थे। मेरी आवाज सुनते ही यशवर्धन अपनी सायकिल चलाता हुआ आकर मेरे पा रूक गया। मैं उसका हाथ पकड़ लिया। उसके माथे को सहला कर स्नेह किया। वह मुझे देख कर मुस्करा रहा था। मामाजी और मामी दोनों मेरे सामने साफे पर बैठे थे।
’’ मामा जी मैं एक आवश्यक बात करना चाहती हूँ यशवर्धन के बारे मेें। ’’
’’ क्या? बताओ। ’’ मामी ने कहा।
’’ यशवर्धन जैसे स्लो बच्चे के लिए सरकार की एक योजना है। ये बच्चे स्पोर्ट्स यानि कि खेलकूद सीखते हैं। साथ में शिक्षा भी दी जाती है। मैंने उन्हें स्कूल का नाम बताते हुए यह भी बताया कि वहाँ बच्चे को हाॅस्टल में रखते हैं। और बच्चे का और उसकी मानसिक विकास पूरा ध्यान रख जाता है।......’’ मेरी बात सुनकर मामी शंका भरी दृष्टि से मेरी ओर देख रही थीं।
......’’ मामी इस स्कूल से कई बच्चे स्पोर्ट्स में नेशनल और इण्टरनेशनल स्तर पर खेल चुके हैं। आप जाकर स्कूल देख लीजिए। संतुष्ट हो कर ही कुछ कीजिए। वैसे आप लोगों से कहना छोटा मुँह और बड़ी बात करना है। ’’ कह कर मैंने अपनी बात पूरी की।
’’
ठीक है हम देख लेंगे। ’’ मामी ने ऐसे कहा जैसे मैं प्रतिदिन उनके घर जाती हूँ। और उनके जीवन में हस्तक्षेप करती हूँ।
कुछ देर यश के साथ खेलने के पश्चात् मैं घर चली आयी।
अगले दिन मम्मी का फोन आया तो मैंने मम्मी से सब कुछ बताया। तथा मामी के रूखे व्यवहार के बारे में भी बता दिया। साथ में यह भी कि मैं यश को ऐसे एक विकलांग का जीवन जीने के लिए नही छोड़ूँगी। मैं मामा से पुनः बात करूंगी। ऐसे बच्चे भी सामान्य लोगों की भाँति जी सकते हैं। अपनी प्रतिभा से आगे बढ़ सकते हैं।
माँ ने मेरी बात का समर्थन तो किया किन्तु आशंका जताई कि मामा-मामी मेरी बात सुनेंगे कि नही।
मैं अवकाश के दिन मामा के घर गयी। ताकि मामाज और मामी सभी लोग मुझे मिल जएँ। जब कि अवकाश में मुझे भी कई काम घर में रहते हैं। किन्तु काम तो सारी उम्र लगा रहता है। यश के लिए अभी कुछ करना है। मामा को समझाया कि यश को ऐसे घर में बैठा कर नही रखा जा सकता। उसे आगे कुछ करने का अवसर दीजिए। मामी भी वहीं बैठी थीं।
’’ तो तुम्हीं करो। हम लोगों के पास तो समय नही हैं। हम मात्र पैसे दे सकते हैं। तुम उसकी शिक्षा का उत्तरदायित्व ले लो। ’’ मामी ने ऐसे कहा जैसे यश उनका नही मेरा बच्चा है।
अपनी बात कर मैं घर चली आयी। मेरे मन में निराशा भरती जा रही थी। निराशा यश के प्रति।
बाद में मामा का फोन आया। वो मामी के व्यवहार के लिए मुझसे क्षमा मांगने लगे।
’’ कोई बात नही वो कह सकती हैं। ’’ मैंने कहा।
मामा और मैंने अवकाश लेकर यश का एडमिशन करा दिया। उसे उसके प्रशिक्षक ने पैरा गेम में शूटिंग के लिए उसका नाम आगे बढ़ाया। उसने अति कुशलता और शीघ्रता से निशनबाजी सीखी कि दो वर्ष के पश्चात् स्टेट की टीम में चुना गया। और विजेता बना।
आज यश नेशनल टीम में पैरा निशानेबाजी के लिए चुन लिया गया है और अभ्यास कर रहा है। वह दिल्ली में खेल अकादमी के हाॅस्टल में ही रहता है। अब वह कुछ-कुछ बोलने लगा है, टूटी-फूटी भाष में ही सही अपनी बात समझा सकता है। इस बीच मैं पति को बता कर उससे कई बार मिलकर आयी हूँ। दो बार मामा जी के साथ भी जाकर मिल कर आयी हूँ।
