प्रश्नचिह्न पत्रिका के ब्लॉग संस्करण में आपका स्वागत है।
अनुक्रम ।। मार्च 2025
सम्पादकीय
कविताएँ
चंद्रेश्वर, शहंशाह आलम, शैरिल शर्मा
अनंत आलोक, रक्षित पाण्डेय
कहानियाँ
सुशांत सुप्रिय
सन्तोष खन्ना
आलेख
डॉ. ऋषिका वर्मा
राजेश कुमार सिन्हा
समीक्षा
भावना शेखर
मधुबाला शुक्ल
विविध
पाठकों की प्रतिक्रिया
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सम्पादकीय
शेष स्त्री का वर्तमान पुरुषार्थ
चौथी कक्षा में जब मैं सुबह सवेरे उठकर ट्यूशन जाया करता था, तो रास्ते में कई घरों की बेटियाँ दरवाज़े पर बासी बर्तन लेकर बैठ जाती थीं। आज भी स्थितियाँ बहुत बेहतर तो नहीं, लेकिन लड़कियाँ बर्तन धोने के बाद स्कूल जाने की तैयारी करने लगी हैं। घर, परिवार या फिर समाज लड़कियों को जन्म देकर सिखाने से लेकर शोषण तक का सदस्यता शुल्क जमा कर देता है। दिन भर काम के बाद स्त्री के हिस्से में बचता है काम। हालाॅंकि हमारा समाज घर के काम को घर में बैठना मानता है। स्त्री की तलस्पर्शी जटिलताएँ आम हो चुकीं हैं। सच की शृंखला में यह भी एक सच है कि स्त्री के पैदा होने से लेकर शिक्षा पाने तक की यात्रा में लैंगिंक असमानता की स्थितियों से जूझते हुए ही ज़्यादातर लड़कियों की शिक्षा सिमट जाती है। गाँवों में तो लड़कियाँ कॉलेज शिक्षा पूरी करते ही घर बिठा दी जाती है। उच्च शिक्षा का मुँह देख पाना हर लड़की के लिए संभव नहीं हो पाता। यह एक बड़ी हक़ीक़त है, जिसे नकारा नहीं जा सकता। ग्रामीण परिवेश, क़स्बाई जीवन तक बमुश्किल हासिल शिक्षा आगे शहरों के कॉलेज तक नहीं पहुंच पाती, यह मैंने बहुत देखा है। इस तरफ अधिक ध्यान देने की जरूरत है। बिना शिक्षा हासिल किए स्त्री चेतना के सदियों से बंद दरवाजों पर भला कैसे दस्तक दी जा सकती है? सजग, सचेत और शिक्षित स्त्री ही अपने निजी स्पेस, निजता, आजादी व आत्मनिर्णय जैसे मुद्दों पर अपना स्टैंड लेने में सक्षम होगी। कोई भी विमर्श जब तक जमीनी सच्चाइयों को नहीं छुएगा, वह सिकुड़ कर रह जाएगा।एक समय के बाद उसकी साँसें समाप्त हो जाएँगी।
मुझे ऐसा लगता है कि पिछले कई दशकों से स्त्री विमर्श ने स्त्री जीवन की मुँदी, दबी और ढकी जीवन की समस्त परतों को साहसिक तरीके से उघाड़ने में अहम भूमिका निभाई है। स्त्री को स्त्री की दृष्टि से देखना, समझना और विचार करना स्त्री विमर्श की सबसे बड़ी जरूरत और जिम्मेदारी है। इसके जरिए पितृसत्ता की निरंकुशता का विखंडन होता है। स्त्री विमर्श द्वारा पहली बार स्त्री को मनुष्य समझने की दिशा में ठोस काम हुआ है। पुरुष-वर्चस्वी समाज व्यवस्था में स्त्री दमन, उत्पीड़न, अन्याय एवं गैरबराबरी के मुद्दों को प्रमुखता से उभारा गया है। दरअसल पितृसत्ता के दमन से मुक्ति का सवाल पुरुष विरोध नहीं है। यह कट्टर एकाधिकारवादी पितृसत्तावादी व्यवस्था से मुक्त होना है। यह भी देखा जा सकता है कि विश्वविद्यालयों में पहली बार स्त्री-अध्ययनन विषयक पाठ्यक्रम तथा वूमेंस स्टडी सेंटर आदि बहुआयामी गतिविधियां शुरू हुई हैं। दिल्ली विश्वविद्यालय जैसे विश्वविद्यालयों में लड़कियों के लिए अलग से एक सोसाइटी की स्थापना की गई है जो सिर्फ उनकी वकालत करती है। स्त्री विमर्श का निहितार्थ गैरबराबरी, दमन, शोषण तथा वर्चस्व से मुक्त होना है। स्त्री-पुरुष को समानाधिकार, सम्मान, न्याय, स्वतंत्रता और सर्वत्र बराबरी की लड़ाई में विषमता के सभी टूल्स का अंत होना ही स्त्री विमर्श का अभिप्रेत है। समकालीन कथा साहित्य, कविताएं, आत्मकथाओं तथा कथेतर गद्य में पहली बार स्त्री मुक्ति के सवाल तीक्ष्णता से उभरकर आए हैं। स्त्री के बहुआयामी जीवन की परतों को खुरेचने का साहसिक लेखन हुआ है, यह कोई छोटी बात नहीं। यह लेखन रेखांकित करता है कि स्त्री को महज मादा न समझकर उसे पुरुष के समकक्ष व्यक्ति का दर्जा दिया जाए।
कुछ नारीवादी लेखिकाओं का मानना है कि समाज-संरचना में पितृसत्ता का वर्चस्व शोषणकारी, दमनकारी तथा अमानवीय रूप लेता रहा है। इसमें स्त्री की अस्मिता, निजता, आजादी एवं वैयक्तिकता के लिए कोई स्पेस नहीं छोड़ा गया है। बेशक पितृसत्ता की निर्मितियों में धार्मिक कट्टरता से जुड़े रीतिरिवाज, परंपराएं, मिथकीय आख्यानों से जुड़ी गाथाएं हैं। इन सबकी स्त्री को दोयम दर्जे का बनाने में सबसे बड़ी भूमिका है। धार्मिक रूढ़ियों, गढ़े हुए मिथकों एवं अतार्किक कथाओं की परंपराओं की आड़ लेकर ऐसे पर्व, उपवास एवं तमाम कर्मकांड तय कर दिए गए हैं, जिनके जरिए पुरुष की श्रेष्ठता और स्त्री की हीन होती स्थिति निरूपित की जाती है। ऐसे दर्जनों व्रत-उपवासों और परंपरागत मिथकीय कथाओं को मीडिया में भी खूब भुनाया जाने लगा है। इन सबके मूल में पुरुष की दीर्घायु की कामना के जरिए उसी को श्रेष्ठ ठहराए जाने की युक्तियां होती हैं। यौन शुचिता, या पातिव्रत्य, एकनिष्ठता -जैसे परंपरागत मूल्यों की जड़ में पितृसत्ता हो। इसने धर्म की आड़ लेकर भय को इस ढंग से स्त्री पर थोप दिया है कि आतंकित होकर वह इन रूढ़ियों का निर्वहन करने को बाध्य हो। पितृसत्ता के ऐसे प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष उपकरण इन दिनों खूब प्रचलन में हैं। ये स्त्री चेतना को कुंद करते हैं या उसे दोयम दर्जे का साबित करते हैं। इससे स्त्री चेतना में लोकतंत्र की बयार नहीं आ पाती।
मेरी माँ कहती हैं औरत जात...
सच बताएं तो स्त्री स्वयं में एक जाति है, प्रजाति है और एक समुदाय का रुप है। संसार भर की स्त्रियों की एक ही जाति है जिसका नाम है- स्त्री। किसी भी जाति, वर्ग या समुदाय की स्त्री हो, उसकी समस्या के मूल में है- असमानता, उसकी मेधा- मेहनत की बेकद्री, परिवार और समाज में उसकी सशक्त भूमिका के प्रति नकार या अस्वीकृति और उसे घर से लेकर बाहर तक की दुनिया में उचित स्थान न मिल पाना। ये समस्याएं सार्वभौमिक हैं। मैं दहेज प्रथा को मजबूत बनाने में जाति की भूमिका को महत्वपूर्ण नहीं मानता, बल्कि दहेज प्रथा भी पितृसत्ता की ही देन है। इसके जरिए स्त्री को वस्तु में समाप्त करने की अलक्षित साजिशें रची गई होंगी, ऐसा अनुमान है। स्त्री को वस्तु के रूप में कम करके दहेज जैसी कुप्रथा स्थापित करने या उसे स्वीकृति देने में संभवत: पितृसत्ता की ही कुटिल रणनीति है।
आज महिलाओं की मौजूदगी विधानसभा से संसद तक है, हालांकि महिला आरक्षण विधेयक पन्द्रह सालों से अटका हुआ है। इसका पुरुष प्रतिनिधि विरोध करते हैं। आज भी दहेज की समस्या है, परिवार द्वारा उच्च शिक्षा पर रोक लगा दी जाती है और सामाजिक हिस्सेदारी, आर्थिक आत्मनिर्भरता जैसी समस्याएं मौजूद हैं। ऐसे बहुत सारे मुद्दे सरकार, समाज और व्यवस्था पर प्रश्नचिह्न खड़ा करते हैं।
आपका
आलोक रंजन
alokranjanoffice@gmail.com
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कविताएँ
चंद्रेश्वर
सम्पर्क : 'सुयश', 631/58, ज्ञान विहार कालोनी, कमता (फ़ैज़ाबाद रोड) -226028 लखनऊ
ईमेल : cpandey227@gmail.com
घृणा चुपचाप
प्रेम के घर में सोती रहती
चादर तानकर
घृणा चुपचाप
किसी अवसर की टोह में
हंसी के भीतर
छुपी होती रूलाई
किसी ग़म के इंतज़ार में
हर्ष में विषाद होता शामिल
ज़िन्दगी के संग-संग
समानांतर उसके
करती रहती सफ़र
मौत अविराम।
कविता का सत्य
इधर पिछले कुछ महीनों से खरीदते हुए
बाज़ार से आशीर्वाद आटा का पाकेट
सोचा मैंने कितना बदल गया है वक़्त
और चला गया मैं बचपन की स्मृतियों में
जब मां देती थी धुला हुआ
धूप में सुखाया गया गेहूं
मोटरी में बांधकर
आटा चक्की में पीसाने के लिए
मैं शहर में इस पुरानी स्मृति के जगते ही
थोड़ा भावुक हुआ
पर जब इस हफ़्ते जाना पड़ा अचानक
गेहूं पीसाने आटा चक्की में
पत्नी के आग्रह पर तो देखा कि
वहां कत़ार में खड़े हैं कुछ लोग
अपने-अपने थैलों और बोरियों में गेहूं लिए
देख यह दृश्य बदल गया मेरा
अनुभूत सत्य कि सब खाते हैं
खरीद कर ही आटा पाकेट का
कवियों ! अपनी कविताओं में
प्रस्तुत करने के पहले
अपना अनुभूत सत्य
कोशिश करो यह जानने की कि
वह कहीं आंशिक या निजी सत्य तो नहीं
जिसे तुम बरत रहे हो कविता में
सामाजिक सत्य की तरह।
शहंशाह आलम
सम्पर्क : हुसैन कॉलोनी, नोहसा रोड, पूरब वाले पेट्रोल पाइप लेन के नज़दीक
फुलवारीशरीफ़, पटना-801505, बिहार।
ईमेल : shahanshahalam01@gmail.com
कोई कुछ नहीं बोलता
रोशनी को मारा जा रहा है अँधेरे से
पानी को सूखे से मारा जा रहा है
लफ़्ज़ को चुप्पी से मारा जा रहा है
ख़्वाब को डर से मारा जा रहा है
नींद को भूख से मारा जा रहा है
तब भी कोई कुछ नहीं बोलता
अब तक जितना बुरा होता आया है
न रोशनी बोलती है
न पानी बोलता है
न नींद बोलती है
न ख़्वाब बोलता है
अब बस आदमी की थकान बोलती है
मायूसी बोलती है और ज़िल्लत बोलती है
अफ़सोस
जिस आदमी पर
गुज़र रहा है इतना कुछ
वही कुछ नहीं बोलता
अपनी चुप्पी को तोड़कर।
अंतर्विरोध
आश्चर्य आज हत्यारे ने
उसे जाने दिया बग़ैर चाक़ू मारे
जिसकी हत्या करने आया था वह
जो लुटेरा था
जो लूटने वाला था
लूटकर ले गया सामान
वापस रख गया दरवाज़े पर
आश्चर्य एक शहर जिसका नाम
मेरे नाम से मिलता-जुलता था
उसे अब भी बसा रहने दिया था
मेरे नाम पर मेरे तंगदिल राजा ने।
शैरिल शर्मा
सम्पर्क : 1035 शिवाजी नगर महामाया मंदिर के पास, पिलखुवा (245304)
जिला हापुड़,उत्तर प्रदेश
ईमेल : sherilsharma97@gmail.com
बड़ी होती लड़कियां
बड़ी होती लड़कियों के साथ-साथ
बड़ा होता है एक दुख—
सबकुछ न छूटते हुए भी
धीरे-धीरे छूट जाने का दुख।
उनके भीतर आकार लेता है एक शून्य,
जो हर उस चीज़ से भरता जाता है
जो एक दिन छूट जाएगी।
बड़ी होती लड़कियां
सिर्फ समय को पार नहीं करतीं,
वे समय को अपने भीतर जीती हैं—
धीमे, अनसुने घड़ी के स्वर में।
वे बचपन को छोड़ती नहीं,
बल्कि उसे अपने भीतर
गहराई से संजो लेती हैं—
जैसे धरती
बीज को अपने भीतर संभालती है,
एक ऐसे भविष्य के लिए
जो कभी संभव है,
कभी असंभव।
कभी-कभी वे
अपने ही स्वप्नों को
सावधानी से खोलती हैं,
जैसे कोई पुरानी चिट्ठी—
जिसके शब्द धुंधले हो सकते हैं,
पर अर्थ पहले से अधिक उज्ज्वल।
हर दिन वे कुछ नया सीखती हैं,
पर सबसे ज्यादा सीखती हैं
अपने भीतर की चीज़ों को
छिपाकर रखना।
उनकी दुनिया
दो हिस्सों में बंटी होती है—
एक जो वे दिखाती हैं,
और दूसरा जो वे जीती हैं।
उनके भीतर
हर नई समझ
पुराने भोलेपन को काटकर उगती है।
वे हर कदम
सहजता से नहीं बढ़ातीं,
बल्कि उस गहराई से बढ़ाती हैं,
जहां इतिहास और भविष्य
मिलकर वर्तमान बनाते हैं।
बड़ी होती लड़कियां
वृक्षों की तरह होती हैं—
अपनी जड़ों को गहराई में बचाए रखतीं,
और शाखाओं को आकाश तक फैलातीं—
हर छाया, हर फल
उनकी अपनी कहानी
चुपचाप कहता है।
वे अपने भीतर एक सन्नाटा पालती हैं—
ऐसा सन्नाटा,
जो किसी नदी के किनारे
अचानक ठहर जाने पर
सुनाई देता है।
प्रतीक्षा की परिधि
प्रतीक्षा
शायद एक वृत्त है
जो हर सुबह मेरे चारों ओर खिंचता है,
कभी इतना बड़ा
कि समूचा आकाश समा जाए,
कभी इतना छोटा
कि सांस तक अटक जाए।
यह एक धीमी आवाज है
जो सुनाई देती है
जब रात के सबसे गहरे सन्नाटे में
घड़ी की सुइयां
अपने पांव घसीटती हैं।
यह आवाज
शायद समय का गूढ़ सवाल है,
या शायद
मेरा ही उत्तर।
प्रतीक्षा
एक पेड़ है
जो हर मौसम में
अपनी छाल उतारता है।
वहां कोई फल नहीं,
सिर्फ पत्तियों के झरने की गंध है,
और गंध के भीतर
एक थरथराती हुई उम्मीद।
कभी-कभी प्रतीक्षा
एक पुरानी चिट्ठी की तरह लगती है,
जिसे बार-बार पढ़ा जा चुका हो
और हर बार
उसे थोड़ा और खाली पाया गया हो।
लेकिन फिर भी
प्रतीक्षा रुकी नहीं रहती—
वह चलती रहती है
पगडंडियों के किनारे,
पत्थरों की दरारों में,
उस धूप में
जो कभी नहीं छूती जमीन।
प्रतीक्षा
शायद वही है
जो हमें हर रोज रचती है
जैसे नदी अपने किनारों को,
जैसे आकाश अपने बादलों को।
हम जानते हैं,
उसका छोर कहीं नहीं है,
लेकिन फिर भी चलते हैं
उस तक पहुंचने के लिए।
अनंत आलोक
सम्पर्क : साहित्यालोक बायरी डाकघर एवं तहसील ददाहू जिला सिरमौर हिमाचल प्रदेश 173022
ईमेल : anantalok1@gmail.com
अनंत आलोक के दोहे
बिल्ली रस्ता काटती, होती है बदनाम |
मुझको अपना काम है, उसको अपना काम l1l
हिंदी की चौपाल पर, बैठे चार चिराग |
तय था देंगे रौशनी, लगा रहे हैं आग |2|
लेखक तो लेखक हुआ, बेशक झोलाछाप |
पुस्तक तेरी जेब में, जितनी मर्जी छाप |3|
सोते उठते फोन से, होती आँखें चार |
देखो कैसे आ गया, बिस्तर में बाजार |4|
खाली खोखे रह गये,फोकट सारे व्यर्थ |
अर्थ चुराकर ले गया, शब्दों के सब अर्थ |5|
आया है बाजार में, नुस्खा ये नायाब |
रख दो नंगी जांघ पर, बिकने लगे किताब |6|
किस किस से झगड़ा करें, सबके सब हैं चोर |
कोई बेईमान है, कोई रिश्वतखोर |7|
यहाँ वहाँ देखा मिला, बस नंगोँ का देश l
ढकी देह का अब यहाँ, वर्जित हुआ प्रवेश l8l
आफत में राहत मिली, मिलकर हुई डकार |
आधी नेता खा गये, आधी ठेकेदार |9|
कलयुग में -बैल की, पड़ी पेट पर मार l
हीरा मोती घूमते, सड़कों पर बेकार l10l
रक्षित पाण्डेय
सम्पर्क : सुवंसा , नौडे़रा , प्रतापगढ़ ( उ. प्र. ) 230306
ईमेल : rakshitpandey357@gmail.com
किसान का सपना
गत चार घंटों की
निर्बाध परिश्रम के बाद