’’ तुम्हें देख कर उसका चेहरा खुशी से प्रफुल्लित हो जाता है। इतना खुश तो वो अपनी माँ को देख कर भी नही होता है। बेटा, यश के लिए तुमने हम लोगों को सही रास्ता दिखाया है, इस बात कदाचित् यश समझता है। तुम्हारा धन्यवाद हम लोग कैसे करेंगे, समझ में नही आता है। ’’ नही मामा ऐसी बात न कीजिए। यश पूरी दुनिया में अपना नाम रौशन करेगा। यह उसके भाग्य में लिखा है।
मेरे घर में तथा मम्मी के घर में उस दिन सब लोग टी0 वी0 के समने बैठे थे। पैरा गेम हो रहे थे। आज शूटिंग का दिन था। फील्ड में यह उद्घोषणा होते ही स्वर्ण पदक विजेता यशवर्धन....। यह सुनते ही हम सब के नेत्रों से अश्रु बहने लगे। घर में कोई ऐसा नही था जिसके नेत्र उस बच्चे के लिए भीगें न हों। उस समय जितने अश्रु बहे वे सब खुशी के थे।
सहसा फोन की घंटी बज गयी। फोन मामी का था।
’’ मुझे क्षमा कर देना बेटा। मैं एक बुरी माँ हूँ। तुम खुशियाँ बाँटने वाली परी हो। ’’ कह कर मामी बेतहाशा रोने लगीं।
’’ नही मामी, ऐसा न कहिए। माँ कभी बुरी नही होती। ’’ मामी को समझाते हुए मैंने कहा। उन्हें रोने से चुप कराया। शीघ्र ही यश के पास जाकर उन्हें उससे मिलने के लिए भी कहा।
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व्यंग्य
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डॉ. मुकेश 'असीमित '
गंगापुर सिटी राजस्थान पिन कॉड ३२२२०१
ईमेल: drmukeshaseemit@gmail.com
आखिर नाक का सवाल
इस विचित्र दुनिया में, जहां हर चीज़ की अपनी एक खास पहचान होती है, वहां 'नाक' ने भी अपनी एक अनोखी जगह बना ली है। अरे, यह वह नाक नहीं है जो चेहरे के बीचोबीच शान से बैठी रहती है, बल्कि यह तो उस नाक का किस्सा है जो आजकल समाज में हर जगह अपना रंग जमाए बैठी है।
किसी जमाने में नाक सिर्फ सांस लेने और खुशबू महसूस करने का जरिया हुआ करती थी, लेकिन कालांतर में इसने कुछ ऐसे रूप धारण कर लिए हैं कि बस, पूछो मत! कहीं यह 'नाक का सवाल' बनकर समाज में इज़्ज़त की नाव को समाज की अपेक्षाओं के भंवर जाल में डुबोने से बचाती है, तो कहीं 'नाक के बाल' बनकर ज़िंदगी की जटिलताओं में उलझाती नज़र आती है। कहीं नाक कट जाने के डर से न जाने कितने गरीबों के दो वक्त के चूल्हे की रोटी ठंडी हो जाती है।
अब आप ही बताइए, जब कोई आपके अपने काम में 'नाक' अड़ा दे, तो आपका सारा समय उस नाक को निकालने में लग जाएगा। वहीं, 'नाक कटने' ने तो कई लोगों को इस समाज में मुंह दिखाने लायक नहीं छोड़ा। जब शूर्पणखा की नाक काटने को लेकर पूरी रामायण छिड़ जाती है, तो भला आज के जमाने में कम से कम इस नाक कटने को लेकर एक गर्मागर्म बहस और छींटाकशी तो हो ही सकती है। और कुछ नहीं तो सोशल मीडिया के कुछ 'चिपकू' इस नकटे व्यक्ति की तस्वीरें डालने से लेकर, गली के नुक्कड़ पर चाय पीते हुए गप्पें हांकने तक अपनी मौजूदगी दर्ज करवा ही देते हैं।
इस कलयुग में, 'नाक' एक ऐसा अवयव बन चुका है, जिसकी महिमा न सिर्फ मानव शरीर में, बल्कि समाज के हर कोने में विस्तारित हो चुकी है।
यह नाक, किसी खास वर्ग के लोगों के लिए तो एक तरह से चुंबक का काम करती है। ये लोग चाहे जितने भी बड़े-बड़े कारनामे कर लें, लोग इस फौलादी नाक को पकड़-पकड़कर अपनी-अपनी तरह से सलामी देते नहीं थकते। इनमें कुछ बड़े बिगड़ैल रईस किस्म के लोग होते हैं, तो कुछ मक्कार नेता। बड़े-बड़े कारनामे, जैसे सरकारी स्कीमें हड़पना, अवैध कब्जा करना, बड़े घोटाले करना, बैंक से कर्ज लेकर हड़पना — ये सब उनकी बड़ी नाक के स्तर के काम होते हैं।
मेरे एक दूर के रिश्तेदार हैं, जो बड़े रईस खानदान से हैं। उनकी शहर में बड़ी नाक थी, दूर-दूर तक उनकी नाक की चर्चा होती थी। हमने भी अपने परिवार में दादी से उनकी नाक की चर्चा सुनी थी। लेकिन वक्त के साथ उनकी नाक के चर्चे भी उलटे पड़ गए। लड़के निकम्मे निकले, धंधा चौपट हो गया। बेटी की शादी थी...। अब ठहरे पुराने रईसी खानदान के, रईसी चली गई, लेकिन नाक चूंकि अभी भी बड़ी रखी हुई थी। रस्सी जल चुकी थी, लेकिन बल जाने का नाम नहीं ले रहा था। तो शादी में खर्चा शानोशौकत के अंदाज से, वही पुराने रईसी समय जैसा करना चाहते थे। अब दौलत कहां से आए! हमने काफी समझाया, लेकिन वे नहीं माने। नाक बचाने के चक्कर में उन्होंने पूरे शहर के चक्कर लगा दिए। समाज उनकी ऊंची नाक से अब इंप्रेस नहीं हुआ।
लेकिन अंत में, जब बेटी किसी विजातीय के साथ भाग गई, तब जाकर उनकी सांस में सांस आई। नाक बचाने के चक्कर में जो खर्चा होता, वह बच गया। लेकिन उन्होंने एक काम बड़े अच्छे से किया—दोनों को बुलाकर एक औपचारिक सा रिसेप्शन दे दिया और इस नए क्रांतिकारी फैसले से शहर में फिर से अपनी नाक की ऊंचाई को चीन की दीवार की तरह अभेद्य बनाए रखा।
अब शादी में फूफा को ही देख लो। इनकी नाक भी कोई कम लंबी नहीं होती। यह शादी में एक कोने में फेरों के लिए तैयार हो रहे दूल्हे से लेकर दूसरे कोने में हलवाई की कढ़ाई तक फैली रहती है। शादी का ऐसा कौन सा कार्य होगा जिसमें इन फूफाजी की नाक आड़े नहीं आती हो? और जब कोई इनकी बात नहीं सुनता, तो जो इनकी नाक अपनी भौंहों के साथ मिलकर सिकुड़ती है ना, उस समय इनके नथुने किसी सांड के अक्रोश के समय बने मुखारविंद से कम नहीं लगते। अब तो इन्हें शादी में रोके रखना भी साले-भतीजे सभी के लिए नाक का सवाल बन जाता है। और शादी की रस्म 'घुड़चढ़ाई' में एक और रस्म 'नाक अड़ाई' की जुड़ जाती है। बेचारी बुआ बड़ी मुश्किल से अपने रूमाल से फूफा के फूले हुए नथुनों को पिचकाती है, तब जाकर नाक के सवाल का कुछ जवाब बन पाता है।
आजकल नौकरी करना भी आसान नहीं है। गए वो जमाने जब नौकरी का मतलब नाक की सीध में ऑफिस जाना, काम में अपनी नाक रगड़ना, और छुट्टी होने पर घर आकर बीवी की नोक-झोंक से अपनी नाक बचाए रखना होता था। आजकल तो कर्मचारी को अपने बॉस का "नाक का बाल" होना बहुत जरूरी है। बॉस का नाक का बाल बनने की ऐसी होड़ मचती है कि बेचारे बॉस की नाक बालों से हाउसफुल हो जाती है और बॉस को सांस लेना मुश्किल हो जाता है। फिर भी कर्मचारी बेचारा उन बालों के गुच्छे में अपना एक बाल भी फंसाने की जगह के लिए बॉस के तलवे के नीचे नाक रगड़ता रहता है।