आई मीठी झपकी से
खेतों के बीच ; मेड़ पर
सो गया है किसान,
नींद के झरोखे से
देख रहा वो दुनिया
जिसे चला रहे किसान।
संसद की कुर्सियों पर बैठे हैं किसान
कोर्ट में फैसले दे रहे हैं किसान
मठों के अधीश हो गए हैं किसान
सड़कों का टेंडर ले रहे हैं किसान
कंपनियों का शेयर खरीद रहे किसान
थिएटर के परदों पर थिरक रहे किसान
चैनलों पर समाचार पढ़ रहे किसान
विदेशों में वेकेशन मना रहे किसान
किसान , किसान और बस किसान
समूचा भारत देश हो गया किसान।
पुरवा के एक झोंके से
बंद हो गए झरोखे -
खुल गईं हैं आंखें
उठ गया है किसान।
धूप हो गई चटक ,
सुबह की भूख को
सुरती से बहलाकर
रखता है चुनौटी
कमीज की बाईं जेब में ,
दाहिनी जेब सिलना है -
हफ्तों से भूलता रहा ये।
आधे बचे खेतों से
अभी निकालना है घास ;
तो जल्दी से उठ कर के
अपनी घिसी हुई चप्पलें
जो अभी तक तकिया थीं
उठा कर हाथों में -
खोज रहा अपने पांव।
ट्रेन और बच्चे
चलती हुई ट्रेन की
खिड़की से दिखे अचानक
पांच - छः छोटे छोटे
नंगे मगर उत्सुकता से ढके
हंसते - उछलते , हाथ हिलाते
खेतों में खड़े " बच्चे "
जो देख रहे ट्रेन को ,
साथ में उनके हैं
भैंसों का एक झुंड
कुछ चरते , कुछ सुस्ताते।
बच्चों के हिलते हाथों से
हुआ अचानक एक जादू
सारे बच्चे उछल कर
बैठ गए ट्रेन पर
और मुड़ गई पटरियां
उनके गावों की ओर
मैंने अपने हाथ हिलाकर
बच्चों से किया अलविदा
और जारी रखा अपना सफर
भैंस की पीठ पर बैठ कर।।
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कहानियाँ
सुशांत सुप्रिय
सम्पर्क : A-5001, गौड़ ग्रीन सिटी, वैभव खंड, इंदिरापुरम, ग़ाज़ियाबाद - 201014 ( उ. प्र. )
ईमेल : sushant1968@gmail.com
दाग़
रात से ठीक पहले ढलती हुई शाम में एक समय ऐसा आता है जब आकाश कुछ कहना चाहता है , धरती कुछ सुनना चाहती है । जब दिन की अंतिम रोशनी रात के पहले अँधेरे से मिलती है । यह कुछ-कुछ वैसा ही समय था । कनाट प्लेस में दुकानों की बत्तियाँ जगमगाने लगी थीं । दिन बड़ा गरम रहा था । शाम में ठंडी बीयर पीने के इरादे से मैं ' वोल्गा ' रेस्त्रां में पहुँचा । कोनेवाली टेबल पर एक अधेड़ उम्र के सरदारजी अकेले बीयर का मज़ा ले रहे थे । न जाने क्यों मेरे क़दम अपने-आप ही उनकी ओर मुड़ गए ।
" क्या मैं यहाँ बैठ सकता हूँ ? " मैंने ख़ुद को सरदारजी से कहते सुना ।
" बैठो बादशाहो ! बीयर-शीयर लो । " सरदारजी दरियादिली से बोले ।
" शुक्रिया जी ।" मैंने बैठते हुए कहा ।
बातचीत के दौरान पता चला कि क़रोल बाग़ में सरदारजी का हौज़री का बिज़नेस था । जनकपुरी में कोठी थी । वे शादी-शुदा थे । उनके बच्चे थे । उनके पास वाहेगुरु का दिया सब कुछ था । पर इतना सब होते हुए भी मुझे उनके चेहरे पर एक खोएपन का भाव दिखा । जैसे उनके जीवन में कहीं किसी चीज़ की कमी हो । शायद उन्हें किसी बात की चिंता थी । या कोई और चीज़ थी जो उन्हें भीतर ही भीतर खाए जा रही थी ।
बातचीत के दौरान ही सरदारजी ने तीन-चार बार मुझ से पूछ लिया , " मेरे
कपड़ों पर कोई दाग़-वाग तो नहीं लगा जी ? "
मुझे यह बात कुछ अजीब लगी । उनके कपड़े बिल्कुल साफ़-सुथरे थे । मैंने उन्हें आश्वस्त किया कि उनके कपड़ों पर कहीं कोई दाग़ नहीं था । हालाँकि उनके दाएँ हाथ की कलाई के ऊपर कटने का एक लम्बा निशान था । जैसे वहाँ कोई धारदार चाक़ू या छुरा लगा हो ।
फिर मैं सरदारजी को अपने बारे में बताने लगा ।
अचानक उन्होंने फिर पूछा -- " मेरे कपड़ों पर कोई दाग़-वाग तो नहीं लगा
जी ? " उनके स्वर में उत्तेजना थी । जैसे उनके भीतर कहीं काँच-सा कुछ चटक गया हो जिसकी नुकीली किरचें उन्हें चुभ रही हों ।
मैंने हैरान हो कर कहा -- " सरदारजी, आप निश्चिंत रहो । आपके कपड़े बिल्कुल साफ़-सुथरे हैं । कहीं कोई दाग़ नहीं लगा । हालाँकि मैं यह ज़रूर जानना चाहूँगा कि आपके दाएँ हाथ की कलाई के ऊपर यह लम्बा-सा दाग़ कैसा है ? "
यह सुनकर सरदारजी का चेहरा अचानक पीले पत्ते-सा ज़र्द हो गया । जैसे मैंने उनकी किसी दुखती रग पर हाथ रख दिया हो ।
कुछ देर हम दोनों चुपचाप बैठे अपनी-अपनी बीयर पीते रहे । मुझे लगा जैसे मैंने उनसे उनके चोट के दाग़ के बारे में पूछ कर उनका कोई पुराना ज़ख़्म फिर से हरा कर दिया हो । उनकी चुप्पी की वजह से मुझे अपनी ग़लती का अहसास और भी शिद्दत से हो रहा था । कई बार आप अनजाने में ही किसी के व्यक्तिगत जीवन में झाँक कर देखने की भूल कर बैठते हैं हालाँकि इसके जड़ में केवल उत्सुकता ही होती है । पर भूल से आप किसी के जीवन के उस दरवाज़े पर दस्तक दे देते हैं जो बरसों से बंद पड़ा होता है । जिसके पीछे कई राज़ दफ़्न होते हैं । जिसका एक गोपनीय इतिहास होता है ।
" मैंने आज तक इस ज़ख़्म के दाग़ की कहानी किसी को नहीं बताई । अपने बीवी-बच्चों को भी नहीं । पर न जाने क्यों आज आप को सब कुछ बताने का दिल कर रहा है । " सरदारजी फिर से संयत हो गए थे । उन्होंने आगे कहना शुरू किया --
" मेरा नाम जसबीर है । बात तब की है जब पंजाब में ख़ालिस्तान का मूवमेंट ज़ोरों पर था । हालाँकि सरकार ने आॅपरेशन ब्लू-स्टार में बहुत से मिलिटैंटों को मार दिया था पर ख़ालिस्तान का आंदोलन जारी था । हमें लगता था , हमारे साथ भेदभाव हो रहा था । पंजाब के बाहर लोग हमें देख कर ताने मारते थे -- " सरदारजी , ख़ालिस्तान कब ले रहे हो ! "
" मैं उन दिनों खालसा काॅलेज , अमृतसर में पढ़ता था । हम में से कुछ सिख युवकों के लिए ख़ालिस्तान का सपना दिल्ली दरबार की ज़्यादतियों के विरुद्ध हमारे विद्रोह का प्रतीक बन गया । हम महाराज़ा रणजीत सिंह के सिख राज्य को फिर से साकार करने के लिए काम करने लगे । मैं सिख स्टूडेंट्स फ़ेडरेशन का सरगर्म कार्यकर्ता था । पुलिस के अत्याचार देख कर मेरा ख़ून खौल उठता । 1985 में मैं मिलिटैंट मूवमेंट में शामिल हो गया । हथियार हमें पड़ोसी देश से मिल जाते थे । उसका अपना एजेंडा था । अत्याचारियों से बदला लेना और ख़ालिस्तान की राह में आ रही रुकावटों को दूर करना ही हमारा मिशन था ।मैं अपने काम में माहिर निकला । दो-तीन सालों के भीतर ही मैं अपनी फ़ोर्स का कमांडर बन गया । पुलिस ने मुझे ' ए ' कैटेगरी का आतंकवादी घोषित कर दिया ।मेरे सिर पर बीस लाख का इनाम रख दिया गया ।
" इन्हीं दिनों हमारी फ़ोर्स में एक नया लड़का सुरिंदर शामिल हुआ ।उसने मुझे बताया कि इंदिरा गाँधी की हत्या के बाद नवंबर-दिसंबर , 1984 में दिल्ली में हुए सिख-विरोधी दंगों में उसका पूरा परिवार मारा गया था । उसके अनुसार दंगाइयों ने उसके बूढ़े माँ-बाप और भाई-बहनों के केश कतल करने के बाद उनके गले में टायर डाल कर उन्हें ज़िंदा जला दिया था । सुरिंदर ने कहा कि अब वह केवल बदला लेने के लिए जीवित था । उसने बताया कि वह सिखों के दुश्मनों को मिट्टी में मिला देना चाहता था । उसकी बातें सुन कर मुझे लगा कि हमारी फ़ोर्स को ऐसे ही नौजवान की ज़रूरत थी । मुझे सुरिंदर हमारे मिशन के लिए हर लिहाज़ से सही लगा । मैंने उसे अपनी फ़ोर्स में शामिल कर लिया ।
" कुछ दिन बाद एक रात हमने मिशन के एक काम पर जाने का फ़ैसला किया । मैं , सुरिंदर और हमारे कुछ और लड़के मोटर साइकिलों पर सवार हो कर रात बारह बजे अमृतसर के सुल्तानविंड इलाक़े से गुज़र रहे थे । हमारे पास ए. के. 47 राइफ़लें थीं । हम सब ने शालें ओढ़ी हुई थीं । सुरिंदर मोटर साइकिल चला रहा था और मैं उसके पीछे बैठा था । वह रहस्य और रोमांच से काँपती हुई रात थी ।
" अचानक बीस-पच्चीस मीटर आगे हमें पुलिस का नाका दिखाई दिया । पुलिस की दो-तीन जिप्सी गाड़ियाँ और दस-पंद्रह जवान वहाँ खड़े थे । हम सब ने अपनी-अपनी मोटर साइकिलें रोक लीं । पुलिस वालों ने देखते ही हमें ललकारा । मैं वहाँ एन्काउंटर नहीं चाहता था । हम आज रात एक ख़ास मिशन के लिए निकले थे । मेरे इशारे पर बाक़ी लड़के अपनी-अपनी मोटर साइकिलें मोड़ कर पास की गलियों में निकल भागे । पर सुरिंदर हथियारबंद पुलिसवालों को देखते ही डर के मारे आँधी में हिल रहे पत्ते-सा काँपने लगा । मेरे लाख आवाज़ देने के बावजूद वह मोटर साइकिल पकड़े अपनी जगह पर जड़-सा हो गया । पुलिस वाले पास आते जा रहे थे । मजबूरन मैंने अपनी शाल हटाई और पुलिस वालों को डराने के लिए अपनी ए.के. 47 से हवाई फ़ायरिंग की । पुलिस वाले रुक गए । इस मौक़े का फ़ायदा उठा कर मैं सुरिंदर को घसीटते हुए पास की गली की ओर ले भागा । हमें भागता हुआ देख कर पुलिस वालों ने हम पर फ़ायरिंग शुरू कर दी । एक गोली सुरिंदर की जाँघ में आ लगी । तब तक मेरे कुछ साथी हमें बचाने के लिए वापस लौट आए थे । गोली-बारी के बीच घायल सुरिंदर को सहारा दिए मैं और मेरे बाक़ी साथी मोटर-साइकिलों पर बैठ कर किसी तरह बचते-बचाते वहाँ से निकल भागे ।
" अपने छिपने के ठिकाने पर पहुँच कर मैंने सुरिंदर से पूछा, " तू भागा क्यों नहीं
था ? " पर उसका चेहरा डर के मारे राख के रंग का हो गया था । उसके मुँह से आवाज़ नहीं निकल रही थी । हमने उसकी जाँघ में लगी गोली निकाल कर उसकी मरहम-पट्टी की । अब वह अगले पंद्रह-बीस दिनों तक वैसे भी किसी मिशन पर जाने के लायक नहीं था । पर मेरा दिल उस घटना से खट्टा हो गया था । उस दिन सुरिंदर को पुलिसवालों के सामने डर से थर-थर काँपता देख कर मैं ख़ुद से शर्मिंदा हुआ कि यह मैंने किस कायर को अपनी फ़ोर्स में शामिल कर लिया था ।
" पर मिशन के काम तो नहीं रुक सकते थे । ख़ालिस्तान बनाने का सपना लिए हम दिन-रात अपने काम पर जुटे रहते । कभी सिख युवकों पर अत्याचार करने वाले किसी व्यक्ति को रास्ते से हटाना होता , कभी अपने किसी साथी को पुलिस की हिरासत से छुड़ाना होता । मैं और मेरी फ़ोर्स के बाक़ी लड़के सुरिंदर को अपने ठिकाने पर छोड़कर हर दूसरी-तीसरी रात में किसी-न-किसी मिशन पर निकल जाते । सुबह चार-पाँच बजे तक हम अपना काम करके वापस लौट आते । कभी-कभी दिन में भी मिशन के काम से जाना पड़ता । हालाँकि सुरिंदर का हमारी फ़ोर्स में आना हमारे लिए बदक़िस्मती जैसा ही था । जब से वह आया था , हमारे बहुत-से साथी पुलिस के साथ हुई मुठभेड़ों में मारे जाने लगे थे । ख़ैर । यही हमारा जीवन था । कभी मिशन के कामयाबी की ख़ुशी । कभी साथियों के बिछुड़ने का ग़म ।
" हमारी देखभाल के कारण सुरिंदर की जाँघ में लगी गोली का ज़ख़्म धीरे-धीरे ठीक होने लगा था । मुझे लगा , मुझे उसे ख़ुद को साबित करने का एक और मौक़ा देना चाहिए । शायद वह इस बार हमारी उम्मीदों पर ख़रा उतर सके । मैं उसके पूरी तरह ठीक हो जाने का इंतज़ार करने लगा ।
" एक रात अपना काम निबटा कर हम सभी वापस अपनी रिहाइश की ओर लौट रहे थे । वह सलेटी आकाश, भीगी हुई हवा और पैरों के नीचे मरे हुए पत्तों का मौसम था । सुबह के चार बज रहे थे । जुगनुओं की पीठ पर तारे चमक रहे थे । मैं सबसे आगे था । घर में चुपके से घुसने पर मैंने पाया कि कि सुरिंदर जगा हुआ था और दूसरे कमरे में किसी से फ़ोन पर बातें कर रहा था । मुझे हैरानी हुई । मैंने उसके पास जा कर छिप कर उसकी बातें सुनीं तो मेरे होश उड़ गए । सुरिंदर पुलिसवालों से बातें कर रहा था और उन्हें हमारे बारे में ख़ुफ़िया जानकारी दे रहा था । उसने हमें पकड़वाने के लिए शायद पहले से ही पुलिसवाले भी बुला रखे थे । मैं सन्न रह गया ।
" हमारे साथ धोखा हुआ था । दुश्मन दोस्त का भेस बना कर आया था । वह पुलिस का मुख़बिर है , यह जानकर मेरा ख़ून खौल उठा । ' ओए गद्दारा ' -- मैं ग़ुस्से से चीख़ा और अपनी किरपान निकाल कर मैंने उस पर हमला कर दिया और उसे घायल कर दिया । हम दोनों गुत्थमगुत्था हो गए । पर तभी आसपास छिपे पुलिसवाले घर का दरवाज़ा तोड़कर अंदर आ गए और उन्होंने मुझे घेर लिया । उनकी स्टेन-गन और कार्बाइन मेरे सीने पर तनी हुई थीं । " इतना कह कर सरदारजी चुप हो गए । उन्होंने धीरे से अपना गिलास उठाया और गिलास में बची बाक़ी बीयर ख़त्म की ।
" सुरिंदर का क्या हुआ ? " मैंने उत्सुकतावश पूछा ।
" पुलिस ने उसे मेरे सिर पर रखे इनाम के बीस लाख की रक़म का आधा हिस्सा दे दिया । दस लाख रुपए ले कर वह वापस दिल्ली भाग गया । " सरदारजी बोले ।
" आपको उसके बारे में इतना कैसे पता ? " मैं हैरान था ।
यह सुनकर सरदारजी का चेहरा स्याह हो गया । उनके हाथ काँपने लगे । ए.सी. में भी उनके माथे पर पसीना छलक आया ।
आख़िर किसी तरह कोशिश करके उन्होंने कहा ," क्योंकि मैं जसबीर नहीं हूँ । मैं ही वह बदनसीब सुरिंदर हूँ । वह ग़द्दार मैं ही हूँ । मैंने वह कहानी जान-बूझकर आपको दूसरे ढंग से सुनाई थी । " सरदारजी के हाथ अब भी थरथरा रहे थे ।
उनकी बात सुनकर मैं हतप्रभ रह गया । प्याज़ की परतों की तरह इस कहानी में रहस्य की कई तहें थीं जो एक-एक करके खुल रही थीं ।
" मेरे दाएँ हाथ की कलाई के ऊपर इस ज़ख़्म का दाग़ मुझे जसबीर ने दिया था जब मेरी असलियत जानकर उसने किरपान से मुझ पर हमला किया था ।" सरदारजी ने आगे कहा ।
" जसबीर का क्या हुआ ? " मैं अब भी इस अजीब पहेली को समझने का प्रयास कर रहा था ।
" उस दिन सुबह साढ़े चार बजे के आसपास उसके लिए दुनिया रुक गई । पुलिसवालों ने उसे मेरे सामने ही गोली मार दी । उस समय वह निहत्था था । उस दिन उसके फ़ोर्स के ज़्यादातर लड़कों को पुलिसवालों ने धोखे से मार दिया । उन सबकी मौत का ज़िम्मेदार मैं हूँ ।" सरदारजी ने भारी स्वर में कहा । कुएँ के तल में जो अँधेरा होता है, वैसा ही अँधेरा मुझे उनकी आँखों में नज़र आया ।
" आप दुखी क्यों होते हैं ? आख़िर वे सब आतंकवादी थे । " मैंने उन्हें दिलासा दिया ।
" हर आदमी के भीतर कई और आदमी रहते हैं । यह आप पर निर्भर करता है कि आप उसके किस रूप के दरवाज़े पर दस्तक देते हैं । मुझे नहीं मालूम वे आतंकवादी थे या गुमराह नौजवान । मैं तो सिर्फ इतना जानता हूँ कि पैसों के लालच में आ कर मैंने उस आदमी को धोखा दिया , उस आदमी से ग़द्दारी की जिसने अपनी जान पर खेल कर मुसीबत में मेरी जान बचाई थी । जिसने मेरी देख-भाल करके मेरे ज़ख़्म ठीक किए थे । उसे पुलिस के हाथों मरवा कर मुझे रुपए-पैसे तो बहुत मिले पर उस दिन से मेरे दिल का चैन खो गया । मेरी अंतरात्मा मुझे रह-रह कर धिक्कारती है कि तू दग़ाबाज़ है । मैं रात में बिना नींद की गोली खाए नहीं सो पाता । मेरे सपने मेरी वजह से मरे हुए लोगों से भरे होते हैं । मेरे सपनों में अक्सर दर्द से तड़पता और लहुलुहान जसबीर आता है । वह मुझ से पूछता है --" मैंने तो तेरी जान बचाई थी । फिर तूने मुझे धोखा क्यों दिया ? " और मैं उससे नज़रें नहीं मिला पाता । उसकी फटी हुई आँखें , उसके बिखरे हुए बाल , उसकी ख़ून से सनी पगड़ी और उसके सीने में धँसी कार्बाइन और स्टेन-गन की गोलियाँ मुझे इतनी साफ़ दिखाई देती हैं जैसे यह कल की बात हो , हालाँकि इस घटना को हुए पच्चीस साल गुज़र गए । मेरा अतीत एक ऐसा शीशा है जिसमें मुझे अपना अक्स बहुत बिगड़ा हुआ नज़र आता है । एक चीख़ दफ़्न है मेरे सीने में । मैंने जीवन में जो हथकड़ी बनाई है , मैं उसे पहने हूँ ।" इतना कह कर सरदारजी ने लम्बी साँस ली ।
" होनी को कौन टाल सकता है, सुरिंदर भाई । पर अब तो आपके पास काफ़ी पैसा होगा । आप प्लास्टिक-सर्जरी करवा कर अपने हाथ के उस ज़ख़्म का यह दाग़ क्यों नहीं हटा लेते ? आप रोज़-रोज़ जब अपनी दाईं कलाई के ऊपर यह दाग़ नहीं देखेंगे तो वक़्त बीतने के साथ-साथ शायद आप इस हादसे को भी भूल जाएँगे । " मैंने सरदारजी को सांत्वना देते हुए सलाह दी ।
सरदारजी ने कातर निगाहों से मुझे देखा और बोले -- " समंदर के पास केवल खारा पानी होता है । अक्सर वह भी प्यासा ही मर जाता है । जब पुलिसवालों ने जसबीर को गोली मारी थी तो मैं उसके बगल में ही खड़ा था । मेरे कपड़े उसके ख़ून के दाग़ से भर गए थे । मेरे हाथ उसके ख़ून के छींटों से सन गए थे । अब रहते-रहते मुझे ऐसा लगता है जैसे मेरे कपड़ों पर , मेरे हाथों पर ख़ून के दाग़ लगे हुए हैं । मैं बार-बार जा कर वाश-बेसिन में साबुन से हाथ धोता हूँ । पर मुझे इन दाग़ों से छुटकारा नहीं मिलता । मैंने बहुत दवाइयाँ खाईं जी । साइकैट्रिस्ट से भी अपना इलाज करवाया । पर कोई फ़ायदा नहीं हुआ । आपने ठीक कहा । आज मेरे पास पैसे की कमी नहीं । वाहेगुरु का दिया सब कुछ है । प्लास्टिक-सर्जरी करवा कर मैं अपनी दाईं कलाई के ऊपर बन गए इस दाग़ से छुटकारा भी पा जाऊँगा । पर मेरे ज़हन पर , मेरे मन पर जो दाग़ पड़ गए हैं , उन्हें मैं कैसे मिटा पाऊँगा ? "
मैं चुपचाप उन्हें देखता-सुनता रहा । मेरे पास उनके सवालों का कोई जवाब नहीं था । उनके भीतर एक जमा हुआ समुद्र था । उनका दुख जीवन जितना बड़ा था ।
हमने वेटर को बुला कर बीयर और टिप के पैसे दिए और ' वोल्गा ' से बाहर निकल आए । नौ बज रहे थे । बाहर हवा में रात की गंध थी । जगमगाते शो-रूमों के पीछे से आकाश में आधा कटा हुआ पीला चाँद ऊपर निकल आया था ।
अचानक वे खोए हुए अंदाज़ में फिर से बोल उठे -- " मेरे कपड़ों पर कोई दाग़-वाग तो नहीं लगा जी ? " उनके माथे पर परेशानी की शिकन पड़ गई थी । उनकी आँखों में क़ब्र का अँधेरा भरा हुआ था । वे अपने भीतर फँसे छटपटा रहे थे ।
मैंने सहानुभूतिपूर्वक उनके कंधे पर हाथ रखा । वे जैसे दूर कहीं से वापस लौट आए । समय के विराट् समुद्र में कुछ ख़ामोश पल ओस की बूँदों-से टप्-टप् गिरते रहे ।
उनसे विदा लेने का समय आ गया था । मैंने उनसे हाथ मिलाने के लिए अपना हाथ आगे बढ़ाया । पर उनकी आँखों में पहचान का सूर्यास्त हो चुका था ।
" कुछ ज़ख़्म कभी नहीं भरते, कुछ दाग़ कभी नहीं मिटते ," वे आकाश की ओर देख कर बुदबुदाए और मेरे बढ़े हुए हाथ को अनदेखा कर पार्किंग में खड़ी अपनी होंडा सिटी की ओर बढ़ गए । मैं उनकी गाड़ी को दूर तक जाते हुए देखता रहा ।
सन्तोष खन्ना
सम्पर्क : प्रधान संपादक, 'महिला विधि भारती' पत्रिका
बी.एच.48, शालीमार बाग पूर्वी, दिल्ली -110088
ईमेल : santoshkhanna25@gmail.com
शिवांगी
शिवांगी तहेदिल से डॉक्टर बनना चाहती थी परंतु उसने जो परीक्षा दी, उसमें उसका नाम उस स्थान पर नहीं आया कि उसे दाखिला मिल पाता । परंतु वह हतोत्साहित नहीं हुई और उसे लगा कि वह इस बार थोड़े -से रैंक से ही पिछड़ी है, अगली बार जमकर मेहनत करेगी तो उसे मेडिकल में अवश्य दाखिला मिल जाएगा। वह विश्वविद्यालय से बीएससी कर चुकी थी किंतु उसे यह भी लगा कि उसे आगे की पढ़ाई भी करते रहना चाहिए और साथ में अगले वर्ष की मेडिकल परीक्षा की तैयारी भी आरंभ से ही करना शुरू कर देनी होगी । उसने विश्वविद्यालय में राजनीति विज्ञान में एम ए. का दाखिला ले लिया और मेडिकल के लिए शाम का कोचिंग सेंटर ज्वाइन कर लिया। उसके पिताश्री विवेक राज भारद्वाज अच्छे डॉक्टर थे तथा एक सरकारी अस्पताल में कार्यरत थे। वह भी चाहते थे कि उनकी बेटी शुभांगी डॉक्टर ही बने। हां, मां का विचार दूसरा था। उनका कहना था कि लड़कियों को विवाह कर पराये घर जाना होता है, जहां उन्हें उसे नए परिवार और नई जिम्मेदारियां के साथ तालमेल बैठाना होता है। फिर आखिर वह मां भी तो बनेगी ही, बच्चों का पालन पोषण भी एक गुरुतर कार्य होता है। उधर डॉक्टर का पेशा भी व्यक्ति का पूरा समय मांगता है। शिवांगी यह सब कैसे कर पाएगी? इतने मोर्चों पर सन्नद्ध होना सुगम नहीं होता।
परंतु शिवांगी का आत्मविश्वास तो आसमान छू रहा था। वह मां से कहती, ‘ मां, तू मेरे को कम क्यों आंक रही हो? मैं कोई पहली लड़की नहीं हूं जो डॉक्टर बनना चाहती है। हमारा इतिहास अच्छी महिला डॉक्टरों से भरा पड़ा है । मैं समझती हूं कि महिलाओं में सेवा का भाव तो कूट कूट कर भरा होता है। रोगियों की जितनी अच्छी सेवा-शुश्रूसा महिलाएं कर पातीं हैं पुरुष नहीं कर सकता है। आपने देखा होगा अस्पतालों में महिला नर्सों का ही बोलबाला है।खैर, मैं किसी पुरुष से अपनी तुलना नहीं कर रही , मेरी तुलना मेरी क्षमता, परिश्रम और मेरे संकल्प से है। अच्छा तो मैं कॉलेज जा रही हूं ।’ शिवांगी ने बैग उठाया और कॉलेज के लिए चली गई । कॉलेज में उसकी कक्षा में आज ‘भारत की राजनीति’ विषय पर एक प्रेजेंटेशन अर्थात् उसकी प्रस्तुति थी । कक्षा में जैसे ही उसकी प्रस्तुति पूरी हुई, पूरी क्लास के सभी छात्रों ने तालियां बजाकर उसका उत्साहवर्धन किया। उसने मुस्कुराते हुए सभी का धन्यवाद किया । उसके बाद उसी कक्षा के एक छात्र महेश की ‘राजनीति का वैश्विक परिदृश्य’ पर प्रस्तुति थी। महेश ने अपनी प्रस्तुति का आरंभ बड़े ही रोचक और प्रभावी ढंग से किया,
‘पिता तुल्य आदरणीय डॉ. लोकेश शुक्ला जी, सर्वप्रथम मैं आपको प्रणाम करता हूं कि आपके गुरु चरणों में बैठकर हमारी जो शिक्षा- दीक्षा हो रही है उसका कोई जवाब नहीं है। मैं ही क्या, हमारी कक्षा के सभी छात्र आपके प्रति आभारी हैं और आपका अभिनंदन करते हैं। आपकी अनुमति हो तो मैं आज के विषय पर अपनी प्रस्तुति आरंभ करूं?’ महेश ने अपनी प्रश्न सूचक नज़रों से प्रोफेसर साहब की ओर देखा मानो प्रस्तुति के लिए अनुमति मांग रहा हो। प्रोफेसर साहब ने हाथ के इशारे से उसे अपनी प्रस्तुति आरंभ करने के लिए कहा। महेश ने प्रभावी ढंग से किंचित मधु मुस्कान से अपनी बात कहना आरंभ किया । उसकी प्रस्तुति का ढंग भी बड़ा प्रभावित करने वाला था। वह बारी बारी सब की ओर देखकर अपनी बात कह रहा था। शिवांगी कक्षा की तीसरी पंक्ति के केंद्र में बैठी थी। शिवांगी को पता नहीं क्यों लगा कि महेश उसी की ओर देखकर अपनी प्रस्तुति दे रहा है । महेश की तेजस्वी आंखों से प्रस्फुटित आभा शिवांगी के अंतर्मन को एकाएक भेदती हुई लगी। वह एकदम विमोहित भाव से एकटक उसकी ओर देखती जा रही थी। शिवांगी को पता नहीं क्यों महेश की आंखों की ज्योति ने ऐसा मोहित -सा कर दिया कि उसकी समुचित देह एक अनोखी झंकार से विचलित हो गई । उसे अनुभव हुआ मानों उसका संपूर्ण व्यक्तित्व महेश की आंखों की नदी की धारा में डूब जाना चाहता है। इस तरह का इंद्रिय जनक अनुभव उसको अपने जीवन में पहली बार हो रहा था। वह महेश की संपूर्ण प्रस्तुति के दौरान उसकी आंखों की ओर बार-बार देखती और समोहित -सी हो वह अपनी आंखें नीचे कर लेती। उसकी आंखों के आकर्षण ने उसे ऐसा बांध दिया था कि अब उसे लगा कि जब वह अपनी आंखें नीचे भी कर लेती है उसकी आंखों का वह सम्मोहन उसका बराबर पीछे करता जा रहा था ।
महेश आज राजनीति के विशाल फलक पर अपनी प्रस्तुति दे रहा था पर इसके शब्द, उसके वाक्य, शिवांगी के ऊपर से निकल रहे थे। पूरी प्रस्तुति के दौरान उसकी संपूर्ण चेतना महेश की आंखों के सम्मोहन में मदहोश हो रही थी। वह महेश के एकतरफा प्यार की गिरफ़्त में आती जा रही थी । महेश की प्रस्तुति समाप्त हुई। समूची कक्षा करतल ध्वनि कर उठी। परंतु उसे तो मानो होश ही नहीं था। उसने ताली भी नहीं बजाई। वह अपनी बंद आंखों से महेश की आंखों में डूबती उतरती जा रही थी । वह भी कक्षा के सभी छात्रों के साथ बाहर आ गई । उसने देखा, महेश उसी की ओर आ रहा है । इस समय वह चाह रही थी कि महेश का किसी तरह का भी सामना न हो पर वह उसके सामने था।
‘ लगता है आपको मेरी प्रस्तुति पसंद नहीं आई? उसमें ऐसी क्या कमी थी। आपने तो ताली भी नहीं बजाई?’
‘ नहीं …नहीं …ऐसी तो कोई बात नहीं । तुम्हारी प्रस्तुति तो सबको लाज़वाब लगी।’
‘सबको तो अच्छी लगी, किंतु आपको तो नहीं, आखिर उसमें क्या कमी थी ।’
‘नहीं महेश।’ उसने हकलाते और स्वयं में सिमटते हुए कहा
‘क्या अच्छा था उस प्रस्तुति में?’
उसने एकाएक उस से प्रश्न पूछ लिया।
‘तुमने प्रस्तुति का आरंभ बहुत अच्छा किया था।’ उसने अपनी आंखें झुकाते हुए कहा। इससे पहले कि महेश उस से कुछ और प्रश्न पूछे, उसने कहा, ‘ मेरी बस आने वाली है। फिर बात होगी।’
शिवांगी घर पहुंच गई किंतु महेश की आंखों की आभा ने उसका पीछा नहीं छोड़ा।
‘ क्या उसे महेश से प्यार हो गया है।’ उसने अपनी विचलित मानसिक स्थिति पर गौर करते हुए सोचा।
‘शट अप। ‘ इस प्रकार का विचार कौंधते ही उसने अपने मन को जोर से झिड़क दिया। उसे तो डॉक्टर बनना है। वह किसी के प्रेम प्यार के चक्कर में नहीं आने वाली। उसका लक्ष्य बस एक है। उसे डॉक्टर बनना है और उसके लिए उसे खूब पढ़ना है। वह अपने मछ्ली की सी आंख-से लक्ष्य से कदापि चूकेगी नहीं। वह किसी भ्रम जाल में नहीं आयेगी। उसने मन के भावों पर नियंत्रण की रस्सी कसते हुए सोचा। वह आज की घटना या कि कहिए दुर्घटना को मन की स्लेट से पौंछ कर रहेगी ।
उसने मन लगाकर शाम की कोचिंग कक्षा का विषय पढ़ना आरंभ किया ।उसकी आंखें किताब पर टिकी थी पर मन महेश की आंखों से नहीं हटा। इस सबके लिए उसे स्वयं पर खीझ और गुस्सा आता जा रहा था। उसने अप्रत्याशित रूप से महेश के प्रति उमड़ती भावनाओं को नियंत्रण के ताले में बंद करना चाहा पर उसका हर प्रयास सफल नहीं हो रहा था और आज के इस अनोखे घटनाक्रम के बारे में चिंतन करते-करते ही उसकी आंख लग गई। दूसरे दिन कॉलेज गई तो उसने देखा, महेश वहां खड़ा बेसब्री से उसी का इंतजार कर रहा था । उसने चाहा कि वह उससे बच के निकल जाए परंतु महेश ने आगे बढ़ उसका रास्ता रोकते हुए कहा ‘ शिवांगी, क्या हुआ? मुझसे नाराज हो क्या?’
‘नहीं तो।’ वह उस पर ध्यान न देने का प्रयास करते हुए आगे बढ़ने लगी।
‘शिवांगी प्लीज ,! मुझे इस तरह अवॉयड मत करो । तुम जानती हो या न जानती हो, पर मैं कल से बस तुम्हारे बारे में ही सोच रहा हूं । लगता है हम दोनों को एक दूसरे से प्यार हो गया है।’
’ क्या बेसिर पैर की बातें कर रहे हो।’ उसने आंखें नीचे ही रखते हुए कहा ।
,’क्या तुम यही बात मुझसे आंखें मिलाकर कह सकती हो? अगर हमारे हृदय में परस्पर प्रेम का अंकुर फूट पड़ा है तो इसमें अस्वाभाविक भी क्या है? प्रेम तो व्यक्ति को ईश्वरीय वरदान -सा ही मिलता है।’ उसने किसी दार्शनिक की भांति अपने स्वर को भरसक कोमल बनाते हुए कहा।
‘ मुझे इन सब से कोई दिलचस्पी नहीं है। मेरा ध्येय इस समय डॉक्टर बनने का है। मैं उसी की तैयारी कर रही हूं फिर ऊपर से एम. ए. फाइनल की परीक्षा भी सिर पर हैं।’
‘पर क्या इसी तरह हम खड़े-खड़े बातें करतें रहेंगे। चलते हैं कंटीन में चाय पीते हैं।’
पता नहीं क्यों शिवांगी उसको मना नहीं कर सकी। अब वह दोनों कैंटीन में चाय की टेबिल के सामने बैठे थे।
‘ डॉक्टर तो मैं भी बनना चाहता हूं। जानती हैं मैं तीन बार मेडीकल की परीक्षा दे चुका हूं। मैंने अभी भी हिम्मत नहीं हारी है। मैं ने भी तैयारी शुरू कर दी है। ‘
‘ अच्छा!’ शुभांगी ने आश्चर्य से कहा.