वैसे, नाक रगड़ने से नाक प्रतिक्रिया स्वरूप सॉफ्ट की जगह हार्ड हो जाती है, और इतनी हार्ड कि अब यह नाक, जो पहले बात-बात पर कट जाती थी, अब नहीं कटती। जहाँ पहले नाक शादी में काजू कतली मेहमानों के लिए कम पड़ने पर कट जाती थी, अब घर से बेटी के भाग जाने और किसी विजातीय लड़के से कोर्ट मैरिज करने पर भी यथावत बनी रहती है।
कुछ नाक पूरे शहर की नाक होती हैं, और पूरा शहर इनकी हिफाजत में लगा रहता है। ये ज्यादातर नेता लोग होते हैं, जिनकी नाक का डंका चुनाव के समय बजता है। सभी शहर के आंदोलनजीवी, मुफ्तखोरजीवी, लंगरजीवी, जीमन में माल उड़ाने वाले, और फ्री की दारू से उदरपूर्ति करने वाले लोग इनकी नाक को उठाए, जुगाड़ के ढोल-नगाड़ों के साथ पूरे शहर में डंका बजाते हैं। जैसे ही नेताजी के टिकट की घोषणा होती है, ये सब नेताजी के चरणों में अपनी नाक रगड़कर सम्मान प्रकट करते हैं। और अगर दुर्भाग्यवश टिकट नहीं मिला, तो समझो उस दिन शहर में मातम छा जाता है।
शहरवासी अपनी-अपनी नाक से सूंघ लेते हैं कि कहाँ गड़बड़ी हुई, किसने पत्ता काटा, और षड्यंत्र की बू पकड़कर अपने-अपने तरीके से सांत्वना स्वरूप नेता जी की नाक से ध्यान हटाकर उनके कान भरने लगते हैं।
कई प्राणी ऐसे होते हैं, जिनकी नाक की लंबाई भगवान ने असाधारण तरीके से बनाई होती है। साथ ही, इनकी नाक को भगवान ने विशेष कुत्ते जैसी सूँघने की क्षमता दी है। किसके घर में स्पेशल खाना बन रहा है, कहाँ दारू पार्टी हो रही है, इसका पता इन्हें नींद में भी लग जाता है। ये आयोजनकर्ता के घर के आसपास अपनी लगभग विलुप्त हो चुकी पूंछ हिलाते हुए, नाक के छिद्र चौड़े कर सूंघते हुए मंडराते रहते हैं। अगर इन्हें निमंत्रण नहीं मिलता, तो ये आयोजनकर्ता की नाक को सरेआम कटवाने का प्रयत्न करते हैं।
आजकल संस्थाओं में भी नाक की बड़ी घुसपैठ हो रही है। कई लोग अपनी कुटिल चालों और चालित ढंग से संस्था के कार्यों में नाक अड़ाने का काम करते हैं। मंच, माला और माइक उन्हें यथावत मिलता रहे, यह उनके लिए नाक का सवाल होता है। ऐसे लोग किसी भी ऐरे-गैरे-नत्थू-खेरे को संस्था की नाक घोषित कर सकते हैं। अपने स्वार्थ का उल्लू सीधा करने के लिए, कब किसी को नाक से गिराकर संस्था के तलुवे में रौंद देते हैं, पता ही नहीं चलता।
संस्था के बजट बिगाड़ने में भी ये लोग पीछे नहीं रहते और इसे संस्था की नाक बचाने के नाम पर सही ठहराते हैं। इनका काम संस्था के हर कार्य में नाक फँसाए रखना होता है, जैसे खाने के मेनू में पकोड़ी और पापड़ी घुसेड़ना, फूल मालाओं में गेंदे के फूल की जगह गुलाब के फूल लगवाना, बैनर की साइज़ बढ़वाना, मंच से कुर्सियों की संख्या घटाना-बढ़ाना, आदि।
संस्था की नाक के सवाल पर इतने सवाल खड़े किए जाते हैं कि बेचारा संयोजक उत्तरहीन और दीनहीन नज़र आने लगता है।
खैर, इस नाक पुराण का जितना भी वर्णन करें, वह कम है। अभी इसे विराम देते हैं, फिर कभी और चर्चा करेंगे।
चलते-चलते एक शेर सुनते जाइए:
"हर सवाल तेरी नाक पर है, झूठी शान को यूँ सिरा न दे,
तू यूँ अकड़ के हवा न दे, कहीं झूठ तेरा गिरा न दे।"
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विविध
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"दलित: वैचारिकी और सृजन" पर प्रलेस की संगोष्ठी