‘ मैं भी एक बार परीक्षा दे चुकी हूं। मेरा नाम कुछ ही रैंक नीचे रहा रह गया।’ उसने भी अपने बारे में महेश को बताया।
मैंने तो कभी अपना रैंक नहीं देखा, पर पुन परीक्षा अवश्य दूंगा।’
‘मैंने तो इस बार कोचिंग क्लासेस ज्वाइन कर ली हैं।’
‘मैंने कभी कोचिंग नहीं ली है। अपने बल पर ही तैयारी करता रहा हूं । अब कोशिश करूंगा कि मैं भी कोई कोचिंग सेंटर ज्वाइन कर लूं।’
शिवांगी और महेश अब एक ही कोचिंग सेंटर से कोचिंग लेने लगे थे और उनकी मुलाकातों का सिलसिला बढ़ता जा रहा था। शिवांगी को महेश से बातचीत करके बहुत अच्छा लगता और महेश को भी शिवांगी के बिना चैन नहीं पड़ता। इस प्रकार दोनों का प्यार भी लगातार परवान चढ़ता जा रहा था। शिवांगी और महेश दोनों कॉलेज के हर कंपटीशन में भाग लेते और प्रथम या द्वितीय स्थान प्राप्त कर लेते और वाहवाही बटोरते नज़र आते। एक दिन शिवांगी और महेश शहर में नए बने एक भव्य पार्क को देखने गए । पार्क में एक सुंदर -से घने छायादार वृक्ष के नीचे बने एक प्रस्तर बेंच पर बैठते हुए शिवांगी ने कहा, ‘ इस पार्क की स्वच्छता और सुंदरता की दाद तो देनी होगी। हरियाली से भरपूर तरह-तरह के फूलों से सुरक्षित यह पार्क किसी के मन को भी मोह लेगा।’
‘ ऐसे पार्क प्रदूषण के इस युग में मनुष्य के लिए स्वस्थ वातावरण के प्रजनक है। यहां बैठकर खुलकर सांस ली जा सकती है। सुबह शाम सैर करने का यह स्वस्थ स्थल है। शाम को बच्चे इस शुद्ध ऑक्सीजन -जनित वातावरण में खेल कूद कर हृष्ट-पुष्ट हो सकते हैं । जो लोग इस पार्क के समीप रहते हैं उनके लिए यह पार्क किसी स्वर्ग से काम नहीं है।’ महेश ने तो मानो इस पार्क की उपयोगिता पर एक अच्छा खासा व्याख्यान ही दे डाला।
‘ ऐसे पार्क समय की मांग है। इस प्रकार के पार्क और बनते रहने चाहिए। ‘ शिवांगी ने वातावरण की शुद्धता की जरूरत पर बल देते हुए कहा ।
‘यह पार्क आज हमारे प्रेम का साक्षी भी बन रहा है। इसकी भरपूर हरियाली की तरह हमारा प्रेम भी सदा हरा भरा रहे ।’
महेश ने किंचित मुस्कुराते हुए कहा
‘ प्रेम समर्पण और विश्वास का दूसरा नाम है। यह आत्मिक संबंध है।’ शिवांगी ने स्वर को गंभीर बनाते हुए कहा।
‘ प्रेम एक भाव है, एक एहसास है । हमारी देह हमारी आत्मा का मंदिर है। यह आत्मा का मंदिर होने के साथ साथ हमारे हृदय का निवास स्थान भी है। इसलिए प्रेम में काया को नकारा नहीं जा सकता। ‘ महेंद्र ने यथार्थ के धरातल पर उतरते हुए कहा।
प्रेम कायिक हो तो वह प्रेम ही नहीं है।’ शिवांगी ने किसी दार्शनिक की तरह कहा।
‘ प्रेम एक मानवीय संबंध है, चाहे वह किसी मानव के प्रति हो या फिर प्रभु के प्रति। प्रेम सृष्टि का आधार है।’ महेश ने कुछ सोचते हुए कहा।
‘ प्रेम आत्मा का पारदर्शी आईना है।’
महेश ने अब कुछ नहीं कहा। मानों प्रेम के महत्व पर उसके उतर चुक गये हों। शिवांगी ने अपनी बात को जारी रखते कहा,
‘प्रेम त्याग के रास्ते से होकर बहती वह स्वच्छ नदी की धारा है जो स्वयं के व्यक्तित्व को प्रबुद्ध बनाती है और दूसरों के प्रति संवेदनशील होना भी सिखाती है।’
‘ शिवांगी, मुझे तुम पर बहुत गर्व है कि प्रेम के प्रति तुम्हारा भाव बहुत उदात्त और गहरा है। पर प्रेम कायिक ना हो तो हम उसे कैसे अभिव्यक्त कर सकते हैं। हम दोनों देहधारी हैं ।’
हम केवल देह ही नहीं है। देह का का महत्व चेतना और आत्मा के साथ है। आत्मा हो तो शव भी शिव बन जाता है । आत्मा न हो तो सब शव के समान है।’ शिवांगी तो मानों आध्यात्मिक स्तर पर खड़े होकर प्रेम के महत्व को महसूस कर रही थी।
‘शायद मैं प्रेम के बारे में स्वयं को अच्छी तरह अभिव्यक्त नहीं कर पा रहा हूं। बेशक प्रेम केवल कायिक नहीं होता किन्तु हम मानव के शरीर को नकार नहीं सकते, शरीर तो उस विधाता ने है।’
‘शरीर को आत्मा के लिए बनाया गया है। इसलिए मानव का कर्तव्य है कि वह शरीर रूपी मंदिर को हमेशा स्वच्छ रखे। उसमें किसी प्रकार का अवगुण प्रवेश न होने दे।’
दोनों बातें करते-करते पार्क के उस स्थान पर पहुंच गए जहां ध्यानस्थ महात्मा बुद्ध की एक सुंदर प्रतिमा स्थापित थी । दोनों उस प्रतिमा के समक्ष झुक गए।
‘यहां कितनी शांति है। महात्मा बुद्ध के प्रभामंडल को मैं अपने अंदर महसूस कर रहा हूं । महात्मा बुद्ध जिन्होंने पारिवारिक प्रेम का त्याग कर पूरे संसार के कल्याण के लिए स्वयं को समर्पित कर दिया, हमारे समक्ष बुद्ध ने कितना बड़ा प्रेरक उदाहरण प्रस्तुत किया है।’ महेश ने वहीं से एक फूल लिया और महात्मा बुद्ध की प्रतिमा के चरणों में समर्पित कर दिया।
‘ प्रेम की भावना इतनी उदात्त है कि मुझे अपने अंदर एक बहुत बड़ा परिवर्तन दिखाई दे रहा है। मुझे लगता है स्वार्थ की भावना तिरोहित हो मुझे प्रत्येक प्राणी के प्रति जिम्मेदार बना रही है। मैं पड़ोस, समाज , देश और विश्व के बारे में अधिक संवेदनशील हो गई हूं, ’
‘ शिवांगी, तुम बहुत महान हो।’
‘ नहीं , नहीं। मैं महान नहीं हूं महेश पर मुझे यह अहसास आवश्यक होता है कि प्रेम ‘स्व’ से मुक्त होने का नाम है। मैं ‘ स्व’से
‘परहित’ की यात्रा पर निकल पड़ी हूं। देखती हूं मैं कहां पहुंच पाती हूं। ‘
शिवांगी और महेश एक आदर्श बल्कि प्लाटॉनिक प्रेम की डोर से बंधे मानों आकाश में उड़ान भर रहे थे । खुशनुमा दिन पंख लगा कर उड़ते जा रहे थे।
कुछ दिनों बाद शिवांगी ने देखा कि महेश कोचिंग और क्लास में अनुपस्थित रहने लगा था। पूछने पर पता चला कि महेश के पिताजी को हार्ट अटैक आया है और जांच से पता चला है कि उनके हृदय की तीनों नालियां बंद हैं। उनकी ओपन हार्ट सर्जरी करनी पड़ेगी। फिर महेश से मुलाकात हुई तो शिवानी ने उससे उसके पिताजी का हाल चाल पूछा। उसने उसे भरे गले से बताया कि उनकी ओपन हार्ट सर्जरी होनी है। उसे ऑपरेशन के लिए अस्पताल में एक भारी भरकम राशि जमा करनी होगी और उसका प्रबंध करने की कोशिश कर रहा है। शिवांगी ने उसे बताया कि उसके पिता सरकारी अस्पताल में डॉक्टर हैं । उनके अस्पताल में वह दाखिल होते तो वह कुछ सहायता कर सकते थे। परंतु महेश ने उसे बताया कि जिस अस्पताल में वह दाखिल हैं वह हार्ट स्पेशलिटी का अस्पताल है और वह उनका वही ऑपरेशन करवाना चाहता है क्योंकि वह किसी भी कीमत पर अपने पिताजी को खोना नहीं चाहता। उसकी आंखों से अश्रु छलकने वाले थे पर उसने उन्हें जबरन रोक दिया।
दो-तीन दिन बाद शिवांगी को पता चला कि महेश ने पैसे का प्रबंध कर अस्पताल में जमा करवा दिये हैं। शिवांगी ने उससे पूछा था कि इतनी बड़ी रकम का उसने कैसे इंतजाम कर लिया तो उसने उसे थोड़ा रुखाई से कहा, ‘ इस समय तो मेरे सामने एक ही समस्या है कि मेरे पिताजी का सफल आपरेशन हो जाये।’ शिवांगी से महेश से मुलाकात कुछ दिन बाद ही हो सकी। पता चला कि उसके पिताजी की हार्ट सर्जरी सफल रही है उन्हें जल्दी अस्पताल से छुट्टी मिल जाएगी । इन दिनों महेश कोचिंग सेंटर में तो बिल्कुल ही नहीं आया और कॉलेज से भी वह अनुपस्थित ही रहता। शिवांगी उसकी अनुपस्थिति से परेशान अवश्य थी परंतु वह उसकी समस्या समझ रही थी ।
एक दिन की मुलाकात में उसने इतना ही बताया कि अब वह कोचिंग सेंटर तो नहीं आ सकेगा। कॉलेज की पढ़ाई अवश्य जारी रखेगा। शिवांगी को बाद में पता चला कि महेश ने कोचिंग इसलिए छोड़ दी क्योंकि उसके पास कोचिंग सेंटर की फीस के लिए पैसे नहीं थे। जब उसने कोचिंग सेंटर ज्वाइन भी किया था तब भी उसके पिताजी ने अपने ऑफिस से जमा अपने प्रोविडेंट फंड से ऋण लेकर उसकी फीस का प्रबंध किया था । उसके पिताजी घर पर स्वास्थ्य लाभ कर रहे थे परंतु फिर पता नहीं क्या हुआ वह एकाएक चल बसे। महेश पर जिम्मेदारियों का पहाड़ टूट पड़ा। उसकी दो युवा बहनों का विवाह भी होना था। वह अब घर चलाने के लिए कोई काम पकड़ना चाहता था परंतु उसे इसमें भी सफलता नहीं मिली । समय बदलता रहा । उसने शिवांगी के साथ एम.ए. की परीक्षा तो दी परंतु डॉक्टर बनने का उसका सपना टूट चुका था । इन सब समस्याओं के बीच वह घर की हर जिम्मेदारी निभा रहा था। वह समय-समय पर मां को घर चलाने के लिए पैसे लाकर देता। मां भी पूछती कि क्या उसने कोई नौकरी कर ली है पैसे कहां से आ रहे हैं? वह मां से यही कहता की मां बस यही समझ लो। परंतु यह बात उसने और किसी को नहीं बताई और न ही किसी को पता चला कि वह जाने अनजाने एक डग रैकेट में फस गया था।
हुआ यह था कि जब उसके पिता जी अस्पताल में हार्ट सर्जरी के लिए दखल थे और वह भारी भरकम राशि के इंतजाम में कई दोस्तों, रिश्तेदारों और अन्य लोगों से मिला था किंतु उसे सब जगह से निराशा ही हाथ लगी थी । सब स्थान से बैरंग लौटकर आया था। तभी उसे एक पान की दुकान वाले ने उसे परेशान जान उसे एक आदमी का पता दिया। कभी कभी जरूरत क्या नहीं करा देती? वह फौरन उसके पास गया। वह एक छोटे-से ऑफिस में एक साधारण -सी मेज कुर्सी पर बैठा हिसाब -किताब करने में व्यस्त था। उसे आया देख उस व्यक्ति ने उसे पास पड़ी कुर्सी पर बैठाया और उससे आने का कारण पूछा। महेश उसको देखकर ना उम्मीद हो गया था कि वह आदमी उसे इतनी बड़ी रकम कैसे देगा । किंतु उसे हैरानी हुई कि उसकी समस्या जानकर उसने झट से मेज की दराज से रुपए का एक बड़ा -सा बंडल निकाला और बोला कि ‘गिन लो पूरे चालीस हजार हैं।’ महेश ने कांपते हाथों से रुपए लेते हुए उसे धन्यवाद कहा और पूछा कि उसे रुपए लौटाने कब होंगे । भाई मुश्किल के समय हम तुम्हारे काम आए हैं। तुम्हें इन्हें लौटाना नहीं है। बस हमारा एक छोटा -सा काम करना होगा। एक बैग एक विशिष्ट स्थान पर देना है। हम वह पता आपको समझाए देते हैं । उसने बैग ले लिया और उसे निर्दिष्ट स्थान पर पहुंचा दिया। महेश तभी समझ गया था कि आज पिताजी की जानलेवा बीमारी ने उसे अपराध की दुनिया में पहुंचा दिया है । पर उसे समय लगा कि यह उसकी मजबूरी थी ।।
पिताजी की मृत्यु के बाद उसे परिवार चलाने के लिए प्रायः पैसे की जरूरत पड़ती और उसके कदम स्वत: ही उस छोटे-से ऑफिस की ओर उठ जाते । उसे हर बार छोटा-मोटा बैग किसी निर्दिष्ट स्थान पर पहुंचाने के एवज़ में पैसे मिलने लगे। धीरे-धीरे पैसे का लोभ उस पर इतना हावी हो गया कि उसके कदम उस ऑफिस की ओर अक्सर जाने लगे और वह उसकी अच्छी खासी कमाई का जरिया बन गया। धीरे-धीरे वह उस धंधे के सभी गुर सीख गया। अब उसने एक दो दोस्तों को अपने साथ जोड़ा और उन्हें विश्वास में लेकर उन के साथ मिलकर स्वतंत्र रूप से वह धंधा करने लगा। अब उसके पास पैसे की कोई कमी नहीं रही । उसका रहन सहन , उसकी चाल ढाल, यहां तक कि उसका पहनावा भी बदल गया। उसने किस्तों पर एक छोटा -सा मकान खरीद लिया और मां और बहनों को वहां शिफ्ट कर दिया। मां को अपने काम के बारे मैं यही बताया कि वह बाजार में माल सप्लाई का काम करने लगा है। इधर कुछ महीनो से उसकी शिवांगी से मुलाकात नहीं हुई थी क्योंकि शिवांगी मेडिकल परीक्षा में बहुत व्यस्त थी। परीक्षा के बाद शिवांगी की उस से उसकी मुलाकात हो पाई। वह उसे एक महंगे रेस्टोरेंट में खाना खिलाने ले गया। शिवांगी ने हैरानी से पूछा कि उसने कौन -सा बिजनेस शुरू किया है तो उसने उसे भी बताया कि उसने सप्लाई लाइन आरंभ की है । एक बार शिवांगी ने महेश को मिलने के लिए कहा। महेश ने उसे बताया कि वह काम के सिलसिले में बाहर जा रहा है। लौटकर उससे मिलेगा। एक महीने बाद शिवांगी की मुलाकात उससे हो पाई। शिवांगी ने नोट किया कि महेश एकदम चिड़चिड़ा -सा हो गया है। किसी बात का ढंग से जवाब नहीं देता। शिवांगी को लगा कि पिता की मृत्यु के कारण अभी तक वह संकट के दौर से गुजर रहा है। एक वजह यह भी हो सकती हैं कि वह भी डॉक्टर बनना चाहता था उसका वह सपना भी पिताजी के असामयिक निधन से चूर-चूर हो गया था। परिवार की जिम्मेदारियां का बोझ तो था ही। वह चाहे पैसा कमाने लगा है पर पैसा ही तो सब कुछ नहीं होता। उसपर दो बहनों के विवाह की जिम्मेदारी है । शिवांगी को उसे हमदर्दी हो आई। वह उसके साथ अतिरिक्त नम्रता से पेश आने लगी । परंतु महेश ने उसकी इस अतिरिक्त नम्रता के कारण उसके प्यार का फायदा उठाकर उसे कई बार छूने की कोशिश की और एक बार तो वह उसका चुंबन लेने पर उतारू हो गया। शिवांगी हैरान हो रही थी कि महेश पहले तो ऐसी कोई हरकत नहीं करता था। शिवांगी ने जब गंभीरता से उसे रोक दिया तो वह बोला, ‘शिवांगी, मैं कोई देवता नहीं हूं । मेरी भी कुछ इच्छाएं हैं । मैं आत्मा नहीं देह भी हूं’ उसने शिवांगी को डांटते हुए कहा।
‘हमारे इस पावन प्रेम को अपनी वासना जन्य भावनाओं से कलुषित मत करो।’
‘ देखो शिवांगी, जीवन केवल आदर्श के सहारे नहीं चलता । यथार्थ के ऊबड़ खाबड़ रास्ते पर चलकर मैं यही समझ पाया हूं । अगर मुझ में कुछ परिवर्तन आ गया है तो तुम्हें मुझे उसके साथ ही अपनाना होगा। ‘ महेश का जवाब सुनकर शिवांगी भी इतनी परेशान हो गई कि तत्काल उसे कोई उत्तर सूझा ही नहीं।
‘ परेशानी के कारण अभी तुम्हारी सोच गड़बड़ा गई लगती है। इस विषय पर बाद में बात करते हैं। ‘ इतना कहे शिवांगी वहां से चली आई। रास्ते में उसकी शिशिर नाम के अपने सहपाठी से मुलाकात हो गई। उसने पूछा, इस बार मेडिकल परीक्षा कैसे रही?’
‘ लगता है मेरी परीक्षा तो बहुत अच्छी हुई, परंतु देखते हैं परिणाम क्या आता है।’
‘ शिवांगी, मैं तुझे एक बात बताना चाहता हूं। तुम बुरा तो नहीं मानोगी?’
‘नहीं, बुरा क्यों मानूंगी। तुम बताओ न क्या बात है?’ शिवांगी ने उससे उत्सुकता से पूछा।
‘मैंने सुना है महेश को पुलिस ने पुलिस स्टेशन बुलाया था।’
‘ पुलिस स्टेशन? क्यों?: शिवांगी ने हैरानी से पूछा ।
‘सुना है महेश ने ड्रग माफिया बना लिया है और अब वह ड्रग सप्लाई का धंधा करने लगा। हैं।’
‘क्या?’ शिवांगी मानो आसमान से गिरी ।
‘तुम्हें पता है तुम क्या कर रहे हो शिशिर?’ उसने अपनी विचलित हो गई मानसिकता पर काबू पाते हुए कहा।
‘मैंने सुना है पर मैं यह जानता हूं जहां आग होती है धुआं वहीं से निकलता है।’
‘ महेश ऐसा नहीं हो सकता। महेश ऐसा नहीं कर सकता। तुम किस धुएं की बात कर रहे हो।’
‘मेरे पास कुछ भी पुख्ता सूचना नहीं है पर आपने उससे पूछा नहीं कि वह काम क्या करता है?’ शिशिर से शिवांगी से पूछा।
‘ मैंने पूछा तो था उसने बताया, वह सप्लाई का काम करता है। मैंने जब भी पूछा कि वह क्या सप्लाई करता है वह बात को टाल गया। उसने कही कुछ बताया नहीं।’
‘तभी तो? जब आपको भी नहीं बताया तो यहीं लगता है कि वह ड्रग के धंधे में आ गया है। ‘
‘ मैं जाकर अभी उसी से पूछती हूं ।वह मेरे विश्वास पर इस तरह कुठाराघात नहीं कर सकता। मैं उसी से जाकर पूछती हूं ताकि दूध का दूध और पानी का पानी हो जाए।’ शिवांगी उठकर जाने लगी। शिशिर ने उसे आगे बढ़कर रोक दिया।
‘ शिवांगी, आप उससे अभी कुछ मत पूछो। अगर इस बात में जरा - सी भी सच्चाई हुई तो वह आपको सच क्यों बताये गा। मैं इस बात का पता लगाता हूं कि वास्तविकता है क्या? ‘
शिशिर ने दो दिन बाद शिवांगी को बताया कि उसने अपने विश्वस्त सूत्रों से पता लगाया है कि वह तब से ड्रग के धंधे में फस गया था जब से उसने अपने पिता के ऑपरेशन के लिए पैसे का इंतजाम किया था ।अब उसके साथ एक दो और लड़के भी हैं जो उसकी इसमें सहायता कर रहे हैं। पुलिस बराबर उस पर नज़र बनाये हुए है वह किसी भी समय पुलिस के शिकंजे में आ सकता है ।’ शिवांगी को सब सुनकर बहुत बड़ा धक्का लगा। उसकी आंखों से बहती अश्रु धारा रुक नहीं रही थी । उसका विश्वास खंड-खंड हो गया था। उसका महेश से सच्चा प्रेम था। गंगा में गंदे नाले जब मिलते हैं तो उसकी पवित्रता नष्ट हो जाती। है । दूध में जहर की एक बूंद मिला दी जाए तो सारा दूध जहर बन जाता है । आकाश से अगर एसिड की बारिश हो तो फसलें तबाह हो जाती हैं । शिवांगी को लगा कि एसिड की बारिश फसलों पर नहीं, उस पर एसिड की बारिश हो गई और उसके सारे स्वप्न, सारी उमंगे, सारे आदर्श धराशयी हो गए हैं।
‘ शिवांगी, संभालो खुद को। समय पर असत्य से पर्दा उठ जाए तो संभलने का समय मिल जाता है। तुम तो वैसे ही साहसी और संकल्पशील हो। ऐसे हिम्मत हार जाओगी तो तुम्हारे उन लक्ष्य का क्या होगा जो तो तुम डॉक्टर बनकर मानव मात्र की सेवा करना चाहती थी । रही बात महेश की। बुरे कर्म का हमेशा गलत नतीज़ा निकलता है। वह अपराध के रास्ते पर चल निकला है। देर सवेर उसका दंड तो उसे भोगना ही होगा।
‘शिशिर नहीं, महेश को भटके रास्ते से लौटना होगा । प्रश्न यह नहीं है कि उसे दंड मिलेगा। ड्रग सप्लाई कर वह नई पीढ़ी के भविष्य के साथ खिलवाड़ कर रहा है। किसी तरह से उसे रोकना होगा। अगर पिताजी की सर्जरी के लिए पैसे के प्रबंध के दौरान वह इस गलत रास्ते पर मजबू्री में चला गया है शायद उसे लौटाना संभव हो । मैं प्रयास अवश्य करूंगी । मेरा हृदय यह सोचकर ही कांप उठता है कि महेश की वजह से देश के नौजवानों का विनाश हो रहा है। वह नौजवान जो देश की प्रगति और खुशहाली लाने के लिए महत्वपूर्ण कड़ी बन सकते हैं वह स्वयं के विनाश का कारण बने और उसकी पृष्ठभूमि में महेश की भूमिका हो, मेरा सिर शर्म से झुक रहा है । ‘
उसने महेश को फोन किया। ‘ आओ, आज फिर उसी पार्क में चलते हैं जहां महात्मा बुद्ध की उपस्थिति से एक अनोखे शांत वातावरण का सृजन हो रहा था । उसने कहा कि आज एक जरूरी काम में उलझा हूं कल चलेंगे वहीं इसी समय।,’ शिवांगी के लिए एक एक पल बिताना दुर्भर हो रहा था। रात को उसने सोने का भरसक प्रयास किया किंतु नींद उससे कोसों दूर जा चुकी थी। सुबह उसकी मां और पिताजी ने उसका उतरा हुआ मुंह देखकर कहा, ‘ शिवांगी बेटा, क्या तुम्हारी तबीयत ठीक नहीं है?’ : मैं ठीक हूं। बस रात अच्छी से सो नहीं सकी थी।’
‘अरे बेटा, तुम्हारी परीक्षा का रजल्ट आने वाला है। इस बारे में चिंता मत करो। इस बार तुम्हारा परिणाम अवश्य अच्छा आएगा । बस देखना यह होगा कि तुम्हें किसी अच्छे कॉलेज में दाखिला मिल जाए।’ नियत समय पर शिवांगी पार्क के उस हिस्से में पहुंची जहां महेश और वह प्रायः मिला करते थे। महेश उसका पहले से ही वहां इंतजार कर रहा था। उसे देख उसने आगे बढ़ उसका हाथ पकड़ा । शिवांगी ने धीरे से अपना हाथ उसकी हाथों की गिरफ्त से मुक्त करते हुए कहा, ‘ कब आए महेश, क्या मुझे आने में देरी होगी? दोनों बेंच पर जा बैठे । शिवांगी को समझ में नहीं आ रहा था कि वह बात कहां से शुरू करें। फिर वह कुछ सोचते हुए बोली, महेश, अगर मुझसे कोई गलती हो जाए तो क्या तुम मुझे क्षमा कर दोगे ?’
‘गलती, कैसी गलती? मैंने तुम्हें प्यार किया है मैं अवश्य माफ कर दूंगा ।’ उसने उसके नजदीक सरकते हुए कहा। शिवांगी ने उसकी आंखों में देखा। महेश की आंखों में वासना छलक रही थी। इस प्रकार के हाव भाव देखकर वह अत्यंत विचलित हो गई। वह उठकर खड़ी हो गई । ‘महेश, तुमने जो रास्ता चुना है वह बिल्कुल सही नहीं है । अगर तुम उस रास्ते को छोड़ वापस लौट लो तो मैं तुम्हें अवश्य माफ कर दूंगी, मैं तुम्हें किसी भी कीमत पर खोना नहीं चाहती।’
‘ यह सब तुम क्या कह रही थी।? शिवांगी ने यह देखा, महेश के मुंह की रंगत एकदम फीकी पड़ गई थी।
‘यह तुम क्या कह रही हो? मैं बिल्कुल नहीं समझा। किस गलती की बात कर रही हो?
‘ यह तुम अच्छी तरह जानते हो कि मैं क्या कहना चाहती हूं । महेश, गलती मनुष्य से ही होती है अगर वह गलती किसी मजबूरी से हो गई हो तो फिर सुबह का भूला कोई सांझ को घर लौट आए तो उसे भूला नहीं कहते।’
‘ शिवांगी, पहेलियां क्यों बुझा रही हो। मतलब की बात पर आओ।’ वह थोड़ा कर्कश होकर बोला ।
‘ तुम सच सुनना चाहते हो। तुमने ड्रग सप्लाई का रास्ता क्यों चुना?’ शिवांगी ने स्पष्ट रूप से अपनी बात कह दी।
महेश को पता चल गया था कि शिवांगी उसके कार्य की असलियत जान गई है । उसने भी कड़क शब्दों का इस्तेमाल करते हुए कहा, “ मैं चार पैसे कमाने लगा हूं तो सबके पेट में दर्द क्यों होने लगा है? उसे वक्त सब लोग कहां थे जब मुझे पैसे की सख्त जरूरत थी। तुम्हें पता है मैं उस समय पैसे के लिए किस तरह भटकता रहा था। तकदीर ने मुझे जो रास्ता दिखाया , मजबूरी में वहीं तकदीर मेरी तदवीर बन गया है ।’‘तुम अच्छी तरह जानते हो महेश, यह राष्ट्र विरोधी और अनैतिक काम है। तुम देश के युवाओं के भविष्य के साथ खेल रहे हो।’‘अपना यह उपदेश अपने पास रखो शिवांगी। मुझे जो अच्छा लगेगा मैं करूंगा। देश समाज से पहले मैं अपने बारे में सोचूंगा । कहां था तुम्हारा यह समाज जब मैं दर दर दर्द भटक रहा था कि मैं अपने पिता की जान बचाना चाहता था ।’
‘महेश, मैं तब की तुम्हारी मजबूरी खूब समझती हूं । परंतु अब तो कोई मजबूरी नहीं। तुम मेरे लिए ही सही, हमारे प्रेम के लिए इस भटकाव से लौट लो।’
‘ मैं जैसा हूं वैसा ही तुम्हें अपनाना होगा।’
‘तुम्हारी यह ज़िद तुम्हें महंगी पड़ेगी। अपराध हमेशा अपराध होता है। पुलिस कभी भी पकड़ सकती है। मेरे लिए ना सही, अपने लिए अपने परिवार के लिए ..तुम्हारी अपनी भलाई भी इसी में है कि तुम यह सब छोड़कर एक नया जीवन शुरू करो ।’मेरे लिए यह कठिन है। मैं बखूबी जानता हूं मेरे लिए सही क्या है।’महेश का यह रवैया देखकर शिवांगी बिल्कुल अंदर से टूट गई । उसे महेश पर विश्वास था कि वह उसका कहा कभी टालेगा नहीं । उसकी आंखों में आंसू बहने लगे किंतु महेश पर उन आंसुओं का भी कोई प्रभाव नहीं हुआ।
‘ शिवांगी, मैंने तुम्हें अपना फैसला बता दिया है तुम चाहो तो मुझे छोड़ सकती हो, मैं सब सह लूंगा।’
‘ओ माय गॉड, बस यही तक था तुम्हारा प्रेम । तुम भी यह समझ लो मैं भी तुम्हारे प्रति अपने प्रेम को कमजोरी नहीं बनने दूंगी। मैंने तुम्हें अथाह प्रेम किया है पर वह प्रेम एक आदर्शवादी महेश से था। वह महेश मेरा एक आदर्श था। मैं एक अपराधी से प्रेम नहीं कर सकती । ऐसी स्थिति में मैं अपना कर्तव्य खूब जानती हूं।’
‘ओ आदर्श वादिनी तुम अपना कर्तव्य करो, मैं अपना काम करता हूं ।’ उसने भी स्पष्ट शब्दों का इस्तेमाल करते हुए कहा ।
‘मेरा कर्तव्य यह है कि मैं यहां से सीधे पुलिस स्टेशन जाऊं और उसने अपना पर्स उठाया और हाथ हिलती हुई पार्क से तत्काल निकल गई ।
‘जाते-जाते उसने महेश के यह अंतिम शब्द सुने,
“ शिवांगी, पुलिस वाले भी बिकाऊ है। मैं उन्हें खरीदना अच्छी तरह जानता हूं ।’
पार्क के बाहर आकर वह एक थ्री व्हीलर में बैठ गई और उसे निश्चितात्मक स्वर में कहा,’ पुलिस स्टेशन चलो ।’।
ड्राइवर ने एक बार उसकी और देखा और स्कूटर स्टार्ट कर दिया ।
महेश ने पार्क में बैठे बैठे कहीं अपना फोन लगाया और धीरे से बोला ,’शिवांगी यहां से निकल गई है । शायद वह पुलिस स्टेशन जा रही है । उसे बस वहां मत पहुंचने देना । समझ गए ना ।’
जब शिवांगी का स्कूटर पुलिस स्टेशन वाली रोड की और मुडा, तभी पीछे से एक वाइट कार ने स्कूटर को जोर से हिट किया। स्कूटर बुरी तरह उलट गया । ड्राइवर और शिवांगी दोनों उछल कर सड़क पर धडाम से गिर गये। कार तो वहां से एकदम रफूचक्कर हो गई ।
लोग इकट्ठे हो गए । किसी ने पुलिस वालों को दुर्घटना की सूचना दी। पांच मिनट में ही पुलिस की वेन मौके पर पहुंच गै। दोनों को वेन में डाल पुलिस पास के एक अस्पताल में ले गई। अस्पताल तक पहुंचते पहुंचते शिवांगी के प्राण प्रखेरु उड़ चुके थे और ड्राइवर बेहोश था।
दूसरे दिन पोस्ट मार्टम और अन्य कार्यवाही पूरी होने पर शिवांगी के माता-पिता ने रोते चिल्लाते हुए उसका अंतिम संस्कार कर दिया। शिशिर को भी शिवांगी के बारे में पता चला तो वह तत्काल उसके घर पहुंचा । उसने उसके पिता को वस्तुस्थिति के बारे में बताते हुए कहा है, लगता है इस दुर्घटना के पीछे महेश की ही साज़िश है। शिवांगी के पिता ने पुलिस में महेश के विरुद्ध एफआईआर दर्ज कर दी। पुलिस ने मामले की नये सिरे से अपनी जांच शुरू कर दी। अगले दिन शिशिर समाचार पत्र हाथ में लिए हुए शिवांगी के पिता से मिला, ‘ अंकल, शिवांगी का रिजल्ट आ गया है। इस बार सूची में शिवागी का नाम पांचवें नंबर पर है । शिवांगी के पिता और माता ऊंची ऊंची स्वर में रोने लगे। कोई उनको पानी दे रहा था कोई उनका ढांढस बंधा रहा था। बेबस पिता ने कहा, ‘ हमारी तो दुनिया ही लुट गई।पर शिवांगी बेटा तुम्हारा बलिदान कभी व्यर्थ नहीं जाएगा।’
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आलेख
डॉ. ऋषिका वर्मा
सम्पर्क : दर्शनशास्त्र विभाग
बिरला परिसर, एचएनबी गढ़वाल विश्वविद्यालय
श्रीनगर (गढ़वाल) उत्तराखंड - 246174
ईमेल : rishika.verma75@gmail.com
श्रीमद्भगवद्गीता का ज्ञान: समस्त समस्याओं का एक समाधान
जीवन जीने की दिव्यतम-भव्यतम कल्पना का साकार रूप ही श्रीमद्भगवद्गीता है। जीवन की ऐसी कोई समस्या नहीं जिसका समाधान गीता से न प्राप्त किया जा सके। गीता अर्जुन के समक्ष अवश्य गायी गई लेकिन केवल अर्जुन के लिए नहीं गायी गई। भगवान श्रीकृष्ण ने गायी ताकि हम जीवन में समत्व को धारण करते हुए लाभ-हानि में, सुख-दुःख में और सम-विषम परिस्थितियों में आनंदपूर्वक जी सकें।
वर्तमान समय में मनुष्य जीवन की बहुत सारी समस्याओं से पीड़ित है। मनुष्य केवल अभाव से दुःखी नहीं है अपितु अपने स्वभाव से दुःखी है। वो दुःखी है, खिन्न है, विषादग्रस्त है लेकिन इन सबके पीछे के कारणों से भी अनभिज्ञ है। गीता रोग भी बताती है, औषधि भी बताती है और मानव मन का उपचार भी करती है। हमारे जीवन का विषाद, प्रसाद बन जाये यही तो गीता जी के आश्रय का फल है। भगवद्गीता, भारतीय दर्शन, आध्यात्म और जीवन जीने की कला का एक महत्वपूर्ण ग्रंथ है। यह महाभारत के भीष्मपर्व के अंतर्गत आता है और भगवान श्रीकृष्ण और अर्जुन के संवाद का संकलन है। गीता न केवल धार्मिक ग्रंथ है, बल्कि यह मानव जीवन के गूढ़ रहस्यों को उजागर करती है और जीवन में आने वाली समस्याओं के समाधान का मार्ग दिखाती है भगवद्गीता को जीवन का दिशा-निर्देश माना जाता है। यह कर्म, ज्ञान, और भक्ति के माध्यम से जीवन के उद्देश्य को समझने में मदद करती है। गीता यह सिखाती है कि व्यक्ति को अपने कर्तव्यों का पालन निष्काम भाव से करना चाहिए, अर्थात् फल की चिंता किए बिना कार्य करना चाहिए। गीता का सबसे प्रसिद्ध श्लोक "कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन" यह सिखाता है कि व्यक्ति का अधिकार केवल कर्म पर है, उसके परिणाम पर नहीं। यह संदेश हर परिस्थिति में मन को शांत रखने और संघर्षों का सामना करने की प्रेरणा देता है। गीता धर्म और अधर्म के बीच का अंतर समझाती है। यह बताती है कि धर्म केवल पूजा-पाठ तक सीमित नहीं है, बल्कि अपने कर्तव्यों का ईमानदारी से पालन करना, सत्य और न्याय का साथ देना भी धर्म है। अर्जुन के माध्यम से गीता यह स्पष्ट करती है कि अपने धर्म और कर्तव्य से विमुख होना जीवन का उद्देश्य नहीं हो सकता। आधुनिक जीवन की तनावपूर्ण परिस्थितियों में भगवद्गीता मानसिक शांति प्रदान करने का मार्ग दिखाती है। इसमें ध्यान (ध्यानयोग) और आत्मनिरीक्षण के महत्व को बताया गया है। यह व्यक्ति को अपने अंदर झांकने और आत्मज्ञान प्राप्त करने में सहायक है। गीता में भक्ति को जीवन का आधार बताया गया है। भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं कि जो व्यक्ति ईश्वर पर पूर्ण विश्वास और समर्पण करता है, उसे किसी प्रकार का भय या चिंता नहीं होती। भक्ति न केवल मन को शांत करती है, बल्कि ईश्वर के साथ व्यक्ति के संबंध को भी प्रगाढ़ बनाती है। भगवद्गीता न तो किसी विशेष धर्म से बंधी है, न ही किसी जाति, वर्ग या समाज के लिए आरक्षित है। इसमें दिए गए सिद्धांत सार्वभौमिक हैं और हर युग, हर समय और हर व्यक्ति के लिए प्रासंगिक हैं। यह आत्मा की अमरता, पुनर्जन्म, और जीवन के चक्र को समझाती है। गीता यह स्पष्ट करती है कि शरीर नश्वर है, लेकिन आत्मा अमर है। आत्मा कभी मरती नहीं, बल्कि केवल शरीर रूपी वस्त्र को बदलती है। यह सिद्धांत जीवन और मृत्यु के भय को समाप्त करता है और व्यक्ति को सच्चे आत्मज्ञान की ओर प्रेरित करता है। गीता में दिए गए सिद्धांत आज के समय में प्रबंधन और नेतृत्व के लिए भी प्रेरण देते हैं। यह बताती है कि एक नेता को निष्पक्ष, निःस्वार्थ और आत्मविश्वासी होना चाहिए। एक अच्छा प्रबंधक वही है जो टीम के हितों को अपने व्यक्तिगत स्वार्थ से ऊपर रखे। आधुनिक युग में जब लोग तनाव, असंतोष, और भटकाव का सामना कर रहे हैं, गीता उनके लिए एक दीपस्तंभ की तरह है। यह आत्मा, मन, और शरीर के बीच के संबंध को समझाती है और जीवन को संतुलित बनाने के लिए प्रेरित करती है। गीता केवल एक धार्मिक ग्रंथ नहीं है; यह एक ऐसा शास्त्र है जो जीवन के हर पहलू पर गहन विचार प्रस्तुत करता है। यह दर्शन, मनोविज्ञान, समाजशास्त्र, और प्रबंधन के क्षेत्रों में अद्वितीय योगदान देता है।
भगवद्गीता केवल एक पुस्तक नहीं है, बल्कि यह जीवन का दर्शन है। यह हमें सिखाती है कि जीवन के कठिनतम समय में भी हमें अपने कर्तव्यों का पालन करते हुए सच्चाई और धर्म का मार्ग नहीं छोड़ना चाहिए। यह आत्मविश्वास, मानसिक शांति, और आध्यात्मिक उन्नति का अद्भुत स्रोत है। गीता का महत्त्व हर काल और युग में अटल है और यह मानव जीवन को नई दिशा देने की क्षमता रखती है।
राजेश कुमार सिन्हा
सम्पर्क : फ्लैट नंबर 5, सुखदाई सी एच एस, नेक्स्ट टू एच डी एफ सी बैंक, खार (वेस्ट), मुंबई 52
ईमेल : sinharajeshmumbai@gmail.com
क्या काव्य सौंदर्य के बिना कविता हो सकती है?
यदि कविता की परिभाषा करनी हो तो हम अक्सर ऐसा कहते हैं कि यह साहित्य की वह विधा है जो मानवीय भावनाओं, विचारों और अनुभूतियों को लय, छंद और अलंकारों के माध्यम से अभिव्यक्त करती है। यह विधा केवल शब्दों का सौंदर्य नहीं है, बल्कि उसमें निहित संवेदनशीलता, गहराई और कल्पनाशीलता का भी अद्भुत समावेश होता है। काव्य का सौंदर्य उसकी भाषा, शैली, भावों की अभिव्यक्ति और अलंकारों के प्रयोग से प्रकट होता।दर असल काव्य सौंदर्य वह गुण है जो कविता को पाठक या श्रोता के हृदय में गहराई तक पहुंचाने में सक्षम बनाता है। यह सौंदर्य कई कारकों पर निर्भर करता है, जैसे भावों की गहनता, भाषा की कोमलता, छंद और अलंकारों का प्रयोग, और विचारों की मौलिकता। इस चर्चा पर आगे बढ़ने से पहले हम काव्य सौंदर्य के प्रमुख तत्वों पर एक नजर डालते हैं। इसका पहला तत्व होता है "भाव सौंदर्य" अर्थात "भाव" जो कविता का प्राण होता है। कवि अपनी संवेदनाओं और विचारों को जिस गहराई और सजीवता के साथ प्रस्तुत करता है, वह कविता के भाव सौंदर्य को दर्शाता है। यह सौंदर्य पाठक या श्रोता के हृदय में करुणा, प्रेम, वीरता, या शांति जैसे भाव उत्पन्न करता है।
सूरदास की रचनाओं में भाव सौंदर्य का अनुपम उदाहरण मिलता है:
"मैया मोहि दाऊ बहुत खिझायो।
मोसों कहत मोल कौ लीन्हौ, तू जसुमति क्यों नहिं गायो?"