दलित साहित्यकार समाज के वंचित और दबे कुचले वर्गों के उत्पीड़न को प्रकाशमान करे - रत्न कुमार सांभरिया
12 जनवरी को राजस्थान प्रगतिशील लेखक संघ और डॉ अंबेडकर मेमोरियल वेलफेयर सोसायटी जयपुर के संयुक्त तत्वावधान में "दलित: वैचारिकी और सृजन" पर
दो सत्रों में कार्यक्रम आयोजित हुआ।
प्रथम सत्र में 'दलित: वैचारिकी और सृजन' पर 'व्याख्यान' में राजस्थान साहित्य अकादमी के सर्वोच्च मीरां पुरस्कार प्राप्त एवं सांप जैसे महत्वपूर्ण उपन्यास के लेखक रत्नकुमार सांभरिया ने मुख्य वक्ता के रूप मे अपने उद्बोधन में कहा कि -"दलित, आदिवासी, स्त्री और हाशिए का समाज को मुख्यधारा में लाने की दरकार है। हम समाज के वंचित और दबे कुचले वर्गों के उत्पीड़न को अपनी क़लम से उनमें चेतना जाग्रत करें। उन्होंने कहा कि दलितों की पिछली पीढ़ी ने शोषण झेला, वर्तमान पीढ़ी ने संघर्ष किया और नई पीढ़ी स्थापना चाहती है।"
दलित चिंतक और वरिष्ठ लेखक ताराराम गौतम ने कहा कि -"दलित साहित्य बुद्ध और डॉ अम्बेडकर की विचारधारा से जुड़कर अपनी उपस्थिति दर्ज करा रहा है।"
कोटा से आई प्रोफेसर डॉ अनीता वर्मा ने कहा कि -" साहित्य का कार्य दलित विमर्श की मशाल बनना है।"
राजस्थान विश्वविद्यालय की एसिस्टेंट प्रोफेसर डॉ. वर्षा वर्मा ने कहा कि -"अस्मिता विमर्श का लक्ष्य और ध्येय समतामूलक समाज का निर्माण है।"
सत्र की अध्यक्षता करते हुए प्रलेस के कार्यकारी अध्यक्ष फारूक आफरीदी ने कहा कि- "सही मायने में साहित्य से ही समाज में परिवर्तन लाया जा सकता है।"
डॉ. अंबेडकर वेलफेयर सोसायटी के अध्यक्ष व पूर्व आईपीएस जसवंत सम्पतराम ने भी संबोधित किया ।
प्रथम सत्र की संयोजक प्रलेस की महासचिव रजनी मोरवाल ने संचालन किया।
दूसरे सत्र में 'काव्य पाठ' का आयोजन हुआ।बीकानेर के दलित युवा कवि श्याम निर्मोही ने 'संताप का सफ़र', 'कब आएगा वो सवेरा', कविताऍं सुनाकर श्रोताओं को भावविभोर कर दिया।
भदोही, उत्तर प्रदेश से आए दलित युवा कवि बच्चालाल 'उन्मेष' ने अपनी चर्चित कविता-"कौन जात हो भाई" सुनाकर सोचने पर मज़बूर कर दिया। जयपुर से राजकुमार इंद्रेश, सूरतगढ़ के युवा कवि शिव बोधि, राजेन्द्र सजल अलवर की कवयित्री सरिता भारत, शिवराम मीमरोठ, डॉ. अनीता वर्मा आदि ने दलित चेतना की रचनाऍं प्रस्तुत कीं । दूसरे सत्र की अध्यक्षता करते हुए प्रलेस अध्यक्ष गोविन्द माथुर ने अपने संबोधन में कहा कि -"दलित लेखन में भोगा हुआ यथार्थ और प्रामाणिकताऍं होती हैं। प्रस्तुत कविताऍं इसका साक्षात् परिणाम हैं।"
दूसरे सत्र के संयोजक प्रेम चंद गांधी ने कार्यक्रम का संचालन किया।
धन्यवाद ज्ञापन वरिष्ठ साहित्यकार अजय अनुरागी ने किया।
दोनों सत्रों में वरिष्ठ साहित्यकार हेतु भारद्वाज,हरिराम मीणा, पूनमचंद कंडारा, गुलाब चंद बारासा, मंगल मोरवाल, एच आर परमार, डॉ. अम्बेडकर मेमोरियल वेलफेयर सोसायटी के महासचिव जी.एल.वर्मा, डॉ शशि इंदलिया सहित प्रबुद्धजन व भारी संख्या में युवा शोधार्थी भी उपस्थित रहे।
सादर
(रजनी मोरवाल)
महासचिव, प्रलेस
जयपुर राजस्थान।
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रचनाकारों से निवेदन
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