यहां बालकृष्ण की सरलता और बाल सुलभता इन पंक्तियों के भाव सौंदर्य को प्रकट करती है।
दूसरा होता है "शब्द सौंदर्य"अर्थात शब्दों का चयन, उनका क्रम, और उनमें निहित लय कविता के शब्द सौंदर्य को बढ़ाते हैं। ऐसा देखा गया है कि सरल, प्रभावी और मधुर शब्द कविता के सौंदर्य को कई गुना बढ़ा देते हैं।जयशंकर प्रसाद के काव्य में शब्द सौंदर्य का अद्भुत उदाहरण मिलता है:
"अरुण यह मधुमय देश हमारा,
जहां पहुंच अनजान क्षितिज को मिलता एक सहारा।"
यहां शब्दों का चयन और उनकी लय पाठकों को एक अद्भुत आनंद प्रदान करती है।तीसरा होता है लय और छंद का सौंदर्य। अर्थात ऐसा कहने में कोई संकोच नहीं होना चाहिए कि कविता की लय और छंद उसकी आत्मा है। छंदबद्ध कविता में लयबद्धता पाठक या श्रोता को सहज ही आकर्षित करती है। भारतीय काव्य शास्त्र में विभिन्न छंदों का प्रयोग कविता को एक विशिष्ट सौंदर्य प्रदान करता है। जैसे महाकवि कालिदास की रचनाओं में में छंद का सौंदर्य स्पष्ट झलकता है। ‘ऋतुसंहार’ और ‘मेघदूत’ में उनके छंदों की लय पाठकों को मुग्ध कर देती है।
ऐसे ही "अलंकार" काव्य को अलंकृत करते हैं और उसे अधिक आकर्षक और प्रभावशाली बनाते हैं। अलंकार मुख्यतः दो प्रकार के होते हैं:
. शब्दालंकार (जैसे अनुप्रास, यमक)अर्थालंकार (जैसे उपमा, रूपक, अतिशयोक्ति)
तुलसीदास के काव्य में उपमा अलंकार का सुंदर उपयोग हुआ है:
"कविन के कवि वाल्मीकि भये।
राम चरित कृपि बाड़ी रचे।"
प्रकृति चित्रण का सौंदर्य भी अपनी अलग अहमियत रखता है। बेशक,प्रकृति चित्रण काव्य सौंदर्य का एक महत्वपूर्ण पक्ष है। कवि अपनी कल्पनाशीलता से प्रकृति के विभिन्न रूपों को सजीव कर देता है।
जयशंकर प्रसाद की कविता ‘कामायनी’ में प्रकृति का अद्भुत चित्रण मिलता है:
"हिमगिरि के उत्तुंग शिखर पर, बैठ शिला की शीतल छांह।
एक पुरुष, भीगे नयनों से, देख रहा था प्रलय प्रवाह।"कविता का सौंदर्य उसके मानवीय संवेदनाओं के चित्रण में भी निहित होता है। चाहे वह प्रेम हो, करुणा हो, या फिर देशभक्ति, कविता इन्हें सजीव रूप में प्रस्तुत करती है।
सुभद्राकुमारी चौहान की कविता ‘झांसी की रानी’ में वीरता का चित्रण बखूबी देखा जा सकता है।
"खूब लड़ी मर्दानी वह तो झांसी वाली रानी थी"। इसमें कोई दो राय नहीं है कि कवि की कल्पना कविता में एक विशेष प्रकार का सौंदर्य भर देती है। यह कल्पना कवि के अनुभूति संसार का विस्तार करती है।
कालिदास के ‘मेघदूत’ में कल्पनाशीलता का सौंदर्य देखते ही बनता है।
भारतीय काव्यशास्त्र में रस, ध्वनि, और अलंकार काव्य सौंदर्य के प्रमुख घटक माने गए हैं।रस सिद्धांत के अनुसार, कविता का उद्देश्य पाठकों या श्रोताओं में रस उत्पन्न करना है।
आचार्य आनंदवर्धन ने काव्य में ध्वनि को महत्वपूर्ण स्थान दिया है। भरत मुनि और अन्य आचार्यों ने अलंकारों को काव्य का श्रृंगार माना है।पश्चिमी काव्यशास्त्र में सौंदर्यबोध, सौंदर्यानुभूति, और सामंजस्य काव्य सौंदर्य के मुख्य तत्व माने गए हैं। अरस्तू के अनुसार, कविता में त्रासदी और करुणा का चित्रण पाठकों को मोहित करता है।
कविता का काव्य सौंदर्य एक ऐसा विषय है जो हर युग, हर समाज और हर संवेदनशील हृदय को प्रेरित करता है। यह सौंदर्य शब्दों, भावों, छंदों, अलंकारों, और कल्पना के समन्वय से उत्पन्न होता है। कविता का यह सौंदर्य न केवल आनंद का अनुभव कराता है, बल्कि जीवन को समझने और उसे जीने की प्रेरणा भी देता है।इस प्रकार, काव्य सौंदर्य साहित्य का वह अनमोल पक्ष है जो हमें मानवीय संवेदनाओं, प्रकृति, और भावनाओं की गहराइयों से परिचित कराता है। ऐसे में एक सवाल यह उत्पन्न होता है कि क्या काव्य सौंदर्य के बिना कविता का सृजन हो सकता है?
ऐसा माना जाता है कि कविता का उद्देश्य भावनाओं और विचारों को अभिव्यक्त करना है। परंपरागत रूप से यह भी स्वीकार किया जाता है कि जाता है कि कविता में काव्य सौंदर्य का होना अनिवार्य है, क्योंकि यह कविता को प्रभावशाली और आकर्षक बनाता है। लेकिन आधुनिक साहित्यिक दृष्टिकोण में यह प्रश्न उठता है कि क्या काव्य सौंदर्य के बिना भी कविता लिखी जा सकती है?
काव्य सौंदर्य कविता की आत्मा माना जाता है। यह कविता को भावप्रवण और मधुर बनाता है। यह कविता में भावनाओं और संवेदनाओं को गहराई से प्रकट करता है ।सुंदर शब्द, लय, और अलंकार कविता को पाठक के लिए और रोचक बनाते हैं।
यह भी कहा जाता है कि काव्य सौंदर्य कविता के माध्यम से पाठक को प्रेरणा और सांस्कृतिक मूल्य प्रदान करता है।
लेकिन यह भी सच है कि काव्य सौंदर्य की परंपरागत धारणा के बिना भी कविता लिखी जा सकती है। अब अगर ऐसी कविता लिखी जाती है तो वह कैसी होगी?
कविता का एक उद्देश्य विचारों को व्यक्त करना होता है। कभी-कभी कवि केवल अपने विचार, दर्शन, या सत्य को सीधे और स्पष्ट रूप से प्रस्तुत करना चाहता है। इसमें अलंकार, लय, और छंद का कम या कोई उपयोग नहीं होता है मसलन
अज्ञेय और मुक्तिबोध की प्रगतिशील कविताएं, जैसे:
"मैं अपनी छोटी-सी दुनिया में,
चुपचाप सोचता हूं—
क्या मैं सच में आज़ाद हूं?"
कई बार कवि समाज की कठोर सच्चाई को व्यक्त करना चाहता है। ऐसी कविताओं में सौंदर्य का स्थान यथार्थ को सटीक रूप से प्रस्तुत करना होता है।
निर्मल वर्मा और नागार्जुन की कविताएं इसी श्रेणी में आती हैं।
"यहां भूख है, पानी नहीं,
सपनों के घर ढह गए।"
आधुनिक कवि जटिलता और अलंकारों से दूर, सरल और सपाट भाषा का उपयोग करते हैं। इन कविताओं का उद्देश्य गहन विचार व्यक्त करना होता है, न कि सौंदर्य का सृजन। इसके उदाहरण में शमशेर बहादुर सिंह की कविताओं को रखा जा सकता है।
"हर कोने में,
सन्नाटा है।
सन्नाटे में,
सवाल है।"नई कविता आंदोलन में कवियों ने काव्य सौंदर्य के पारंपरिक नियमों को तोड़ा है। उन्होंने कविता को प्रयोगों का माध्यम बनाया, जहां सौंदर्य के स्थान पर विचार और अनुभूति का महत्व था। इसका सबसे सटीक उदाहरण हैं मुक्तिबोध की कविताएं:
"अंधेरे में,
भागता हुआ आदमी,
अपने ही पांवों की परछाई से डरता है।"कविता कई बार विद्रोह या विरोध का माध्यम बनती है। इसमें शब्दों की कड़वाहट और सच्चाई कविता का मुख्य उद्देश्य होती है। काव्य सौंदर्य की अपेक्षा ऐसी कविताएं भावनाओं और आक्रोश को व्यक्त करती हैं।दुष्यंत कुमार की रचनाएं इसी श्रेणी में आती हैं।
"हो गई है पीर पर्वत-सी,
पिघलनी चाहिए। यह भी सच है कि कई बार काव्य सौंदर्य
को ध्यान में रखें बिना लिखी गई कविताएं यथार्थ को प्रभावी ढंग से व्यक्त कर देती हैं।काव्य सौंदर्य के बिना कविता सच्चाई को सीधे और स्पष्ट रूप से कहने में सक्षम होती हैं। साथ ही ऐसी कविताएं आम भाषा में लिखी जाती हैं, जो पाठकों के एक बड़े वर्ग तक पहुंचती हैं। काव्य सौंदर्य के बिना कविताएं पाठकों का ध्यान सीधे सामाजिक और राजनीतिक मुद्दों पर ध्यान केंद्रित करती करने में अक्सर सफल होती हैं। कुछ विचारक ऐसा भी मानते हैं कि काव्य सौन्दर्य के बिना रचित कविता कई बार पाठकों को आकर्षित नहीं कर पाती। ऐसी कविताएं कभी-कभी केवल विचारों का सीधा प्रस्तुतीकरण बन जाती हैं, जिससे उनकी कलात्मकता कम हो जाती है।
ऐसा भी तर्क दिया जाता है कि काव्य सौंदर्य के बिना कविता में भावनात्मक अपील की कमी हो सकती है। बेशक,काव्य सौंदर्य कविता को प्रभावशाली और आकर्षक बनाता है, लेकिन यह कविता की अनिवार्यता नहीं है। कविता का मुख्य उद्देश्य भावनाओं, विचारों, और सत्य को व्यक्त करना है। काव्य सौंदर्य के बिना भी कविताएं लिखी जा सकती हैं, और वे समाज में अपनी विशेष भूमिका निभा सकती हैं। हालांकि, यह कहना भी गलत नहीं होगा कि काव्य सौंदर्य के साथ कविता अधिक प्रभावशाली और हृदय स्पर्शी बनती है पर काव्य सौंदर्य के बिना भी कविता संभव है और इन दिनों खूब लिखी और सराही जा रही है।
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समीक्षा
भावना शेखर
सम्पर्क : पटना, बिहार
ईमेल : bhavnashekhar8@gmail.com
एक नयी दुनिया के स्वप्न और संघर्ष का अद्भुत आख्यान
वरिष्ठ लेखक चिंतक निबंधकार शिवदयाल का उपन्यास "एक और दुनिया होती" जेपी के संपूर्ण क्रांति आंदोलन की पृष्ठभूमि में रचा गया युवा स्वप्नों और संघर्षों का अद्भुत आख्यान है।
कहानी समग्र परिवर्तन के आकांक्षी सजग छात्रों और युवाओं की है जो समाज में भूख, प्यास, गरीबी, अपमान झेलने वालों की मुक्ति का स्वप्न देखते हैं। ये वे छात्र हैं जिनका भविष्य अनिश्चित है और वर्तमान परिवार पर आश्रित, तथापि समाज को बदलने की उत्कट इच्छा लिए क्रांति का मार्ग चुनते हैं और आंदोलन में कूद पड़ते हैं। अमृत ऐसा ही नौजवान है, जिसके निस्वार्थ समर्पण से प्रेम जैसा सौम्य, शालीन, भीरू छात्र अप्रभावित न रह सका। अमृत को जानने के लिए वह विष चखने को उद्यत हुआ और उसे अपना आदर्श मानकर क्रांतिकारी संगठन में शामिल हो गया।
संगठन का मकसद है - भूमिहीनों को जमीन दिलाकर भू-शोषण का अंत करना, झुग्गीवासियों को शोषण से बचाकर नागरिक सुविधा उपलब्ध कराना, शहर में अश्लील पोस्टरों के खिलाफ प्रदर्शन, आदिवासियों के साथ -साथ मछुआरों-मल्लाहों की समस्या का समाधान, जातीय नरसंहार का प्रतिरोध, विकास के नाम पर सरकार द्वारा ग्रामीणों की भूमि के अधिग्रहण से उत्पन्न विस्थापन को रोकना आदि-आदि। इसके लिए धरने, आंदोलन, शिविर आयोजित किए जाते हैं ताकि आदर्श दुनिया रचने के ख्वाहिशमंद फौलादी हौसले वाले नए क्रांतिकारी तैयार किए जा सकें। इन्हीं शिविरों में कभी-कभी कोमल प्रेमिल भावनाएं भी जन्म लेती हैं, हौले-हौले कुछ प्रेम कहानियां पकती हैं। कथा नायक प्रेम और अपूर्वा इससे अछूते न रह पाए।
उनके भावी सहजीवन के बीज यहीं पनपे, यहीं कल्पना और शिशिर के मन जुड़े फिर विलग हुए। नायक प्रेम की अनुभूतियों के माध्यम से लेखक यहां के प्राकृतिक दृश्यों के रम्य चित्र उकेरता है पर जल्द ही रहवासियों के बिजली पानी तालाब पोखर से विहीन दारुण जीवन को देख उसके सौंदर्य बोध की अकाल मृत्यु हो जाती है।
कोई भी क्रांति बलिदान मांगती है, फिर भी दुनिया रचने की कंटकाकीर्ण राह पर अमृत और प्रेम जैसे नौजवान, अपूर्वा, शिप्रा और अर्चना जैसी ल़डकियां संघर्ष का आयुध लिए चल रही हैं। इसी युद्ध में बनवारी और राधेश्याम जैसों का हश्र पाठक को विचलित करता है। हालांकि पढ़ लिख कर ऊंची नौकरी, सुलभ सुगम जीवन के बरक्स क्रांति का मार्ग चुनने वाले युवाओं के हृदय में भी असमंजस होता है, वे भी मंथन करते हैं।
लेखक ने दो क्रांतिकारियों के वार्तालाप में छात्र आंदोलन के उद्देश्य और संभावित परिणामों की खूब चर्चा की है। क्या कभी वे एक नई दुनिया रच पाएंगे, या सिस्टम को नकारने में ही खत्म हो जाएंगे-
"हमारी हस्ती प्रतिकार करने की क्षमता तक है? हम रचेंगे कब? कब अपने ढंग की दुनिया गढ़ेंगे ?'
उपन्यास को पढ़ते हुए (उन्नीस सौ)सत्तर के दशक के छात्र आंदोलन का साक्षी बना पाठक क्रांतिकारी युवकों को बिखरते देखता है। प्रेम जैसे शांत, शालीन, पढ़ाकू युवक का संगठन से प्रभावित होकर जुड़ना किंतु बाद में इसी संगठन का टूट जाना नायक के लिए अत्यंत पीड़ा दायक है। एक और दुनिया रचने की उदात्त आकांक्षा व्यक्तित्व की टकराहटों, वैचारिक मतभेदों एवं बदलती राजनीतिक-आर्थिक परिस्थितियों के कारण दम तोड़ती नजर आती है।
उपन्यास की कथावस्तु में तत्कालीन राष्ट्रीय और वैश्विक घटनाओं के ताने-बाने की गझिन बुनावट है। भारत में 1857 के मुक्ति संग्राम से लेकर पश्चिम की औद्योगिक क्रांति और उपनिवेशवाद की चर्चा के अलावा पंजाब समझौता जिसमें संत हरचरण सिंह लोंगेवाला और राजीव गांधी ने दस्तखत किए थे, असम गण परिषद के साथ राजीव गांधी का संधि पत्र , दक्षिण में श्रीलंका की तमिल समस्या का विकराल रूप, श्रीलंका की सेना और तमिल विद्रोहियों के बीच भीषण संघर्ष, भारतीय शांति सेना का अवतरण, समान नागरिक संहिता, शाहबानो केस, राम जन्मभूमि- बाबरी मस्जिद की चर्चा, चंबल के बागियों का जेपी के सामने आत्मसमर्पण जैसी दर्ज़नों ख्यात-कुख्यात घटनाओं के सशक्त चित्र खींचे गए हैं। एक बानगी-
"नरसंहार का दृश्य.... वातावरण में चिरायंध.... आतंक और दहशत के भयावह चिह्न.....मरघट की नीरवता भय पैदा भले करती हो आतंकित नहीं करती....। "
लेखक ने नरसंहार के कारणों की पड़ताल करते हुए कहा है कि जातीय घृणा ही इसके मूल में नहीं, असली बात है राजनेताओं से प्रश्रित सामंतों/ माफियाओं के वर्चस्व को चुनौती और प्रभुत्व हरण का भय।
लेखक द्वारा कथानक में बड़ी कुशलता से राजनीतिक परिदृश्य का गुंफन किया गया है। पुस्तक पृष्ठ दर पृष्ठ उस कालखंड के पल-पल का साक्षात्कार कराती है।
बड़ी संख्या में शेखर, अर्चना, विनय, सुबोध, राधेश्याम, शिप्रा, कल्पना जैसे युवा जिस उद्दाम हौसले के साथ क्रांतिपथगामी हुए , जेपी क्रांति के बाद उस श्लथ- पथ पर चलने वाले मुट्ठी भर ही बच रहे। ट्रेड यूनियन आंदोलनों का पतन होने लगा, संगठन टूट गया, बिखरे हुए साथी चुनावी राजनीति में जा रहे हैं, पार्टी पॉलिटिक्स का हिस्सा बन रहे हैं, देख क्षुब्ध नायक कहता है-
"अपने चुके हुए बल से हम विपथगामी शक्तियों का मुकाबला करने वाले हैं। कार्यालय गया था..... इतना निराश हुआ कि क्या कहूं । लगता नहीं कि करोड़ों की आबादी वाला अपना यह देश उन पाँच हजार युवाओं को 'जगा' पायेगा जो जयप्रकाश को चाहिए थे।"
जेपी के नेतृत्व में तानाशाही के बीच जनता पार्टी का शासन लोकशाही की जीत थी किंतु इसके लिए भारी कीमत चुकानी पड़ी। लोकतंत्र की बहाली में जेपी के विशाल जन आंदोलन की ऊर्जा चुक गई। और फिर 1979 में इस महान सेनानी का प्रयाण क्रांतिकारियों का मनोबल तोड़ गया।
लेखक ने राम-रथयात्रा का राग और मंडल आयोग व आरक्षण की आग को प्रखरता से उपन्यास में दर्ज़ किया है। सोवियत संघ के विघटन के साथ लेनिन और स्टालिन की मूर्तियों का तोड़ा जाना मटियामेट होते कम्युनिज्म की तस्वीर पेश करता है।
उपन्यास में पात्रों के बीच संपर्क टूट जाने या शिथिल हो जाने पर पत्रों के द्वारा संवाद की महत्वपूर्ण भूमिका है। प्रेम को लिखे गए अपूर्वा के भावुक पत्रों में जहां जैनेंद्र कुमार, निर्मल वर्मा और रमेश बक्षी की किताबों का समीक्षात्मक उल्लेख है, वहीं प्रेम को लिखे गये क्रांतिकारी अमृत के लंबे पत्र में विभिन्न राजनीतिक प्रकरण, बदलती परिस्थितियों में क्रांति के बदलते स्वरूप, विवेकानंद के आत्म साक्षात्कार, गांधी के सत्य के प्रयोग और जेपी के मूल्यों की चर्चा उपन्यास को बौद्धिकता के उन्नत सोपान पर ले जाती है।
देश की सामाजिक-राजनीतिक संरचना के साथ-साथ लोगों की नीयत और चरित्र में भी बदलाव आ रहा था। निस्वार्थ और सच्चे समाजसेवी अमृत की बढ़ती लोकप्रियता से द्वेष और प्रतिद्वंद्वी संगठनों का क्षेत्र में वर्चस्व कायम करने की कोशिश तथा एनजीओ की बढ़ती पैठ और उनके द्वारा अमृत की हैसियत का इस्तेमाल करना - इन सबका परिणाम यह हुआ कि अमृत पर झूठे आरोप लगाए गए, उसके साथ धोखा किया गया। उसके उज्ज्वल चरित्र को कलंकित कर उसकी जीवन भर की तपस्या भंग कर दी गई। अमृत का ऐसा हश्र प्रेम के लिए अप्रत्याशित और दु:खद था। पर लेखक उपन्यास की सकारात्मक इतिश्री करते हैं। अभी भी समाज को अमृत जैसों की जरूरत है- कहकर पाठकों को आश्वस्ति का सूत्र पकड़ाते हैं।
उपन्यास के जटिल कथानक के कारण पाठक रस से आप्यायित नहीं होता किंतु अगणित घटनाओं, तथ्यों और प्रसंगों के सुव्यवस्थित समावेश से चमत्कृत अवश्य होता है। भाषा सुगठित, स्तरीय, प्रौढ़ और धीर-गंभीर है। कितने ही उद्धरण और वाक्यांश पाठक को उपन्यासकार के चिंतन और अभिव्यंजना का मुरीद बना देने वाले हैं। जैसे-
"क्या विचलन और फिसलन एक ही चीज है...."
"तब हम टाइप्ड होने को हीन दृष्टि से देखते थे लेकिन टाइप्ड होना भी कभी-कभी कितना जरूरी होता है..."
"यह जो सिस्टम है चमगादड़ की मानिंद उल्टा लटका हुआ, उसी को बनाए रखने का प्रबंध कौशल अपने में विकसित करो, ताकि सिस्टम बचा रहे, बस पढ़ाई यही तो है...."
"बदलाव की आंच को चूल्हे-चौके के गणित से कोई मतलब नहीं...."
"आंदोलनकारी के लिए परिवार सबसे कठिन परीक्षा है...."
"वह निस्पृहता की हद तक सरल थी कि उससे कभी-कभी डर-सा लगता था जैसे एकदम सफेद कपड़े को इस्तेमाल करते हुए लगता है..."
24 कैरेट सोने की तरह यह एक विशुद्ध गंभीर उपन्यास है बिल्कुल किसी यथार्थ क्रांति के मानचित्र सरीखा।
इसमें निपट मनोरंजन खोजने वाले पाठकों की गति संदिग्ध है क्योंकि यहां पढ़ने वाला आंदोलनकारियों के संघर्ष, क्रांति-यात्रा में आने वाली दुश्वारियों और यातनाओं का साक्षी बनते हुए लगातार तनाव भोगता है। आनंद के नाम पर शिविरों में पक रहे प्रेम-प्रसंगों, हास-परिहास, गीत-संगीत के बहाने लेखक रस की छिटपुट ही वर्षा कर पाते हैं। प्रेम और अपूर्वा के विवाह के बाद भी आनंदित करने वाले प्रसंग न के बराबर हैं। इस कारण उपन्यास कई जगह एकरसता का शिकार हो गया है। लगता है पाठक सरस साहित्य नहीं एक शुष्क शास्त्र पढ़ रहा है।
सोने में 2 कैरेट तांबा मिला देने से वह अधिक चमकता है। कथानक में कुछ नाटकीय प्रसंगों के माध्यम से श्रृंगार, हास्य जैसे रसों का समावेश पठनीयता को सुगम और रोचक बनाता।
विषय की मांग के अनुसार लेखक की भाषा में लालित्य कम पांडित्य अधिक है। पर निस्संदेह लेखक की भाषा पर पकड़, प्रसंगों की विश्वसनीयता, पात्रों का सटीक चरित्र चित्रण, सघन जीवन दृष्टि और वैचारिक संपन्नता पाठक को चकित करती है। यह उपन्यास वस्तुतः समाज बदलने और एक नई दुनिया रचने के उद्देश्य से क्रांति का मार्ग चुनने वाले जोशीले नौजवानों के लिए एक महत्वपूर्ण दस्तावेज है, क्रांति पथ पर आने वाले अवरोधों और संभावित भविष्य का आईना भी।
पुस्तक : एक और दुनिया होती
लेखक : शिवदयाल
विधा : उपन्यास
प्रकाशक : अनन्य प्रकाशन
पृष्ठ : 222
मूल्य : 250/-
डॉ. मधुबाला शुक्ल
सम्पर्क : मनिशापूर्ति, न्यू शास्त्री नगर,
अपोजिट सिद्धार्थ हॉस्पिटल, गोरेगांव (वेस्ट) मुंबई- 400401
ईमेल : madhuvshukla@gmail.com
नदी-रंग जैसी लड़की : नारी त्रासदी का मार्मिक दस्तावेज
‘नदी-रंग जैसी लड़की’ उपन्यास एस. आर. हरनोट का द्वितीय उपन्यास है। हरनोट जी हिंदी के प्रचार-प्रसार के लिए निरंतर कार्यरत रहते हैं। साथ ही कई संस्थानों से जुड़कर संस्कृति, पर्यावरण के क्षेत्र में सक्रिय भूमिका निभा रहे हैं। प्रकृति की गोद में बसे हरनोट जी की अधिकांश रचनाएँ पर्यावरण एवं प्रकृति से संबंधित है। उनके अनुसार मनुष्य को जो कुछ भी प्राप्त हुआ है, वह प्रकृति के कारण ही।
इस उपन्यास की कहानी, नदी के संघर्ष के साथ-साथ एक स्त्री के संघर्ष की भी कहानी है जो समानांतर रूप से चलती रहती है। उपन्यास की मुख्य पात्र सुनमा देई के संघर्ष की शुरूआत माँ के गर्भ से ही आरंभ हो जाती है, जो बाल्यवस्था से लेकर वृद्धावस्था तक निरंतर बनी रहती है। संघर्ष उस नदी का भी है, जो न जाने कितने युगों से बहती चली आ रही है परंतु लोगों को पाप मुक्त करते-करते वह स्वयं सूखती जा रही है, समाप्त होती जा रही है। आने वाले युग में शायद उसका कोई नामोनिशान न रहे, सिर्फ किताबों में छायाचित्रों तक ही सीमित होकर रह जाय।
उपन्यास की शुरूआत सन १८५७ के पहले से शुरू होती है। किस तरह अंग्रेजों के साए में जी रहे रियासती राजाओं ने अपनी प्रजा के ऊपर जुल्म किये और जनता विद्रोह कर उठी। उस दौरान लोगों से बेगार ली जाती, मालगुजारी की ज़्यादतियाँ होतीं, लोगों की समस्याओं को अनसुना किया जाता और जो मुखर होता उसे तरह-तरह की यातनाएँ दी जातीं थीं। राजा को ब्रिटिश प्रशासन का पूरा समर्थन था इसीलिए उसने अपनी रियासत के लोगों पर करों का भारी बोझ डाल दिया था। वर्ष में प्रत्येक घर से छह महीने तक की बेगार ली जाती थी। सुविधाओं के नाम पर न कोई स्कूल था, न अस्पताल और न ही कोई सुनवाई होती थी। १५ अप्रैल, १९४८ को जब हिमाचल प्रदेश अस्तित्व में आया तो अन्य रियासतों के साथ उस आततायी राजा का निरंकुश शासन भी जाता रहा।
सुनमा देई, उपन्यास की मुख्य और महत्त्वपूर्ण पात्र हैं। उनका विवाह गर्भ में ही तय हो गया था। उनके पिता मास्टर भागदत स्वतन्त्रता सेनानी थे, जिन्होंने पहाड़ों के प्रजामण्डल आन्दोलनों में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। सुनमा के ससुर भी स्वतन्त्रता सेनानी थे। उनका नाम देवीदत वज़ीर था। प्रजामण्डल में दोनों की भूमिकाएँ अच्छी-खासी थी और इसी कारण वे दोनों एक दूसरे के जिगरी दोस्त बन गये और बाद में यह दोस्ती रिश्तेदारी में बदल गईं। हालाँकि दोनों के परिवार बहुत ज्यादा संपन्न नहीं थे फिर भी परहित उनमें कूट-कूटकर भरा था। उन दोनों की पत्नियाँ ज़मीन का सारा काम स्वयं देखती-सँभालती थीं। खेत, मजदूर और औरतें पहले भी अपने पारिवारिक अर्थ तंत्र की रीढ़ हुआ करती थी।
जब मास्टर भागदत के यहाँ बेटी हुई तो उसका नाम सुनमा देई रखा गया। उन दिनों नामकरण पण्डित लोग ही किया करते थे लेकिन कुण्डलियाँ बनाने का सौभाग्य लड़कियों को हासिल नहीं था... जैसे न उनका कोई भाग्य हो और न ही माथे व हाथों में कोई लकीरें हो। बस नामकरण हुआ तो सौ सुख। उन्हें स्कूल भी नहीं भेजा जाता था। स्कूल होते भी बहुत दूर थे, जहाँ लड़कियों को भेजना मुमकिन न होता। ससुराल ही उनकी नसीब और नियति होती। जहाँ घर-आँगन, लोग-बाग, परिवेश, चूल्हा-चौका और पशु-पक्षी तक पराया होते हुए भी अपने होते। यहाँ तक उन्हें नाम भी ससुराल वालों की पसन्द का मिलता। जैसे उनका अपना कुछ भी नहीं, न पहचान, न अस्तित्व। सुनमा या उस जैसी अनेक बेटियों के मन में ऐसे अनेक प्रश्नों का उठना स्वाभाविक था पर उनका जुबान तक आना दुष्कर होता, जहाँ परम्पराओं की दीवारें उन्हें रोक देती….। सभी धार्मिक सिद्धांत व मान्यताएँ पुरुष निर्मित है, अतः उनके अनुकूल है। स्त्री को आरंभ से ही उन सिद्धांतों की घुट्टी पिलाई जाती है। यदि वह न मानना चाहे, तो भी यह सब मानने पर, उसे विवश किया जाता है।
पितृ सत्तात्मक समाज व्यवस्था पुरूषों द्वारा निर्मित है, अतः इसके सारे कायदे-कानून पुरुष हित में हैं। स्त्री को सर्वथा अपनी सुविधा के अनुरूप साँचे में ढालने का प्रयास सदैव किया गया है और वह करती भी गई किंतु जब उसे अपनी स्थिति का एहसास हुआ तब वह मुक्ति के लिए छटपटाने लगी। पुरुष ने अलग-अलग समय में अलग-अलग प्रकार की गुलामी की बेड़ियाँ उसके पाँव में डाली। इस प्रकार क्रमशः पुरुष शासक बनता गया और स्त्री शासित के रूप में स्थापित होती चली गई। जब स्त्री ने अत्याचार के खिलाफ आवाज उठाई तब भी यही कहा गया कि स्थिति को बढ़ा-चढ़ा कर बताया जा रहा है।
सुनमा का बालपन न तो बहुत सहज था और न ही ज़्यादा दुरूह। वह लड़कियों का ज़माना भी नहीं था। उन्हें लडकों की तरह प्रधानता भी नहीं दी जाती थी। खासकर उनका पालन-पोषण दूसरों के घर की अमानत समझकर ही किया जाता था। वे बेटियाँ कम और पराया धन अधिक होतीं। मूलतः तुलसी-पीपल के विवाह जैसी... जब चाहा ब्याह दिया। इसमें न तो उनकी पसन्द-नापसन्द होती और न ही रजामन्दी। उम्र के भी कोई मायने नहीं थे न ही उन दिनों कोई ऐसा कानून था जो बाल-विवाह पर अंकुश लगा सके। बहुत से रिश्ते तो पेट में बच्चा होने पर ही तय कर लिए जाते थे, जैसे सुनमा देई का हुआ था।
पितृ सत्तात्मक समाज व्यवस्था में लड़की को अपने पति के घर जाना पड़ता है, अतः लड़की को पराया धन समझा जाता है। ऐसे में यह माना जाता है कि उसके लालन-पालन और शिक्षा पर खर्च करना व्यर्थ है, क्योंकि वह तो किसी और के घर जाएगी। उसका उचित लालन-पालन भी नहीं किया जाता तथा बचपन से ही उससे अनेक प्रकार के काम लिए जाते हैं। स्त्री की द्वितीयक स्थिति हर क्षेत्र में है, उसे हर जगह समझौता करने पर विवश किया जाता है। परंपरा ने उसे स्वास्थ्य, शिक्षा, राजनीतिक स्वतंत्रता और राजनीतिक भागीदारी और यहाँ तक की व्यक्ति बोध जैसे मूल अधिकारों से वंचित रखा है।
सुनमा देई और बालकराम के ब्याह को दोनों ही परिवारों ने आपसी रजामन्दी से एक बड़े परमार्थ में बदल दिया। ज़रूरतमन्दों और गरीब परिवारों को अपने-अपने सामर्थ्य के मुताबिक कपड़े और अनाज बाँटे। बारात के साथ जाने के लिए पारम्परिक बजतरियों की मण्डली आमन्त्रित की गयी थी। इनमें नगाड़ा, ढोल, शहनाई, चंबी, गुजू, करनाल और नरसिंगा के पारंगत कलाकार मौजूद थे। लोक-वादकों का यह दल, उसी परगने के देवता का बजंतर था, जिसके लिए देवता से विशेष स्वीकृति ली गयी थी जिसमें पहाड़ी संगीत विशेषकर नाटी जैसे बहुप्रिय व प्रचलित लोक-नृत्य के गायक व लोक-वादक भी शामिल थे। वर्तमान समय में तो लोकगीत और लोकनृत्य लगभग समाप्त ही हो गया हैं। इनका स्थान अब पश्चिमी गीत-संगीतों ने ले लिया है, जो कोलाहल के सिवाय कुछ नहीं है।
इस विवाह के आयोजन की दीप्ति और बेहिसाब रौनक के बीच सुनमा देई मन से केवल सुनमा ही थी। जहाँ एक दुःख अपने छोटे से अतीत को खोने का था और दूसरी तरफ ससुराल वालों का सुख, एक बेटी, बहू और पत्नी पाने का। इन सुखों और दुःखों में सुनमा का विस्थापन बहुत बड़ा था। मायके में जो स्वाधीनता, उन्मुक्ति और स्वातन्त्र्य मयस्सर था ससुराल में उसका पराधीनता में तब्दील होना स्वाभाविक था। यह खुद का खुद से ही एक ऐसा विकट द्वन्द्व है, जिसका प्रतिस्थापन हर एक स्त्री को स्वतः ही करना होता है। बिछोह और अपनी जड़ों से विलगाव का दर्द एक स्त्री के लिए असहनीय होता है, जिसकी कहीं कोई परिभाषा नहीं होती और न ही उसे किन्हीं शब्दों में अभिव्यंजित किया जा सकता है।
सदियों से चली आ रही समाज की परिपाटियों और रीति-रिवाज़ों में अनुबन्धित, स्त्री का अतीत इतना दबा और सहमा रहा कि ये उनकी नस-नस में समाता चला गया। स्त्री अपनी स्थिति बदलना चाहती है, जीवन में कुछ करना चाहती है, तो उसका निर्भय होना अत्यंत आवश्यक है। आज की स्त्री से यह अपेक्षा की जाती है कि वह भयमुक्त होकर जीवन पथ पर आगे की ओर चलती जाए। सबसे अच्छा है कि स्त्री निर्भय हो जाए, लोग क्या कहेंगे इससे वह मुक्त हो जाए। घर वाले नाराज होंगे, दुखी होंगे, बवंडर होगा इन खयालों से वह निजात पा ले।
ससुराल भी एक ऐसा रंगमंच है, जहाँ जितनी कुशलता से अभिनय किया जायेगा, उतनी ही तालियाँ और शाबाशियाँ स्त्रियों के झोलियों में आती हैं। अपने माँ-बाप, घर-आँगन और बालपन को त्यागकर, यह सब एक स्वांग ही तो है, जिसमें उनका मन कहीं नहीं होता, बस संस्कारित व्यवहार, आचरण, बर्ताव और शील की महिमा ही होतीं है। जहाँ भीतर के स्थायी बिछोह, विलगन और विस्थापन के कोई मायने नहीं रह जाते और ताउम्र इसकी कोई भरपाई भी नहीं हो पाती है। यही सदियों-सदियों से चली आ रही रीतियाँ और रिवाज़ें हैं जिनमें बेटियाँ हँसी और आँसुओं के विलक्षण समन्वय से एक नयी और खूबसूरत दुनिया रच लेती हैं, बसा लेती हैं और जी लेती हैं।
सुनमा के पाँच बेटियाँ हुई जिनमें चार बेटियों का विवाह उसने और बालकराम ने धूमधाम से किया। बेटा न होने का गम उन्हें सालता रहा। सुनमा अपने माता-पिता की अकेली संतान थी, कोई भाई न था जिसकी वजह से उसके माता-पिता को बहुत चिंता रहती कि उन्हें मुखाग्नि देने वाला कोई नहीं है, उन्हें बैकुंठ की प्राप्ति कैसी होगी...? मोक्ष कैसे मिलेगा...? आज वही मन: दशा सुनमा के यहाँ भी थी। जिस तरह उसके पिता ने पुत्र होने के लिए धर्मकांड करवाये थे सुनमा ने भी पुत्र प्राप्ति के लिए जिसने जो कहा, वह किया, लेकिन ईश्वर के समक्ष उसे हार मानना पड़ा।
सुनमा के जीवन में अस्थिरता तब उत्त्पन्न होती है, जब उसके पति बालकराम की मृत्यु के दो दिन बाद मृत शरीर को घर लाया जाता है, जहाँ पर औरतें पहले से ही सुनमा के घर पहुँचकर उसको ढाढ़स बंधा रही थी। एक वक़्त ऐसा था कि गाँव में छोटी-सी-छोटी घटना घटती थी तो पूरा का पूरा गाँव, उस व्यक्ति के घर एकत्रित हो जाता था, जिसके घर में कुछ घटित हुआ हो, परंतु वर्तमान परिदृश्य इतना बदल चुका है कि ऐसा लगता है, मानवता महज नाम के लिए रह गई हो।
अपने पति के मृत शरीर को देखकर सुनमा टूट जाती है, उसे लगता है कि आने वाला जीवन वह कैसे काटेगी। एकाएक उसे आभास होता है, जैसे बालकराम उसके कानों में कुछ कह रहा हो- “सुनो, सुनमा तुम्हें अकेले-अकेले ही इसी बाहर-भीतर में अभिनय करना है... मंचन करना है... यही दुनियादारी है... सुनमा, बस यह ध्यान रखना... कभी अपने को टूटने मत देना ये दुनिया अवसर देखती है... सम्भावनाएँ तलाशती है... मजबूरियाँ परखती है... उनसे विचित्र खेल खेलती है... तरह-तरह के प्रलोभनों और बनावटी संवेदनाओं के मायाजाल में उलझाती है.... अकेली स्त्री के लिए यह सब और भी कठिन है... हर तरफ उसे फाँसने के लिए विभिन्न मुद्राओं, मुखौटों और रिश्तों में आखेटक तैयार हैं... सभी के हाथों में तरह-तरह के जाल मौजूद हैं... इन सभी के मध्य और बचाव करते हुए तुम्हें जीना है... इनकी चौकसी हम अपनी दृढ़ता से कर सकते हैं... मजबूत इरादों से कर सकते हैं... मैं जानता हूँ तुम सक्षम हो... तुम में वह सबकुछ है... तुम्हें बहुत लम्बा जीवन जीना है... उठो.... जागो...एक नयी शुरुआत का शुभारम्भ करो सुनमा।"१
सुनमा अपने पति बालकराम को, दुल्हे की तरह सजाकर और स्वयं दुल्हन की तरह सजकर अंतिम यात्रा पर ले जाना चाहती थी, जिस तरह बालकराम उसे दुल्हन की तरह अपने गाँव लाया था। परंतु यह संभव न था, उसे पता था कि जो समाज हमेशा अन्ध-आस्थाओं और रूढियों की परवरिश में पला-बढ़ा हो... जिसकी बहूसंस्कारित परिपाटियाँ हमेशा से कभी भी स्त्रियों के अनुकूल या हित साधक न रही हो... उस जीते-जागते समाज के समक्ष क्या यह सब सम्भव हो पायेगा? परन्तु उसे यह सम्भव करना होगा... पहले भी तो स्त्रियों ने बहुत सी दुर्लभताओं को अवसरों में बदला था... अनेक सम्भावनाएँ और प्रारम्भ उपजाये थे... उस समय न सही, बाद में इतिहास ने उन्हें सम्मान तो दिया ही। तो वो क्यों न, समाज की परंपराओं को, समाज के नियमों को, जो सिर्फ और सिर्फ स्त्रियों के लिए बनाए गए हैं, उन्हें तोड़कर एक नए समाज की आधारशिला रखे।
वह जानती थी कि वह इतना कोई महान काम करने नहीं जा रही थी, परन्तु जिस समाज के भीतर वह पली-बढ़ी थी, जिस वर्तमान में जी रही थी, वह विषम रूढ़ियों से घिरा था जिसका नज़रिया लड़कियों और औरतों विशेषकर विधवाओं के प्रति बहुत निर्दयी, घृणित और अपकरुण था... परन्तु वह अपने बालकराम की अंतिम इच्छा कैसे टाल सकती थी... दुनिया क्या कहेगी, इसका उसे कोई रंज नहीं.. जीना उसे था...। समाज किसी को कुछ नहीं देता... वह हमेशा दोहरी भूमिका में होता है... तमाशबीन भी और बनावटी हमदर्द भी... सहायक भी और अदृश्य आततायी भी...। पितृसत्तात्मक समाज व्यवस्था ने स्त्री को घर में केंद्रित रखना चाहा, धर्म ग्रंथो में भी इस बात का समर्थन प्राप्त है। धर्म ग्रंथो के रचयिता भी पुरुष है, स्त्रियों का क्षेत्र सीमित रखा गया, उन्हें शिक्षा से भी वंचित रखा गया, ताकि वह सहजता से दासता स्वीकार कर ले।
जब उसने दुल्हन का जोड़ा पहनकर आँगन में प्रवेश किया, तो लोग इस अनूठे असमाजिक, अपसंस्कारित और अधर्मी कृत्य को देखकर दंग और स्तब्ध रह गये। किसी की कुछ समझ नहीं आ रहा था कि यह हो क्या रहा था...? कोई जब लाश बाँधने नहीं आया तो सुनमा ने बेटियों को इशारा किया और वे मिल कर लाश को लपेटने लग गयीं... तभी कुछ परिजनों ने पहल की और पारम्परिक तरीके से लाश को बाँधा। अब अर्थी को उठाना था... लोगों के मन में अनेक प्रश्न थे जिनके उत्तर शायद वे अभी चाहते थे... उन्हें, ये सब देखकर सुनमा की वेदनाओं से ज़्यादा, उसके इस अजीब अधर्मपने, अनमारगपर अफ़सोस हो रहा था परन्तु कोई कुछ भी पूछने की स्थिति में न था, न ही हिम्मत जुटा पा रहा था...तभी एक बुजुर्ग पण्डित उठे, आँगन में रखी अपनी लाठी उठायी, बूट पहनकर चल दिये। एकाएक सभी लोग उसके पीछे चलने को मुड़े ही थे कि सुनमा की बहुत विनम्र और रूंधी आवाज़ उनके कानों में पड़ी....
"रुको दादा! जाने से पहले मेरे मन की स्थिति या मेरा पक्ष भी सुनते जाओ। न भला लगे लौटना मत, पर यह भी न समझना कि आप सभी के बिना मेरा कोई संस्कार रुक जायेगा...हम बेटियों और उनके पतियों सहित बहुत हैं... हम सब निपटा लेंगे... सच्चाई यही है कि आज मेरे आँगन आप के साथ इतने लोग हैं... बहुत हमदर्दी से आये हैं... बहुत एहसान हैं आप सभी के हमारे ऊपर... लेकिन सोचो सोलह दिनों के बाद क्या कोई मेरे आँगन रहेगा या आयेगा...? कोई नहीं आयेगा दादा, कोई नहीं... मुझे अपना जीवन अकेले ही तो काटना है। आपकी उम्र नब्बे पार है... दादी तीन बरस पहले चली गयी... मैं जानती हूँ कितना वारदाना था आपका... अब भी है... लेकिन देखिए, आपके दो बेटे हैं, बहुएँ हैं... पोते पोतियाँ हैं... पर क्या वे आपके साथ हैं? सभी शहरों में बस गये हैं... गाँव तो मेहमानों की तरह आते हैं, जाते हैं... आप भी कितने अकेले हैं...हम सब अकेले ही रहेंगे दादा, कोई साथ नहीं रहेगा, न जायेगा...न धर्म, न संस्कार, न रीति-रिवाज़... इन्हें इन्सान बनाता है और तोड़ता भी वही है और नया सृजन भी वही करता है... आप बताइए... आपमें से कितने लोग हैं जो मेरे अकेलेपन के साथ बाद में रहेंगे?... या मेरी घरबार चलाने में मदद करेंगे?... मुझे भी तो यह वैधव्य अकेले ही काटना है... तमाम उम्र ढोना है... फिर मैं क्यों किसी धर्म या संस्कार की बेड़ियों में जकड़ी रहूँ... क्यों न वह करूँ जो मेरा मन कहता है, वह क्यों करूँ जो आपके वेद-शास्त्र और गढ़ी-गढ़ाई परम्पराएँ कहती हैं, बोलती हैं। क्या मेरा हक मेरे अपनी तरह से जीने का नहीं है..? अपने भीतर बसाये रखना चाहती हूँ... वह क्यों लावारिस की तरह इस अन्तिम यात्रा में जाये और क्यों अपने साथी के होते हुए अकेला जाये माना हमारे बेटा नहीं है जिसे इन संस्कारों को करना था... मैं बालकराम की पत्नी ही नहीं, बेटा भी हूँ, उसका भाई भी... पिता भी.. सोचो दादा जब दादी, जिन्दा थी... उनके कितने रूप आपके घर में थे... मेरे लिए भी बालकराम उसी तरह है और रहेगा... मैं इस एहसास में जीना नहीं चाहती कि मैं विधवा हूँ... या वह मेरे साथ नहीं है... आप सब बतायें कि जिन-जिनके परिजन चले गये हैं, क्या उन्हें आप भूल पाए हैं”।२ सुनमा देई के कोई बेटा नहीं है, अतः वह अंतिम संस्कार के सारे कार्य स्वयं करना चाहती है, अपने पति के अंतिम यात्रा में साथ देना चाहती है। वे पुरानी रूढ़ियों की जंजीरों से निकालकर स्वछंद जीवन जीना चाहती है।
स्त्री यह समझ चुकी है कि उसके प्रति समाज ने दोहरी नीति रखी है। एक ओर उसे देवी की संज्ञा देकर पूजने का स्वांग रचा जाता है दूसरी और अनेक प्रकार से उसका शोषण किया जाता है। स्त्रियों के मार्ग की बाधा सिर्फ धन की कमी नहीं बल्कि सबसे बड़ी बाधा है- समाज में उसका दूसरा दर्जा। उसके साथ होने वाला भेद-भाव। स्त्री के साथ होने वाला यह भेदभाव हर धर्म, हर जाति और हर वर्ग में मौजूद है। औद्योगिकरण, उपभोक्तावाद, उदारीकरण, मध्यवर्ग का उदय ये सभी आधुनिक युग की विशेषताएँ हैं। औद्योगीकरण का आधार, विज्ञान एवं तकनीकी है। विज्ञान एवं तकनीकी के युग में मनुष्य अध्यात्म से दूर होता गया और भौतिकता की ओर प्रवृत्त हुआ। बढ़ती भोग प्रवृत्ति ने मनुष्य को स्वार्थी बनाया, जिससे पारिवारिक व सामाजिक विघटन होने लगा।
सुनमा ने अपने रीति-रिवाज़ों के मुताबिक सभी संस्कार स्वयं पूरे किये। उसने यह हक किसी को नहीं दिया। जबकि, यह बात किसी के गले नहीं उतरी। घर-घर में सभी लोगों ने इस कर्म की तीखी भर्त्सना की। जिसके जो मन आया बकता-कहता गया लेकिन सुनमा से किसी की भी कोई बात करने की हिम्मत न हुई और न ही इन शोक के दिनों में कोई उसके घर आने से रूका। सुनमा ने भी किसी की परवाह नहीं की। वह अपने मन की करती रही। वह भलीभाँति रूप से जानती थी जीवन कठिनाइयों से घिरा हुआ है, इस समाज की दीवारें अत्यधिक कठोर है। वह अच्छी तरह से जानती थी कि इस आततायी दुनिया के बीच रहते हुए उसे निडर रहना होगा। पति के देहांत होने के बावजूद भी सुनमा सुहागिन की तरह ही रहती। लोग उसके इस हठ को उसकी बेअकली और नासमझी ही समझते।
अपने रीति-रिवाजों को, पुरानी रूढी-परम्पराओं को धता बताते हुए, सुनमा ने विधवा होने के बावजूद अपनी सूनी माँग, सूने गले, सूनी कलाइयों को खाली नहीं रखा और वो नहीं चाहती थी कि सफेद-काले कपड़े पहन-देखकर अपने आप को तिल-तिल मारती रहे। लोग जो समझे, जो सोचे वह उनकी सोच थी लेकिन उसके अथाह दुःखों और पीड़ाओं को न तो वे कम कर सकते और न ही बाँट सकते थे। जहाँ एक ओर स्त्रियाँ शिक्षित और आत्मनिर्भर होने लगी हैं, वहीं दूसरी ओर अनेक स्त्रियाँ मध्यकालीन मानसिकता और दोहरी मूल्य व्यवस्था का शिकार भी हैं। आधुनिक काल में देश तो स्वतंत्र हो गया स्त्री की स्थिति में भी सुधार हुए किंतु उसे पूर्ण स्वतंत्रता नहीं मिल पाई। काफी स्त्रियाँ आर्थिक रूप से पराश्रित ही रही। जागृति की स्थिति अभी भी नहीं आ पाई है। शहरी व उच्च वर्ग में जहाँ स्त्री को अच्छी शिक्षा के अवसर दिए जाने लगे, वही गाँव में तथा निम्न वर्ग में स्त्री को शिक्षित करना आवश्यक नहीं समझ गया।
कुछ लोग ही थे, जो उसकी सोच और तर्क से सहमत थे और उसका दिल से आदर करते थे। विशेषकर नयी सोच की लड़कियाँ और औरतें जो उसके इस बड़े और क्रान्तिकारी कदम की तारीफें करतीं नहीं थकती थीं और जब भी कभी घर या बाहर इस सन्दर्भ में सुनमा की बदनामी या अपमान करते, किसी को सुन लेती तो उनसे भिड़ जाया करती थीं। इस तरह अब उसके पक्ष में बहुत ज़्यादा लोग थे जबकि विपक्ष में वही दकियानूसी और बूढ़ी सोच वाले लोग ही शेष बचे रह गये थे। नए विचारों की हवा चल पड़ी थी।
हरिद्वार में अपने पति के अस्थियों को बहाने और क्रिया कर्म के लिए पंडों ने मुँह माँगी कीमत माँगी तो उसने खुद अपने हाथों से पिण्ड बनाकर उसका नदी में दान किया और सभी परिजनों के सामने प्रतिज्ञा ली थी कि जितना खर्च हरिद्वार में बालकराम के कर्मकाण्ड व क्रिया इत्यादि पर होना था, वह उसमें उतना ही धन मिलाकर पाँच विधवाओं को दान देगी और साथ उन्हीं की दो बेटियों की शादी का ख़र्चा भी उठायेगी। उसके इस प्रण से सभी चकित रह गये थे। कुछ पुरानी संवेदनशील विचारधारा के साथ नई विचारधारा को लेकर यात्रा करना उसे सुखद लग रहा था जो उसके पति के प्रेम से जुडी थी। धार्मिक अनुष्ठान, कर्मकांड में जो रूपये पैसे खर्च होते हैं वे व्यर्थ ही होते हैं परंतु उन रूपयों से एक अच्छा कार्य भी किया जा सकता है, सुनमा ने इसका उदाहरण प्रस्तुत किया।
स्त्री ने जब अपनी पूरी शक्ति लगा दी तो समाज का स्वरूप भले पूर्ण रूप से न सही किंतु काफी बदला। स्त्री का सिर्फ जानना और समझना ही काफी नहीं है, उसे यदि कुछ करना है तो समाज द्वारा प्रदत्त स्त्री की छवि को तोड़कर क्या होगा इस तथ्य से वह अवगत हो चुकी है। सदियों से जिन मानकों पर स्त्री को नापा जाता रहा है और जिस खास साँचे में ढालकर देखा जाता रहा है कि यह एक आदर्श स्त्री है या नहीं उन साँचों को वह तोड़ चुकी है। उसने सड़ी गली मान्यताओं व रूढ़ियों का विरोध कर दिया है।
एक दिन, गाँव का प्रधान ठाकुर बसंतराम और पंचायत सदस्य भीखीराम सुनमा के पास आकर कहते हैं कि- "मैं सोच रहा था नदी के साथ तुम्हारे क्यार अब उजड़ पड़ने लगे हैं। बालकराम था तो बड़ा सहारा था तुम्हारे लिए। खूब निराई-बुआयी भी होती थी। बिना मर्द के अब कहाँ घर और ज़मीनें चलती हैं। सोच रहा था मेरे को बेच दो। जो कीमत लेनी तुम्हारे को ले लो। जितना बोलोगी ज़्यादा ही दूँगा।"३ सुनमा के मना करने पर प्रधान उसे अपनी तौहीन समझता है, वो भी एक औरत से। मौक़ा पाकर अपने अपमान का बदला लेने के लिए वह सुनमा पर प्रहार करता है। सुनमा घबरा जाती है, लेकिन अपने हौसले को समटते हुए पूरी ताकत लगाकर, वह अपने आपको छुड़ा लेती है। गाँव के कुछ लोग जब एकत्रित होते है, तो सुनमा की दबंगता देखकर उसका लोहा मान लेते हैं, इस घटना के बाद वह प्रसिद्ध हो जाती है। स्त्री अभी संघर्ष की स्थिति में है, एक ओर उसका इतिहास है तो दूसरी ओर भविष्य। वर्तमान में उसकी स्थिति भूत से अच्छी है तथा भविष्य में वह अपनी स्थिति को सुधारने के लिए संघर्ष में जुटी है। अपने भविष्य को लेकर वह आशान्वित है।
आगे चलकर सुनमा देई गाँव के लोगों के कहने पर पंचायत का चुनाव लड़ती हैं। अपने गाँव के लिए, गाँव के लोगों की भलाई के लिए वह सभी कार्य करती हैं, जो पिछली पंचायत के लोग कई सालों से नहीं कर पाए थे। भ्रष्टाचार, शोषण, मानव अधिकार, स्त्री अधिकार के लिए आवाज उठाती हैं। स्कूल का निर्माण, गाँव की सड़कों को शहर की सड़कों से जोड़ने का कार्य करती हैं। उसकी जिंदगी और गाँव के लोगों की जिंदगी में मोड़ तब फिर से आ जाता है, जब सरकारी कागज़ पर बाँध निर्माण का आदेश पारित होता है। सुनमा ये भलीभांति जानती थी कि बाँध बनने की वजह से नदी के किनारे के कई गाँव के गाँव विस्थापित हो जायेंगे। सदियों से रहते आये लोग अपनी भूमी से उजड़ जायेंगे। लोगों को अपनी जमीन के साथ-साथ पशु-पक्षियों से विलग होना पड़ेगा। बाँध न बने इसके लिए सुनमा देई ने कई तरह की समस्याएँ सरकारी अफसरों को, गाँव के लोगों को बताईं, समझाई परंतु वे सफल न हुईं। सरकारी आदेश पारित हो गया तो उसका पूर्ण होना तय था। बाँध बना, लोग बेघर हुए परंतु सरकारी व्यवस्था, सरकारी लोग मूक बने तमाशा देखते रहे।
उपन्यास में लेखक ने कोरोना काल के समय का परिदृश्य चित्रित किया है। कोरोना के समय किस तरह लोग मीलों पैदल चलकर अपने-अपने घरों की तरफ निकल पड़े थे। ऐसे में सुनमा देई अपने अनाज का भंडार खोल देती है और हर तरह से उन मजदूरों की मदद करती है। उपन्यास के अंत में अपना मकान, अपनी संपत्ति उन मजदूरों के नाम कर अपने आखिरी पड़ाव की ओर निकल जाती हैं। अनेक सामाजिक समस्याओं का चित्रण हरनोट जी ने इस उपन्यास में कर लोगों का ध्यान आकर्षित किया है।
वैश्वीकरण के प्रभाव से जीवन का कोई भी क्षेत्र अछूता नहीं रह गया, वैश्वीकरण का प्रभाव जीवन पर भी पड़ा है। मीडिया और संचार माध्यमों की वैश्वीकरण में अहम भूमिका है। मीडिया और संचार माध्यमों के प्रभाव से अशिक्षित तथा अल्प शिक्षित स्त्री भी बहुत कुछ जानने-समझने लगी है। स्त्री को एक नया साहस मिला है, परिणाम स्वरुप वह बोलने की हिम्मत जुटा पाई है तथा उसकी आवाज सुनी भी जाने लगी है। भारत एक बहुलवादी देश है, यहाँ का पूरा समाज एक ही समय में एक जैसा स्वरूप निर्मित नहीं कर पाता, यही कारण है कि सकारात्मक स्थितियाँ सभी को नहीं सुलभ हो पाईं। बड़ी संख्या में स्त्री, अभी भी अशिक्षित, अर्धशिक्षित तथा घर की चार दिवारी तक सिमटी हुई है। वर्तमान समय में भी स्त्री अपने अधिकारों के लिए संघर्षरत हैं।
संदर्भ
१. नदी-रंग जैसी लड़की, एस.आर.हरनोट, वाणी प्रकाशन, पृ-४३
२. नदी-रंग जैसी लड़की, एस.आर.हरनोट, वाणी प्रकाशन, पृ-५४-५५
३. नदी-रंग जैसी लड़की, एस.आर.हरनोट, वाणी प्रकाशन, पृ-८०
उपन्यास- नदी-रंग जैसी लड़की
लेखक- एस.आर.हरनोट
प्रकाशक- वाणी प्रकाशन
पृष्ठ- २३६
मूल्य- ४९९
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विविध
पाठकों की प्रतिक्रिया
बहुत-बहुत बधाई एवं शुभकामनाएं। इस समकालीन महत्वपूर्ण साहित्यिक पत्रिका के अंक , आधुनिक अभिव्यक्ति के मंच पर सभी साहित्यकारों एवं साहित्यप्रेमियों में लोकप्रिय है। समस्या यह है कि पढ़ने वाले पढ़ कर रह जाते हैं। उनकी मौन साहित्य व साहित्यकारों के लिए दुखद है। पाठकों को पढ़कर अपनी अहम राय , टिप्पणी व दृष्टि संपादक व लेखकों, रचनाकारों तक अवश्य प्रेषित करें। पुनः बधाई एवं शुभकामनाएं। मैं भी अपनी रचनाओं को आप तक प्रेषित करता हूं।
- राजीव कुमार भारद्वाज
पत्रिका निकालकर आप ज़रूरी काम कर रहे हैं। दो अंक देखे पर दोनों ही अंकों में कविताएँ कमज़ोर हैं। नीरजा हेमेन्द्र की कहानी बेहद अच्छी है। सीताराम गुप्ता और अलका शर्मा के लेख भी पसन्द आए।
- अनिल जनविजय
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